सुसरी माया का भटकाव-हास्य व्यंग्य रचना

कार थोड़े भीड़ भडा़के वाले इलाके में सड़क पर सरपट सी दौड़ रही थी और जैसे सब शादीशुदा के साथ होता है वैसे ही, पत्नीजी बायी तरफ़ की सीट को काबिज किये हुए थी। उनका ध्यान हमेशा की तरहां ड्राइविंग के तौर तरीके पर अधिक होता है जिसमें टोका-टोकी ज्यादा हो और प्रोत्साहन कम। मेरे ड्राइविंग की तुलना किसी नामी-गिरामी कार रेसर से नही बल्कि अपने उल्लू के पट्ठें उन भाइयों से अधिक होती है जिन सुसरें सालों को कार की सीट पर बैठना तक मैंने सिखाया था।

उन प्रशंसाओं को सुनते सुनते अब कान पकने लग गये सो आजकल पत्नी के किये उन कॉमेंट्स को अनसुना कर देता हूं। इसी में ही क्षणिक सुख भी मिल जाता है और स्वयं को स्वाभीमानी पति की श्रेणी में खड़ा होने का ढोंग रच डालता हूं। इसी से ही मित्रों के मध्य मुंह दिखाने लायक संतुष्टि भी मिल जाती है।

आज चलते चलते जैसे ही एक अनजान कार आगे निकली कि खाली साइड वाली फ्रंट सीट पर बैठी महिला से आंखें टकरा गयी। तिरछी नजरों का वो नजारा कुछ ऐसे दिल में अंदर तक पैठा कि उसने मन मस्तिष्क तक सब कुछ झंझोड़ दिया। तीखे नैन-नक्श और गोरे रंग वाली नारी की हमेशा से हर भारतीय पुरुष को चाह रही है। देखते ही लगा कि शायद ये वो ही है जिसकी बरसों से चाहत है। हाथों हाथ दिल में रोमियो प्रकट हो गया। ऐसी बांकी चितवनों का वर्णन केवल मध्ययुगीन कवियों की रचनाओं में ही पढ़ने में मिल पाया था। समझदार एवं प्रगतिशील शिक्षा विदों ने हम जैसे छात्रों को बांकी रसीली सूरतों के बारे में समझाने के लिए हिन्दी साहित्य के कोर्स में बड़ा भाग निश्चित कर रखा था पर उस वर्ष हिंदी पढ़ाने वाला ही नहीं आया और हम सब उस रस रंगीले साहित्य की व्याख्याओं से वंचित ही रहें। पास तो हुए थे पर केवल रट्टन से। किस्मत से परे रंगीनियां अति भाग्यशालियों को ही मिलती है।

उसकी सूरत देखकर एकबारगी तो हम भूल गए कि स्वयं कार भी चला रहे हैं। अक्समात् दूसरे ही क्षण ख्याल आया कि इसे एकबार फिर देखा जाय इसलिए कार को स्पीड देना आवश्यक है यह विचारते ही कार का एक्सीलेटर अपने आप ही दब गया और कार झटके साथ जो आगे बढ़ी और आगे चल रहे स्कूटर से टकराते बची। पत्नी जी को हमेशा की तरह बोलना था पर आज बोली नही बल्कि वह ज़रा गंभीर सी हो हमारी हर हरकत पर सावधान हो चली। तिरछी नजर तो यह भी थी पर बांकी की बजाय गुस्सैल सांड सी थी।

इधर हमारे सिर एक ही भूत घुसा था कि किसी तरह उस मोहतरमा की कार के साथ समानांतर चले ताकि एकबार फिर नजरें टकरा जाय जैसा सत्तर के दशक में हिन्दी फिल्मों में हुआ करता था और फिल्म इसी के सहारे आगे बढ़ती थी।

जब किस्मत ही ख़राब हो तो कोई न कोई रोड़ा टपक ही जाता है। जितना आगे बढ़ने की कोशिश करता कि बस एकबार पुनः झलक मात्र दिख जाये पर भीड़ के कारण संभव नहीं हो पा रहा था। कभी कोई स्कूटर, तो कोई ठेलेवाला, कभी साईकिल यानि उस दिन सभी प्रकार के वाहन आडे़ आ रहे थे। जैसे प्रकृति ने भी ठान लिया था कि उस औरत को मुझसे बचाना ही हैं।
इस जद्दोजहद में जहां जाना था वह तो स्थान काफी पीछे छूट गया। पत्नी साहिबा भौंचक्की सी हो कभी रास्ते को देखें तो कभी मेरा चेहरा पढ़ने की कोशिश करती रही।

जब दिलों- दिमाग में इश्क का भूत सवार हो जाता है तो आशिक टारगेट प्राप्त करने केलिए हरबार नयी अटकलें ढूंढने लगता है। भीड़ की वजह से मुझे भी लगने लगा कि आज की दर्शन की ख्वाहिश अधूरी ही रहेगी तो एक विचार आया कि कि किसी तरह उस चंचल नयना मोहतरमा की गाड़ी का नंबर मिल जाए तो भविष्य में फिर कभी आकांक्षा पूर्ति हो सकती है।

