Pradeep Audichya
Aug 4, 2026
व्यंग रचनाएं
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लेखक किसी रचना को विचारों की प्रसव-पीड़ा सहकर जन्म देता है, शब्दों और मात्राओं से पालता-पोसता है और फिर पत्र-पत्रिका को भेज देता है। लेकिन जब वही रचना संपादक के “खेद सहित” लौट आती है, तो लेखक के मन की दशा वैसी हो जाती है जैसे मोबाइल घंटों चार्ज पर लगा हो और बाद में पता चले कि स्विच ही बंद था। साहित्यिक दुनिया की इसी विडंबना पर एक आत्मीय और चुटीला व्यंग्य।
Pradeep Audichya
Jul 24, 2026
व्यंग रचनाएं
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जब जीवन का धर्मयुद्ध मोबाइल स्क्रीन पर लड़ा जाने लगे और रिश्तों की पहचान लाइक-कमेंट से होने लगे, तब आधुनिक पार्थ को जगाने के लिए केशव भी नया डिजिटल ज्ञान देते हैं। पढ़िए सोशल मीडिया की आदतों पर तीखा और मनोरंजक व्यंग्य।
Pradeep Audichya
Jun 23, 2026
व्यंग रचनाएं
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बचा हुआ लोकतंत्र,, – लोकतंत्र किसके पास है ? ये प्रश्न मंच ने नीचे भरी सभा में फेंका ।इतनी जोर से फेंका कि तंत्र द्वारा घेरकर लाए गए लोक ( लोग) डर गए। लोग सोचने लगे शायद कुछ चोरी हो गया और इसका इल्ज़ाम हमपर आयेगा ।सभा में लोग एक दूसरे को संदेह की निगाह […]
Pradeep Audichya
Jun 7, 2026
व्यंग रचनाएं
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"टैंकर देखकर प्यास बुझाओ" प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रदीप औदिच्य की एक मार्मिक और तीखी व्यंग्य रचना है, जिसमें ग्रामीण भारत की जल समस्या, सरकारी विभागों की लालफीताशाही, कागजी विकास, हैंडपंपों की दुर्दशा और फोटो-आधारित राजनीति पर करारा कटाक्ष किया गया है।
Pradeep Audichya
Mar 30, 2026
Cinema Review
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धुरंधर फिल्म में अब्दुल भट्ठाबी का किरदार निभाकर संजय मेहता ने एक बार फिर साबित किया कि रंगमंच की गहराई सिनेमा में भी उतनी ही प्रभावशाली होती है। उनकी यात्रा, तैयारी और अनुभव इस लेख में विस्तार से प्रस्तुत हैं।
Pradeep Audichya
Feb 22, 2026
व्यंग रचनाएं
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राजमहल जैसे वैभव के बीच, असली युद्ध तंदूर पर था—एक रोटी की तलाश में खड़े आधुनिक अर्जुन।
Pradeep Audichya
Dec 16, 2025
व्यंग रचनाएं
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चौराहे पर बैठा वह कोई साधारण जानवर नहीं था—वह डर, लापरवाही और व्यवस्था की मिली-जुली पैदाइश था। उसकी गुर्राहट में कानून की चुप्पी और उसके सींगों में सत्ता की स्वीकृति चमक रही थी।
Pradeep Audichya
Nov 10, 2025
व्यंग रचनाएं
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भरोसीलाल ने चाय के डिस्पोज़ल कप को देखते हुए कहा — “ये चाय है चुनाव और कप है जनता, चुनाव खत्म तो जनता कचरे में!”
चुनाव के मौसम में बिजली ओवरटाइम करती है, सड़कें अचानक स्वस्थ हो जाती हैं, और नेता जनता की “कीमत” लगाते हुए मंडी में उतर आते हैं। वोट की कीमत कभी दस हज़ार, कभी तीस हज़ार, तो कभी एक साड़ी और पेय पदार्थ में तय होती है। भरोसीलाल का निष्कर्ष था — “इससे बढ़िया हाट बाजार तो कोई हो ही नहीं सकता!”
Pradeep Audichya
Sep 21, 2025
व्यंग रचनाएं
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"अंगूठा डिजिटल युग का असली मुखिया है—स्याही वाले निशान से पहचान तक और मोबाइल की स्क्रीन पर टाइपिंग तक। लेकिन दुख यह है कि अंगूठे की जिम्मेदारी जितनी बढ़ी, सम्मान उतना नहीं मिला। उंगलियाँ अंगूठियों से सजती-संवरती रहीं, और अंगूठा दर्द झेलता रहा। उसका दुख वही है—‘अंगूठे का दर्द, अंगुली नहीं जानती।’ यही व्यंग्य है कि पहचान भी वही तय करे और बलिदान भी वही दे।"
Pradeep Audichya
Jul 31, 2025
व्यंग रचनाएं
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नेता जी ने बचपन में ही तय कर लिया था कि वह सिर्फ नेता बनेंगे। अब जनसेवा के नाम पर वह चाय की दुकानों पर घूमते हैं, उधारी बढ़ाते हैं और हर बात में कहते हैं – "मेरी बात ऊपर हो गई है।" कार्यकर्ता जेल में हो या शहर अधर में – समाधान ऊपर तय होता है।