शादी में एक रोटी की तलाश

शादी में एक रोटी की तलाश
(प्रदीप औदिच्य)
—- अंदर घुसते हुए एक बात महसूस हुई कि मै किसी राजमहल में हूं । ये राजसी वैभव सिर्फ हमारे लिए
है।
आधे घंटे के लिए ही सही पर हमने खुद को किसी राज परिवार का वंशज मान लिया । कार्ड पर नाम से
लेकर सजावट तक राजमहल सी थी ।अंदर घुसे तो पहले तो उन्हें तलाश किया, जिन्होंने बुलाया था
।व्हाट्स ऐप पर प्राप्त सुंदर से कार्ड में उनकी आंखें हमारी प्रतीक्षा में बताई गई थीं। हमें लगा कि हमारा
ही इंतजार वहां होगा।वह दरवाजे पर हमारे लिए पलक पांवड़े बिछाए इंतजार कर रहे होगे।
पर वह दरवाजे पर तो नजर ही नहीं आए मन में ये खुटका लगा कि कोई टोक न दे।
शादी के दरवाजे पर कार्ड के निवेदक मिल जाने पर मन ही मन तसल्ली होती है कि सब एक बार देख लें
। आसपास खड़े लोग समझ लें ये बिना बुलाया आदमी नहीं है ।
अब अगला कदम में सीधा टारगेट होता है कि खाना खाने वाला मोहल्ला ?बाकी बड़े से स्टेज पर खाली
दूल्हा दुल्हन की कुर्सी दिखाई देती है।
महंगे सूट या साड़ी पहने बड़ी सी गाड़ी से उतर कर आने वाले भी समझ जाते है कि रोटी का संघर्ष कमाने
नहीं,खाने का ज्यादा होता है।
अभी आप थोड़ा सा वापिस दरवाजे की तरफ चलिए।,क्या आपको जिसने बुलाया वह मिले नहीं न,,तो
आप शादी में आए या नहीं आए ये किसने देखा ? आपके स्वागत में कौन था ? आप मेहमान है अतिथि
देव भव् का सूत्र का पालन हुआ या नहीं ? बस भीड़ के हिस्से में चले गए शादी समझ कर अंदर गए पर
चला ये भंडारा चल रहा है ।
किसी को किसी से कोई मतलब नहीं कोई एक दो जान पहचान वाले मिल गए तो ठीक वरना भीड़ में
भेड़ की मानिंद एक टेबल से दूसरे टेबिल तक चले आइए।
फिर झांकिए कंधे उचका कर यहां क्या है ? आप नजरें घुमाकर प्रारंभ बिंदु खोजते है ।किसी से पूछते है
प्लेट कहां है? वह दूर एक टेबिल की तरफ इशारा कर देता है।अब आपको लगेगा कि मैं स्कूटर ही अन्दर
ले आता । परिवार के हाथ से निकली शादी अब कम्पनियों के हवाले है।
इतनी तामझाम में शादी की इवेंट कंपनी के लोग दो तीन ई रिक्शे भी लगवा दें तो सुविधा हो जाती।
अब असली संघर्ष शुरू होता है तंदूर पर । महंगा सा सूट पहने आदमी अपनी प्लेट में सलाद के तीन चार
टुकड़े और दो सब्जी लेकर खड़ा हुआ है।वह भीड़ के ऊपर से आवाज देकर तंदूर वाले से एक रोटी की
डिमांड करता है।तंदूर वाला उसे ऐसे देखता है, जैसे पहले खड़े आदमी उस से सोना चांदी खरीदने आएं,
बस यही आया है अकेला रोटी लेने ।

तंदूर वाला निर्दय है। वह उसकी आवाज पर पिघलता नहीं है ।वह तो चुपचाप तल्लीनता से अपने काम में
लगा है।
वह तीन रोटी निकालता और थाल में पटक देता है ।,वहां पहले से बहुत देर तक अर्जुन के तरह तीर
संधान कर लक्ष्य साधे खड़े लोग उन तीन रोटी पर टूट पड़ते हैं।
एक के हाथ में आधी रोटी आई।वह भी स्वयंवर में जीती हुई राजकुमारी की तरह विजय भाव चेहरे पर
लेकर भीड़ से बाहर निकलने की कोशिश करता है।
उसके दूसरे हाथ में प्लेट ऊंची होती है।इस डर से नहीं कि उसकी सब्जी किसी के कपड़े पर लग जाएगी।
ये सोचकर कि संघर्ष से प्राप्त आधी रोटी भी कोई और न उठा लें।
मै भी बहुत देर से प्रयासरत हूं ।मन कहता है एक रोटी खा लूं,।तभी भीड़ में एक कड़क आवाज गूंजी एक
बिना घी वाली रोटी देना।मैने उसे देखा तो ये वही सज्जन थे जो थोड़ी देर पहले तेल वाली चाट और घी से
तर हलवा को दो कटोरी उदरस्त कर चुके थे।
अपन भी प्लेट में ठंडी होती सब्जी की इज्जत रखते हुए एक रोटी की तलाश में थे ।थोड़ी देर बाद उस
तंदूर वाले को मुझ कर दया आई और उसने एक रोटी मुझे दे दी।

Pradeep Audichya

प्रदीप औदिच्य आयु 48 वर्ष शिक्षा bsc.MA LLB. व्यवसाय वकालत…

प्रदीप औदिच्य आयु 48 वर्ष शिक्षा bsc.MA LLB. व्यवसाय वकालत पठन पाठन में स्कूल समय से रुचि व्यवस्थित लेखन वर्ष 2020 से,, व्यंग्य रचना स्वदेश समूह में नियमित कॉलम प्रारंभ लगभग 300 से अधिक व्यंग्य, स्वदेश,अमर उजाला,दैनिक ट्रिब्यून,जागरण सहित विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित,, पीपुल्स समाचार चैनल के लिए भी व्यंग्य लेखन,, पता MIG 4 housing board colony near budhe balaji mandir Guna Madhya Pradesh 473001

Comments ( 1)

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डॉ मुकेश 'असीमित'

14 minutes ago

यह रचना भारतीय शादियों के वैभव और वास्तविक मानवीय व्यवहार के बीच के विरोधाभास को अत्यंत रोचक और व्यंग्यात्मक ढंग से सामने लाती है। राजसी सजावट के बीच “एक रोटी” का संघर्ष मध्यमवर्गीय मनोविज्ञान और भीड़-व्यवहार की सटीक तस्वीर बन जाता है। लेखक ने सूक्ष्म अवलोकन और सहज भाषा के माध्यम से साधारण दृश्य को सामाजिक टिप्पणी में बदल दिया है।