इस चक्कर में अब कार की आगे की सीट से नज़र हटकर गाड़ी के पिछवाड़े लिखें नंबर प्राप्त करने में जुट गई। एकबार लेन बदलने की कोशिश में आगे के बंपरों पर दायें बायें स्क्रेच भी लगवा दिए पर लालसा में रत्ती भर कमी नहीं आयी। एकबार बमुश्किल सीरीज नज़र आयी पर अंक नही दिखे और दूसरी बार नंबर साफ़ दिखाई दिए पर सीरीज में कन्फ्यूजन होगया।

तमाम कोशिशों के उपरांत इतना सब करते सिर्फ असफलता ही हाथ रही। समय के साथ अब मेरे चेहरे पर भी निराशा की लकीरें नज़र आने लग गयी थी और पास बैठी पत्नी को भी समझ आ गयी थी मामला किसी अज्ञात सौतन से जुड़ा है और यह सब मेरी प्रेजेंस में हो रहा है। मैं साथ न होती तो पता नहीं क्या होता?
कहते हैं कि इश्क और रश्क छुपाए नहीं छुपते।
पत्नी के द्वारा यह सब संज्ञान में लेते ही गंभीरतम शब्दों में चेतावनी जारी हो गयी – “ये सब क्या हो रहा है, होश ठिकाने पर रखो अपने। बहुत देर से देख रहीं हूं। मुझे सब समझ आ गयी है।”
क्रोध भरें बैन सुनते ही हमारे इश्क का भूत हमें छोड़, पता नही कब कहां भाग गया और हम फटे पैराशूट की तरह तुरंत धरती पर लौट आये। जवाब देना भारी हो रहा था। बहाने बनाते समय लगता है।
खिसियाहट में ज़बान जरा लड़खडा़ गई और बोल भी सही नहीं निकल रहे थे। हलक सूखने लगा था। जैसा हर पति के साथ होता है। असफलता ने आत्मविश्वास डिगा दिया था।

पत्नी – किस छिनाल के पीछे भाग रहे थे जरा बताना तो, सो इतना आगे चले आये हो। जहां जाना था, वो तो कहीं पीछे रह गया है। हमें सीखाने की जरूरत नहीं, मेरी आंखें फूटी नहीं है जो समझूं ही नहीं। घर चलों तो सारा फितुर उतार दूंगी।

फिर कुछ रुक कर जैसे कान के पास कोई बम फट गया हो – “अब वापस घर चलने में ही सार है। अगले ने खाने पर बुलाया था और यहां श्रीमान जी को इश्क लड़ाने का भूत चढ़ा है। गाड़ी ठुकी है सो अलग।
अब मैं कहीं नहीं जाने वाली और मुझसे खाना बनाने की आशा भी मत करना। आप जानो आपके करम।”

मैंने भी सोचा कि आज की दैनिक किस्मत में केवल धक्के खाने ही लिखें है,खाना नहीं। सुसरी अज्ञात माया ने ऐसा भटकाया कि ठनन ठनन गोपाल के साथ अब कर्कश वाग् बाणों से ठुकेंगे वो अलग। अब तो सावधानी से बचाव के तरीके ढूंढने होंगे। इसलिए अब यूं टर्न में ही सार है।

डॉ राम कुमार जोशी जोशी प्रोल, सरदार पटेल मार्ग बाड़मेर [email protected]
Ram Kumar Joshi

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डा राम कुमार जोशी ललित कुंज, जोशी प्रोल सरदार पटेल…

डा राम कुमार जोशी ललित कुंज, जोशी प्रोल सरदार पटेल मार्ग, बाड़मेर (राज) [email protected]

Comments ( 4)

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डॉ मुकेश 'असीमित'

2 weeks ago

यह रचना वैवाहिक जीवन, पुरुष मनोविज्ञान और सड़क-यथार्थ का ऐसा हास्य-व्यंग्यात्मक कॉकटेल है, जिसमें पाठक मुस्कुराते-मुस्कुराते खुद को पहचान लेता है। दृष्टि-भ्रम से शुरू होकर ‘इश्क के भूत’ और अंततः ‘पत्नी के यथार्थ-बाण’ तक की यात्रा बेहद सजीव, संवादात्मक और स्वाभाविक है। भाषा में ठेठपन, आत्मव्यंग्य और स्थितिजन्य हास्य इसे पठनीय बनाते हैं। अंत विशेष रूप से प्रभावी है—जहाँ रोमांस नहीं, जीवन जीतता है।

प्रेम प्रकाश व्यास

2 months ago

बहुत सुन्दर प्रस्तुति. शुभकामनायें. 🙏🙏

डा राम कुमार जोशी

2 months ago

मेरे पास धन्यवाद के सिवाय और कुछ नहीं है।

डॉ मुकेश 'असीमित'

2 months ago

आपकी रचना बेहद रोचक और जीवंत लगी। व्यंग्य, हास्य और दांपत्य यथार्थ का जो मेल आपने रचा है, वह पढ़ते ही मुस्कान ले आता है। भाषा प्रवाहमय है और दृश्य इतने सजीव कि पूरी घटना आँखों के सामने घटती महसूस होती है। शानदार लेखन—हार्दिक बधाई