Pradeep Audichya
Jun 7, 2026
व्यंग रचनाएं
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"टैंकर देखकर प्यास बुझाओ" प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रदीप औदिच्य की एक मार्मिक और तीखी व्यंग्य रचना है, जिसमें ग्रामीण भारत की जल समस्या, सरकारी विभागों की लालफीताशाही, कागजी विकास, हैंडपंपों की दुर्दशा और फोटो-आधारित राजनीति पर करारा कटाक्ष किया गया है।
Pradeep Audichya
Mar 30, 2026
Cinema Review
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धुरंधर फिल्म में अब्दुल भट्ठाबी का किरदार निभाकर संजय मेहता ने एक बार फिर साबित किया कि रंगमंच की गहराई सिनेमा में भी उतनी ही प्रभावशाली होती है। उनकी यात्रा, तैयारी और अनुभव इस लेख में विस्तार से प्रस्तुत हैं।
Pradeep Audichya
Feb 22, 2026
व्यंग रचनाएं
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राजमहल जैसे वैभव के बीच, असली युद्ध तंदूर पर था—एक रोटी की तलाश में खड़े आधुनिक अर्जुन।
Pradeep Audichya
Dec 16, 2025
व्यंग रचनाएं
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चौराहे पर बैठा वह कोई साधारण जानवर नहीं था—वह डर, लापरवाही और व्यवस्था की मिली-जुली पैदाइश था। उसकी गुर्राहट में कानून की चुप्पी और उसके सींगों में सत्ता की स्वीकृति चमक रही थी।
Pradeep Audichya
Nov 10, 2025
व्यंग रचनाएं
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भरोसीलाल ने चाय के डिस्पोज़ल कप को देखते हुए कहा — “ये चाय है चुनाव और कप है जनता, चुनाव खत्म तो जनता कचरे में!”
चुनाव के मौसम में बिजली ओवरटाइम करती है, सड़कें अचानक स्वस्थ हो जाती हैं, और नेता जनता की “कीमत” लगाते हुए मंडी में उतर आते हैं। वोट की कीमत कभी दस हज़ार, कभी तीस हज़ार, तो कभी एक साड़ी और पेय पदार्थ में तय होती है। भरोसीलाल का निष्कर्ष था — “इससे बढ़िया हाट बाजार तो कोई हो ही नहीं सकता!”
Pradeep Audichya
Sep 21, 2025
व्यंग रचनाएं
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"अंगूठा डिजिटल युग का असली मुखिया है—स्याही वाले निशान से पहचान तक और मोबाइल की स्क्रीन पर टाइपिंग तक। लेकिन दुख यह है कि अंगूठे की जिम्मेदारी जितनी बढ़ी, सम्मान उतना नहीं मिला। उंगलियाँ अंगूठियों से सजती-संवरती रहीं, और अंगूठा दर्द झेलता रहा। उसका दुख वही है—‘अंगूठे का दर्द, अंगुली नहीं जानती।’ यही व्यंग्य है कि पहचान भी वही तय करे और बलिदान भी वही दे।"
Pradeep Audichya
Jul 31, 2025
व्यंग रचनाएं
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नेता जी ने बचपन में ही तय कर लिया था कि वह सिर्फ नेता बनेंगे। अब जनसेवा के नाम पर वह चाय की दुकानों पर घूमते हैं, उधारी बढ़ाते हैं और हर बात में कहते हैं – "मेरी बात ऊपर हो गई है।" कार्यकर्ता जेल में हो या शहर अधर में – समाधान ऊपर तय होता है।
Pradeep Audichya
Jul 14, 2025
व्यंग रचनाएं
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सेठजी को अब ‘सेठ’ होने से संतोष नहीं, उन्हें ‘समाजसेवी’ भी बनना है—वो भी बिना समाज की सेवा किए! अखबार, होर्डिंग, माला और माइक की व्यवस्था है, गाय तक बुलवाई गई है फोटो के लिए। जीवन पर प्रकाश डालते मास्टर साहब बिजली चोरी, मंदिर पर कब्ज़ा और गरीबों की "सुरक्षा" के किस्से खोल देते हैं। मुनीम तुरंत टोका — “अब ज्यादा प्रकाश ठीक नहीं है।”
Pradeep Audichya
Jun 30, 2025
व्यंग रचनाएं
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बारिश की रात झींगुरों की आवाज़ को कभी ध्यान से सुनिए – वो बस टर्राहट नहीं, एक आंदोलन की गूंज है। वे मंच पर अधिकारों की मांग कर रहे हैं – आरक्षण, रॉयल्टी, बिजली के खंभे, होटल प्रवेश और एक "झींगुर अत्याचार निवारण आयोग" की स्थापना!