लिखा के लाए हैं…
“जो लिखा है, वही होगा—बाक़ी सब तर्क अतिरिक्त हैं।” “किस्मत ने परमानेंट मार्कर से लिखा है साहब।” “इंसान से सहमति नहीं ली गई, फिर भी संविधान लागू है।” “कुछ लोग फूल लिखाकर लाए, कुछ काँटे समेटते रह गए।”
India Ki Baat
“जो लिखा है, वही होगा—बाक़ी सब तर्क अतिरिक्त हैं।” “किस्मत ने परमानेंट मार्कर से लिखा है साहब।” “इंसान से सहमति नहीं ली गई, फिर भी संविधान लागू है।” “कुछ लोग फूल लिखाकर लाए, कुछ काँटे समेटते रह गए।”
इलियड और महाभारत केवल युद्ध की कथाएँ नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चल रहे संघर्षों का महाकाव्य हैं। जहाँ अखिलीस का क्रोध कथा को गति देता है, वहीं महाभारत में धर्म और अधर्म का द्वंद्व पूरी सभ्यता को झकझोर देता है। दो अलग भूगोल, दो अलग संस्कृतियाँ—पर प्रश्न वही: युद्ध के बाद मनुष्य क्या बनता है?
मरना तय था, यह हम मान चुके थे— पर किस तत्व से मरना है, यह विकल्प भी अस्पताल तय करेगा, यह हमें बताया नहीं गया। पहले आग, अब पानी… लगता है अस्पताल पंचतत्व को सीरियल-वाइज टेस्ट कर रहा है।
“यह पर्व केवल मौसम नहीं बदलता, जीवन की दृष्टि बदलता है।” “लोहड़ी संघर्ष के बाद आने वाली राहत और संभावना का लोकउत्सव है।” “लोकपर्वों की सादगी ही उनकी सबसे बड़ी सुंदरता है।” “परंपरा तब जीवित रहती है, जब वह समय से संवाद करती है।”
Lions Club Sarthak celebrated New Year, Lohri and Makar Sankranti with families, games, cultural bonding, and a meaningful financial literacy session.
“हिन्दी में बिन्दी की महत्ता, ज्यों खोजे गहराती है।” “तुलसी मीरा सूर कबीरा, अलख जगाई हिन्दी की।” “राजभाषा भले कहे हम, दोयम दर्जा थोप दिया।” “अभिमान करें अपनी थाती का, स्वभाषा का सम्मान करें।”
दुनिया की कूटनीति कभी-कभी इतनी जटिल नहीं होती, जितनी एक रूसे फूफा की नाराज़गी। एक फोन कॉल, थोड़ी तारीफ़ और ज़रा-सा अपनापन— न हो तो टैरिफ, ट्वीट और ताने वैश्विक स्तर पर चलने लगते हैं।
“युद्ध अब अचानक नहीं फूटता—वह पहले बाज़ार में उतरता है, फिर जीवन में।” “जब शांति लाभकारी नहीं रह जाती, तब युद्ध नैतिक घोषित कर दिया जाता है।” “हर युद्ध के बाद कोई विजेता नहीं होता—सिर्फ़ आँकड़े होते हैं।” “इतिहास मनुष्य से एक ही प्रश्न पूछता है—क्या तुमने पहले से सीखा?”
कभी कच्चा केला, कभी पका आम— बाज़ार, राजनीति और मोबाइल की आंच में हर रिश्ता, हर मूल्य अपना रंग बदलता हुआ मिलता है।