छोटे बनाम बड़े बाबू डा राम कुमार जोशी

कलेक्ट्री के बाबूलाल की चौबीस साल की सर्विस हो चुकी थी पर कुल मिलाकर दो ही प्रमोशन मिल पाये थे। इस अवधि के दौरान दस कलेक्टरों की विदाई समारोह में चाय नमकीन के साथ मिठाई-बिस्किट भी खूब उड़ायें थे। जिले के इन बड़े साहिबी बाबूओं के कैरियर का अवलोकन करें तो हर तीसरे चौथे वर्ष प्रमोशन। बंगला, गाड़ी और हुकम हुजुरी। असल में काम तो छोटा बाबू ही करता है पर वाहवाही के साथ माल मलींदे ऊपर वालों के हिस्से। क्या देश के सभी छोटे बाबू बिचारे ऐसे ही ईर्ष्या के मारे मर जाय।अजीब राज पद्धति तय हुई है। छोटे बाबूजी के जीवन में जन्म से ही उलझाव गले पड़ा था। जब पैदा हुए उस समय भी मां के पेट में अपनी नाल से ही उलझ पड़े थे सो आपरेशन थियेटर में जनम लेना पड़ा। उस समय हाॅस्पीटल के किसी बाबू ने डाक्टरों को सिफारिश से लेकर आपरेशन थियेटर तक में बड़ी मदद की थी। इसलिए मां की इच्छा थी कि मेरा बेटा बाबू बने और नाम भी बाबूलाल ही रखा। बाबू लाल ने मां की मनुहार को समझते बाबूगिरी पकड़ ली थी। मां अगर तहसीलदार की सोचतीं तो शायद नाम भी तहसीलदार सिंह होता और तहसीलदारी भी करते होते। बाबूजी के जीवन में सबसे पहले वाले कलेक्टर साहब, जिन्होने नौकरी शुरू करवाईं थी वो आज पूरे प्रदेश के सेक्रेटरी बन बड़े-बड़े नोटिस निकाल रहे हैं। सुपर डूपर स्केल की तनख्वाह ले रहे और ऊपरी कमाई का तो पार ही नहीं। भले सोना चांदी ख़रीद खा सके तो खाएं, इस जनम रुपयों पैसों की कमी नहीं आनी।

कलेक्टर बन के आये आये थे तब चांदी के रूपए के बराबर बड़ी बड़ी आंखें थी। तन से पिलपिले दुबले ही कहे जा सकते थे और साल दो साल हुआ ही था शरीर पर वो चर्बी चढ़ी कि आंख तो अठन्नी साइज ही रह गयी और वजन से भारी भरकम कहलाने लग गये। शुरुआत में तो बाबूजी को इन अफसरों से बड़ा डर लगता था पर धीरे धीरे सबकुछ सामान्य सा होगया। बड़े बुजुर्ग कहते भी थे कि “अफसर तो माटी का भी ख़राब” पर समय से समझ आ गया कि ये तो माटी से भी गये गुज़रे हैं। चाहे जैसे चकरी में घुमा दो गोल-गोल घूमते रहेंगे। अनुभवी होने केबाद आजकल बाबूजी सिर्फ उसी फ़ाइल में हाथ डालते हैं जो ज़रा कीमती और वजनी होती है। दैनिक या रुटीन कार्य तो अपने आप ही होते हैं सो होते रहेंगे, यही समझ के साथ कलेक्ट्री आफिस आते ही सर्वप्रथम जूते उतार कर अपनी टेबिल के साईड में रख देते और वह सबको दिखते रहे ताकि कोई यह नहीं कह सके कि बाबूजी कहीं चले गए है। उसके बाद ड्राअर में रखे चप्पल पहन चाय कैंटीन में अपना आसन्न जमा देते थे। कैंटीन में आने जाने वाले यह सोचकर इनके लिए चाय- पानी- गुटके की व्यवस्था कर देते थे कि कभी काम ही आयेंगे और नहीं तो बाबूजी को झड़पना तो आता ही था। ऐसे ही आफिस का समय काट लेते थे। उधर आफिस में कोई पूछ भी लेता तो पास की टेबल पर जमें हैड साहब कह देते कि जूते यही पड़े हैं कहीं इधर उधर काम से गये होंगे, आ जायेंगे। इन्तजार करों। कोई शिकवा शिकायत करें तो भी कैसे? बाबूजी के जूते ढाल बने हुए थे। कलेक्ट्री के बाबुओं में आपसी मिलीभगत व तालमेल तारीफें काबिल था।

