गरीमा बचा ली गयी-

गरीमा बचा ली गयी

उच्च स्तरीय अफसरों व जानकारों की बैठक हो रही थी। विषय था कि विदेश से बड़े बड़े मेहमान आ रहे हैं,पल-पल का कार्यक्रम तय करना था। वे जानते थे कि हर मनुष्य को भोजन की भूख दिन में दो बार सताती है सो कमेटी ने सबसे पहले विषय लिया कि हाई लेवल डिनर में क्या बनें, किसको बुलायें और किसको छोड़े?
भोजन भले कितना लजीज हो यदि खाने वाले रौनक शुदा न हो तो सब बेकार, जैसे मुर्दे भोजन करने आये हो। कुछ राजनैतिज्ञ लोग तो चुटकले बाज होते हैं तो कुछ खुद ही चुटकुले होते हैं। खाने में गर हंगामें के साथ हंसी ठठ्ठा न हो तो बड़ा खाना कैसा!

एक अनुभवी ने कहा- अरे साहबों, खाना-वाना छोड़ो, पहले आप जल्द सूची बनाइये कि किन-किन को बुलाना और किसे नहीं बुलाना है, यही झगड़े की जड़ होती है। बस एक ही रट कि मेरा नाम क्यों नहीं और इसका नाम किसने जोड़ा? जैसे सारे भूखिऐं यही राजधानी में जमा हो गए हो। जो जितना बड़ा -उतना ही ज्यादा भूखा। सबसे बड़ा रोना इसी विषय का होता है।
साहबों, इस सूची को पहले हाई लेवल फिल्टर कमेटी के पास भेजना होगा। आप सोचते होंगे कि अपने किसी चाहने वाले का नाम सूची में घुसेड़ दे। उसपर बड़ा एहसान हो जायेगा, पर यह संभव नहीं है।

एक राज की बात बता दूं कि ये बड़े लोग खाते बहुत ही थोड़ा हैं। जब पार्टी खत्म हो जाये तो जो माल बचेगा, उससे सौ पचास लोग आराम से पेट भर सकते है बाद में उनको बुला लेना। आदर मान के साथ शानदार, लजीज भोजन करवा देंगे। अभी जिद छोड़ दो।

एक साहब तो तकियाकलाम रूपी अश्लील गाली देते हुए बोल पड़े- भाई, आपको पता है ये हमारी-आपकी बनाई सूची अपनों से फिल्टर केबाद विदेशी मेहमानों के संबंधित राजदूत के पास भी जायेगी, उस लेवल पर जांच होगी इसलिए जो गाइडलाइन दी गयी है, चुपचाप फोलो करों। बेवकूफियां करने के लिए बाकी तीन सौ चौंसठ दिन पड़े हैं। आज का दिन छोड़ दो।

सरकार के सताये हुए एक अफसर लोकतंत्र की दुहाई का दंभ भरते कहने लगे कि विरोधी पक्ष के नेता के साथ अन्य विरोधी दलों के अध्यक्ष सांसदों को भी इन्वाइट करना चाहिए।

सबका साथ सबका विकास। केवल और केवल खोखला नारा देने से क्या होता है, साथ में खाना खाने से ही लोकतंत्र की जड़ें गहराती है। डिनर में सबका साथ होगा तभी तो विकास नजर आयेगा। नही तो इसको विनाश वाला नारा कहेंगे।

एक अफसर तल्ख़ लहज़े में बोल पड़ा – आपके कहें अनुसार इनको बुला तो ले पर विरोधियों में कुछ तो बिना इस्त्री किये ढीला ढाला पायजामा पहनकर आ जाते है और बात बे बात पर चिल्लाने लगते हैं। खाने पर सबका मूड ख़राब कर देंगे। ऐसों को तो कट करना ही उचित होगा। आखिर देश की इज्जत का सवाल है। मासूम जनता भले ऐसों को चुनें, हमें इनको पीछे ही रखना चाहिए। नहीं तो बाहर वाले समझेंगे कि जहां ऐसे जनप्रतिनिधि होते हैं वहां की जनता भी वैसी ही होगी। राष्ट्र की छवि ख़राब करनी हो तो इनको आमंत्रित करना चाहिए।

प्रोटोकॉल आफिसर (हंसते हुए) – अरे! एक काम करो, सुनो यार, विरोधी पक्ष के लीडर के साथ सभी को न्यौता देते हुए साफ साफ लिख देते हैं कि टी-शर्ट पहन कर आना निषेध है।

यदि आप चाहें तो फार्मल ड्रेस यानि कोट पेंट, यहां तक कि चड्डी बनियान तक सरकार की ओर से फ्री में दिलवा दिये जायेंगे पर टी-शर्ट व ट्रेक सूट पहन कर नहीं आवें। हमारे विदेशी मेहमानों को इससे बड़ी चिढ़ सी है।

बैठक के चेयरमैन – सुनो, आपको शायद पता नही होगा कि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ऐसे ही वाक्यें पर चिढ़ से गये थे। वो यूक्रेन का वाला वो बड़बोला जेलेंस्की, व्हाइट हाउस में टी-शर्ट, पायजामे में पहुंच गया था।

आखिर उसको ट्रंप ने गेटआउट कह भगा दिया। हमारे इन मेहमानों को भी ट्रेक सूट वालों से चिढ़ है। सारे किये करायें पर पथारी फेर देंगे। आरोप हमारे उपर लगेंगे। सावधान रहें।

