कोहरे में खिलते फूल
गृहस्थ-जीवन का ताना-बाना सुदृढ़ बुनावट के लिए रिश्तों के तंतुओं को संबंधों के आत्मीय आयाम हेतु कैसे उपयुक्त रंग एवं आकार में ढालता है, इसका संज्ञान लेता नाटक ‘कोहरे में खिलते फूल’ असमंजस की उलझी डोर को सकारात्मकता का छोर प्रदान करता है। व्यक्ति के स्व-पक्षी चिंतन, आग्रह, पूर्वाग्रह से धुंधलाए दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है। विषय को गंभीर होने से बचाता है संवादों पर चढ़ाया गया हास्य-व्यंग्य का माँजा! प्रहलाद श्रीमाली जी का लेखन यहाँ पर केवल नाटकीय नहीं, अपितु आत्मनिरीक्षण की एक सहज प्रक्रिया बनकर उभरता है। पात्रों के माध्यम से संवाद रचते-रचते लेखक जीवन के उलझे धागों को सुलझाने का आत्मीय प्रयास भी करते हैं।
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संस्कृति प्रकाशन 9080088218
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