एक दिन चपरासी आया और सीट खाली देख बैरंग लौट गया पर जाते हैड साहब को संदेश देगया- “कलेक्टर साहब का बुलावा है किसी इलेक्शन की फाइल की पूछ रहें थे, कलेक्टर बड़ा कड़क हैं। ध्यान रहे।” जब बड़े साहब ने बाबूजी के लिए बुलावा भेजा, उस समय बाबूजी तो कैंटीन में फ्री की चाय -काॅफ़ी का मजा ले रहे थे। आखिर विभिन्न सूत्रों के मार्फत बाबूजी तक समाचार पहुंच ही गये कि बुलावा आया है और खुद को जवाबदेही केलिए तैयार किया और साहब के चैम्बर में पहुंच गए। कलेक्टर – कहिये। क्या काम है। बाबूजी – (नम्रता पूर्वक) सर, आपने बुलाया। कलेक्टर – किस बात केलिए। बाबूजी – (मुंह टेढ़ा कर) मुझे कैसे पता लगे कि आपने किसलिए बुलाया। आप का चपरासी आया था, सो हाजिर हुआ हूं। तुम क्या करते हो, कलेक्टर ने पूछा। बाबूजी – (भरमाने की इच्छा के साथ) बाबू हूं। चेयर जो कार्यादेश जारी करती हैं, वहीं करता हूं। कलेक्टर – अरे भई कुछ तो चार्ज होगा। बाबूजी – चार्ज तो अफसरों का होता है साहब! हमारे हिस्से में चार्जशीट आती है। काम तो बहुत किये और कद्र करने वाले भी चले गये। हां सर! पिछले साहब ने अनेकों काम के साथ इलेक्शन कार्य सौंपा था। फ़ाइलें सम्हालते थक गया। वो ही रोज़ दर रोज गिनता हूं। आपकी इनायत हो कुछ कर दिखाएं। कलेक्टर पूछा – अच्छा, आप इलेक्शन का कार्य देखते हैं। बाबूजी – हा, सर एम पी- एमएलए के इलेक्शन हुए भी सालों गुजर गये। पंचायत के ड्यू है। पता नही कब हो? दिन रात एक करते हैं तब कहीं पार लगती है। कलेक्टर – हां तो मैं कह रहा था,अगले दो महीने में पंचायत के इलेक्शन होने वाले हैं सो पिछले इलेक्शन की फ़ाइल मुझे देना सो समय पर हम अपडेट हो जाय। महत्वपूर्ण कार्यक्रम है। सारी जानकारी टिप्स पर होनी चाहिए। बाबूजी – हा सर, फाइल पुरानी है सो ढूंढ कर लानी होगी, देखता हूं एकआध दिन में हाजिर कर दूंगा। ठीक है, कलेक्टर साहब ने कहा और जाने का इशारा कर दिया। बाबूजी जानते थे कि फाइल अलमारी में सुरक्षित रखी है पर अगर सरलता से दे दी तो बाबूपना कैसा। दो तीन दिन बाद फिर तलब हुए तो बता दिया कि साहब उसे मैंने एडीएम साहब को दी थी। कलेक्टर साहब ने एडीएम को पूछा तो उन्होंने स्पष्ट रुप से अनभिज्ञता व्यक्त कर दी। कलेक्टर ने एडीएम के साथ बाबूजी को तलब किया तो बाबूजी स्पष्ट कह गये कि ये वाले एडीएम साहब नही, इनसे पहले वाले साहब को दी थी। आपको सुनने में भरम हो गया। “पुराने वाले एडीएम फाइल को क्या साथ ले जायेंगे! भरमाने की जरुरत नहीं, ढूंढ के लाइये।” कलेक्टर साहब ने कड़काई से कहा और जाने का इशारा कर दिया। बाबूजी अपने कमरे में आने के बजाय घर चले गये पर जाते जाते हैड साहब को कह गये कल का छोकरा आएएस क्या बन गया जैसे सारी कायनात इनको ही चलानी है? ऐसे क्या फाइल मिलें! हम भी समझते हैं। “हैड