रुस और यूक्रेन का युद्ध तीन चार सालों से चल रहा है। अगर जेलेंस्की फार्मल ड्रेस पहन के पुतिन के सामने चला जाय तो ये एक झटके में युद्ध खत्म। आखिर कपड़ों का भी हमारे जीवन में अच्छा खासा योगदान होता है। बीबी को बनारसी साड़ी दिलवा दो घर में रौनक बरसा देती है।
अपने यहां के राजा महाराजा, शानदार तरीके से सज-धज के दरबार में बैठते थे तो तुरत फुरत में निर्णय हो जाते थे।

बीच में बोलते हुए एक क्रान्तिकारी अफसर – आ जाते है स्साले बिना नहायें धोये। इनका तो बस चले तो बरमुडा पहने अधनंगे पार्लियामेंट पहुंच जाय। नाम काटो इन सबका। क्या एक परिवार में पैदा होने से सारे अधिकार मिल जाते है? लोकतंत्र एक मज़ाक़ होगया हैं। केवल उन्हीं का नाम सूची में रखा जाय जो समझदार हो, इज्जतदार हो, ज्ञानी ध्यानी हो। विरोधियों में भी जो वैल ड्रेस हो, संजीदा हो बुलाइये। भले किसी पार्टी का हो। ऐसे बहुत से स्तरीय सदस्य है। कम से कम भारतीय संस्कृति का तो ज्ञान हो, ऐसे चाहिए। गिटपिट अंग्रेजी पढ़ने बोलने से कुछ नहीं होता, इंग्लैंड में तो गधे भी अंग्रेजी में बोलते हैं, हमारी खोखली धारणा अनुसार तो वे सब ज्ञानी महाज्ञानी हो गये क्या! इस फेर को दिमाग से निकाल दो। ये सरकार, वो वाली सरकार नहीं है जिसमें ऊल-जलूल सब चलता था। अब गधों की पहचान हो चुकी है। गधे तो गधे ही रहेंगे।

गधे शब्द के बार बार प्रयोग से चेयरमैन साहब सावधान हो गये। वे समझ गये कि बैठक गर हंगामेदार हो गई और फिर तो बेकाबू भी हो सकती है क्योंकि कुछ सदस्य विचारों में भिन्नता के साथ शारीरिक टकराहट में भी विश्वास रखते हैं।
वातावरण में गर्माहट को अनुभव करते हुए बैठक के चैयरमेन बोलें – विचार एवं चर्चा बहुत होगई है। मेरे हिसाब से पिक्चर साफ़ होगई है, नोट्स ले लिए गये है । सूची आप सबके पास पहुंचा दी जायेगी। देख लेना। अब मीटिंग खत्म होने की घोषणा करता हूं। सभी को धन्यवाद। जयहिंद।
इस तरह चैयरमेन साहब ने अधिकारों के साथ चतुराई का प्रयोग करते हुए संजीदा विषय पर आयोजित उच्च स्तरीय मीटिंग को अक्समात् खत्म कर बैठक की गरीमा को बढ़ा दिया।

डॉ राम कुमार जोशी जोशी प्रोल, सरदार पटेल मार्ग बाड़मेर [email protected]
Ram Kumar Joshi

Ram Kumar Joshi

डा राम कुमार जोशी ललित कुंज, जोशी प्रोल सरदार पटेल…

डा राम कुमार जोशी ललित कुंज, जोशी प्रोल सरदार पटेल मार्ग, बाड़मेर (राज) [email protected]

Comments ( 1)

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डॉ मुकेश 'असीमित'

2 months ago

आपकी यह रचना समकालीन राजनीतिक-प्रशासनिक विडंबनाओं पर अत्यंत तीक्ष्ण, परंतु सधी हुई प्रहारक दृष्टि प्रस्तुत करती है। ‘गरीमा बचा ली गयी’ केवल एक बैठक का वर्णन नहीं—यह भारतीय नौकरशाही, प्रोटोकॉल, दिखावे और लोकतांत्रिक नैतिकता के नाम पर चल रही हास्यास्पद नाटकीयताओं का सटीक एक्स-रे है।

आपने जिस सहजता से यह दिखाया कि
हमारी ऊर्जा नीतियों पर नहीं, सूची में “किसका नाम जोड़ना-किसका काटना” पर खर्च होती है,
वह आज के राजनीतिक-सामाजिक यथार्थ पर बेधक टिप्पणी है।

टी-शर्ट–ट्रैकसूट जैसी सतही बातों पर महामहिमों की संवेदनशीलता और असल मुद्दों पर उनकी चिरपरिचित चुप्पी — इसे आपने जिस हल्के-फुल्के पर मार्मिक अंदाज़ में लिखा है, वह आपकी व्यंग्य-प्रतिभा का प्रमाण है।

कथानक का प्रवाह, पात्रों की भाषा, संवादों की चुटीली धार—सब मिलकर इस रचना को एक प्रासंगिक, जीवंत और अत्यंत प्रभावी व्यंग्य बनाते हैं।

अंतिम पंक्तियाँ—जहाँ चेयरमैन चतुराई से मीटिंग खत्म कर “गरीमा बचा लेता है”—पूरी कहानी को एक उत्तम व्यंग्यात्मक मोड़ देती हैं।

यह रचना न केवल मनोरंजन करती है,
बल्कि समकालीन राजनीतिक–प्रशासनिक संस्कृति पर पाठक को सोचने को विवश भी करती है।

हार्दिक शुभकामनाएँ—यह व्यंग्य अपने तन्ज़, बुद्धि और धारा–प्रवाह शैली में पूरी तरह सफल है।