अफसरों सेवा धर्म-हास्य व्यंग्य रचना

Ram Kumar Joshi May 5, 2026 व्यंग रचनाएं 1

नई दिल्ली की ट्रेनिंग में उन्हें सिखाया गया था— “धीरे-धीरे खाओ, ठंडा करके खाओ…” लेकिन जब सिस्टम गरम हुआ, तो सबसे पहले जल गया—एक ‘बाबू’।

हुकूमत बदली और हवेलियाँ काँपी: बुलडोज़र राजनीति पर तीखा व्यंग्य

Ram Kumar Joshi Apr 18, 2026 हिंदी कविता 1

एक तीखा व्यंग्य जो सत्ता परिवर्तन, बुलडोज़र राजनीति और रसूखदारों के बदलते चेहरे पर करारा कटाक्ष करता है। पढ़ें यह समकालीन सामाजिक-राजनीतिक कविता।

ऊर्जा का आवेशन

Ram Kumar Joshi Apr 2, 2026 व्यंग रचनाएं 1

“ऊर्जा स्वयं न पाजिटिव होती है न नेगेटिव—वह तो मात्र साधन है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसे साधु साधे या ‘साहिब’ साधे।”

महिलाओं की टीवी बहस!

Ram Kumar Joshi Feb 26, 2026 हास्य रचनाएं 1

एक ज्वलंत विषय पर बहस करवाने की योजना स्टूडियो प्रबंधन के लिए अप्रत्याशित परीक्षा बन गई। वर्णमाला क्रम, विशेषज्ञता और समय-सारिणी सब धरी रह गईं—और बहस का मंच देखते ही देखते शक्ति प्रदर्शन में बदल गया।

बीबी कहां छिटक गई-कविता रचना

Ram Kumar Joshi Feb 11, 2026 हिंदी कविता 2

यह कविता महानगर दिल्ली की चकाचौंध, अव्यवस्था और आम आदमी की असहजता पर तीखा, लेकिन हल्का-फुल्का व्यंग्य है। ‘बीबी कहाँ छिटक गई’ सिर्फ़ एक व्यक्ति के खोने की बात नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की स्थिति का रूपक है, जो महानगरीय भीड़, जेबकतरी, शोर और भ्रम में स्वयं को खो बैठता है। हाथी की पूँछ और हिलती डोर जैसी प्रतीकात्मक पंक्तियाँ सत्ता, व्यवस्था और भ्रमजाल पर करारा कटाक्ष करती हैं। कविता सरल भाषा में शहरों की जटिल सच्चाई उजागर करती है।

छोटे बनाम बड़े बाबू डा राम कुमार जोशी

Ram Kumar Joshi Jan 30, 2026 व्यंग रचनाएं 2

असल में काम तो छोटा बाबू ही करता है, पर वाहवाही और माल ऊपर वालों के हिस्से। बाबूजी के जूते ही उनकी सबसे मजबूत ढाल थे—कोई पूछे तो जवाब मिल जाता, “कहीं काम से गए होंगे।” फाइल ढूंढना समुद्र से मोती निकालने जैसा बताया गया, ताकि मोती की क़ीमत भी वसूली जा सके। धीरे-धीरे कलेक्टर साहब भी समझ गए—इस शाही नौकरी में ज्यादा ईमानदारी से शुगर-बीपी ही मिलता है। इस तरह बाबूओं के जाल में जिले के सबसे बड़े बाबू सरकार भी सम्मिलित हो गए।

मेरी हिन्दी -डा राम कुमार जोशी

Ram Kumar Joshi Jan 11, 2026 हिंदी कविता 2

“हिन्दी में बिन्दी की महत्ता, ज्यों खोजे गहराती है।” “तुलसी मीरा सूर कबीरा, अलख जगाई हिन्दी की।” “राजभाषा भले कहे हम, दोयम दर्जा थोप दिया।” “अभिमान करें अपनी थाती का, स्वभाषा का सम्मान करें।”

कागजों में मरण-

Ram Kumar Joshi Jan 9, 2026 व्यंग रचनाएं 1

मेरा बाप घर में मर गया, पर बाबूजी की फ़ाइल में अभी ज़िंदा है। बिन पैसे के यहाँ कोई मरता नहीं— यहाँ मौत भी सरकारी प्रक्रिया है।

हाथी का शोर और डोर की कविता

Ram Kumar Joshi Jan 5, 2026 हिंदी कविता 1

सम्मान, पुरस्कार और नोटों की थैलियों से सजे कवि सम्मेलन, जहाँ कविता की तलाश में गए श्रोता मसखरी लेकर लौटे। यह व्यंग्य उन बड़े नामों पर है, जिनकी आवाज़ भारी है और अर्थ हल्का।

करें कोई भरें कोई

Ram Kumar Joshi Jan 2, 2026 व्यंग रचनाएं 1

1971 का चुनाव हार-जीत से नहीं, एक पीए के भाषण से इतिहास बन गया। सत्ता के गलियारों में बोले गए शब्द, जनता ने जेलों में गिने। आपातकाल की कीमत उन लोगों ने चुकाई, जिनका भाषण से कोई लेना-देना नहीं था। दिल्ली से नागौर तक—हर चुनाव में कोई न कोई पीए इतिहास लिख ही देता है। लोकतंत्र में कई बार कर्म किसी के होते हैं, फल किसी और को भुगतने पड़ते हैं।