साहब ! कोई पूछे तो कह देना कि पुरानी बिल्डिंग के स्टोर में ढूंढने गये है। मिलेगी तभी आफिस आयेंगे। दो तीन दिन तो लग ही जायेंगे।” इस बीच कलेक्टर के बुलावे आते रहे और हैड साहब उन्हें समझाते रहे कि चार-पांच साल पुरानी फाइल है और दो तीन स्टोर है। ढूंढने में समय तो लगता ही है। अर्जेट होती तो हम सब ढूंढते। धैर्य रखिए सर। इस मामले में हैड साहब और बाबूजी के तालमेल की मजबूती कुछ ज्यादा ही नज़र आईं। और बाबूजी लगातार तीन दिन घर पर आराम करते रहे। आखिर चौथे दिन घर की चाय से उबकाई सी आई तो आफिस पहुंच गए। अलमारी से फाइल निकाल उसके दो हिस्से कर दिए। जिस भाग में ख़रीद संबंधी कागजात थे वो पुनः अपनी अलमारी में और शेष भाग को बड़े आत्मविश्वास से अति लवरेज हो कलेक्टर के रुबरु हो इलेक्शन वाली फाइल पेश कर दी जिसको निचोड़ने से एक रूपया भी नहीं टपके। बाबूजी – सर बुरा मत मानना, इस फ़ाइल को ढूंढना समुद्र में से मोती निकालने जैसा था। मैंने भी सोच लिया था कि कैसे भी हो हाजिर करनी ही है। तीन स्टोर खंगाल डाले। मिली तो है पर फाइल अधूरी है, मेरे को जैसी मिलीं सर! हाजिर है। फिर रुककर -सर! आप कहें तो अकाउंट सेक्शन के स्टोर भी देख लूं। छोटी छोटी वस्तुओं की परचेज ही सबसे ज्यादा मुश्किल होता है। (ठहर कर) हम सब संभाल लेंगे। आप तो हैड साहब के अनुभवों का लाभ ले। बहुत काॅपरेटिव क़िस्म के व्यक्ति हैं। आपको अदल नही आने देंगे। सभी तरह के इलेक्शन करवा चुके हैं। आजतक आडिट पैरा नहीं बना। बाबूजी के अंतिम वाक्य को मन में दोहराते कलेक्टर साहब भी समझ गये। सोच रहे थे कि इस शाही नौकरी में अगर चिंता करनी पड़े तो बेकार है। ज्यादा चिंता से सिर के बाल भी उड़ते हैं और शुगर- बीपी की बीमारी तो साथ आनी ही है। जब ये लोग भार उठाने केलिए तैयार हैं तो सबसे उत्तम। वैसे सूखी तनख्वाह भी घर में झगड़े की जड़ बन रही है। पत्नीजी के लिए कीमती गहनों की सृष्टि हेतु रोकड़ धन ही उपाय है। “रोकड़े रोग नाशंते”। बाबूजी का इशारा कामयाबी भरा नज़र आया। बस अंधे को क्या चाहिए थी, आंखें। आखिर कलेक्टर साहब को गुरु मंत्र मिल गया। उधर बाबूजी तुरंत अपने कक्ष में आये और हैड साहब के चरण छुकर घोषणा की कि शिकार बोतल में आ चुका है। आप आज ही साहब के बंगले जा, अग्रिम भेंट पूजा के साथ नया परिचय कर आवें। इस तरह बाबूओं के जाल में जिले के सबसे बड़े बाबू सरकार भी सम्मिलित हो गये। विकास की गंगा परचेज टेण्डर के माध्यम से बह निकली।

Ram Kumar Joshi

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डा राम कुमार जोशी ललित कुंज, जोशी प्रोल सरदार पटेल…

डा राम कुमार जोशी ललित कुंज, जोशी प्रोल सरदार पटेल मार्ग, बाड़मेर (राज) [email protected]

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