डॉ. शैलेश शुक्ला की 5 लघुकथाएँ
1. वारिस
रामखेलावन के पास तीन बीघे ज़मीन थी, एक टूटी खटिया और एक बेटा — रघु। तीनों में सबसे कीमती उसे रघु लगता था।
पर रघु को ज़मीन चाहिए थी। बूढ़े बाप की नहीं, ज़मीन की।
“बाबू, एक बार रजिस्ट्री करवा दो अपने नाम की।”
“अरे, तुम्हीं तो खाओगे बेटा। लेकिन जीते जी क्यों?”
“तो फिर कब? मरने के बाद?”
रामखेलावन चुप हो गया। उस चुप्पी में एक अजीब-सी सिहरन थी, जो उसने महसूस तो की, पर समझा नहीं।
उस रात रघु ने पड़ोसी से उधार लिया — एक लाठी नहीं, एक योजना। सुबह जब मुनीमजी रजिस्ट्री के कागज़ लेकर आए, तब रामखेलावन उन्हें देखने के लिए ज़िंदा नहीं था।
पंचायत बैठी। सरपंच ने रघु की आँखों में देखा।
“रोता क्यों नहीं?”
“आँसू… बाप की मौत के लिए नहीं, ज़मीन रुकने के लिए हैं।”
गाँव सन्न रह गया। ज़मीन अब भी उसी के नाम थी। पर अब वह वारिस था — बाप का नहीं, उसके कातिल का।
जिस घर की नींव खून से सींची जाए, उसमें चैन कभी नहीं बसता।
2. नमक का हक़
पंद्रह साल से रमेसर उनके घर में था। सेठ हरिप्रसाद उसे बेटे की तरह मानते थे — कम से कम यही कहते थे।
रमेसर सब जानता था — कहाँ तिजोरी है, कहाँ चाबी रखती हैं मालकिन, किस रात कोई नहीं रहता।
“रमेसर, तू तो घर का हिस्सा है।” सेठजी अक्सर कहते।
“हाँ सेठजी, घर का ही हिस्सा हूँ।” रमेसर मुस्कुराता।
वह मुस्कान अब पुलिस की फ़ाइल में थी।
सोमवार की रात — जब सेठजी तीर्थ पर थे — चार आदमी आए। ताले टूटे नहीं, खुले। दरवाज़ा तोड़ा नहीं, खुला मिला। तिजोरी की चाबी कहाँ थी, सब जानते थे।
इंस्पेक्टर ने रमेसर को बुलाया।
“उस रात तू कहाँ था?”
“घर पर।”
“किसके घर पर?”
रमेसर की आँखें झुक गईं। सेठजी को अब समझ आया — वह पंद्रह साल से नमक नहीं, मौका खा रहा था।
जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया — इतनी सफ़ाई से कि थाली को पता भी न चला।
विश्वास आँखों से नहीं, नीयत से परखा जाता है — पर नीयत दिखती तब है जब बहुत देर हो चुकी होती है।
3. कागज़ की ढाल
डॉ. विनोद शर्मा ने छत्तीस घंटे जागकर परीक्षा दी थी। रैंक आई — 47वीं। सीट नहीं मिली।
जिसे मिली, उसकी रैंक थी — 312वीं। नाम था — सुरेंद्र मेघवाल। उसके पास एक प्रमाण-पत्र था। काफी था।
यह व्यवस्था थी। इसे स्वीकार करना था।
पर जब विनोद ने अपना दुख कहा, तो सुरेंद्र ने कहा —
“तुम्हारे बाप-दादा ने हमारे साथ क्या किया था? भूल गए?”
“मेरे बाप किसान थे। किसी के साथ कुछ नहीं किया।”
“फिर भी तुम सवर्ण हो। तुम्हें भुगतना पड़ेगा।”
विनोद चुप रहा। सुरेंद्र के पिता आईएएस थे। उनके घर में तीन गाड़ियाँ थीं। और फिर भी — प्रमाण-पत्र था।
विनोद ने एक दिन अपनी माँ से पूछा।
“माँ, हम किस जाति के हैं?”
“बेटा, इंसान की।”
“तो क्या यही हमारी गलती है?”
माँ के पास जवाब नहीं था। संविधान के पास था — पर वह जवाब अब हर किसी की ज़रूरत नहीं बना था, सिर्फ़ हथियार बन गया था।
न्याय वह नहीं जो एक को मिले — न्याय वह है जो सबको एक तराज़ू पर तोले।
4. जाति की छतरी
क्लर्क प्रताप नारायण जाटव की मेज़ पर फ़ाइलें रुकती थीं — महीनों, सालों। पर वे रुकती तभी थीं जब लिफ़ाफ़ा न हो।
जब कोई शिकायत करता, तो प्रताप नारायण एक ही जवाब देते।
“तुम हमारे ऊपर अत्याचार कर रहे हो। हम दलित हैं।”
“पर आपने फ़ाइल दबाई है।”
“यह तुम्हारी ऊँची जाति की सोच है।”
शिकायतकर्ता डर जाता। एससी/एसटी एक्ट का नाम सुनते ही पाँव काँपते थे। प्रताप नारायण यह जानते थे। इसीलिए मुस्कुराते थे।
एक दिन एक युवा अफ़सर आई — आईपीएस, अनुसूचित जाति की ही। उसने प्रताप की फ़ाइल उठाई।
“तुम मेरी जाति के हो। शर्म नहीं आती?”
“मैडम, जाति का कार्ड—”
“वह कार्ड अब नहीं चलेगा। आरक्षण अधिकार था — भ्रष्टाचार की ढाल नहीं।”
प्रताप नारायण को निलंबित किया गया। उस दिन पहली बार उनकी जाति काम नहीं आई — क्योंकि सामने वाला भी उसी जाति का था, और उसने जाति से बड़ा ईमान चुना था।
जाति बचाव नहीं, पहचान है — जो भ्रष्टाचार की आड़ बने, वह पहचान नहीं, कलंक है।
5. मुफ़्त का नशा
बुधिया के गाँव में सरकारी योजनाएं आईं — राशन, गैस, बिजली बिल माफी, नकद। बुधिया खुश था।
पहले साल उसने काम छोड़ा।
“मिल तो रहा है।”
दूसरे साल उसने खेत पड़ोसी को दे दिया।
“मेहनत किसलिए?”
तीसरे साल उसके बेटे ने स्कूल छोड़ा।
“पढ़कर क्या करेंगे, फ़्री में सब मिलेगा।”
पाँच साल बाद चुनाव आए। नेताजी गाँव में आए।
“इस बार और देंगे — मोबाइल, साइकिल, पचास हज़ार नकद।”
“और काम?” किसी ने पूछा।
“काम? वो तुम करोगे तो हम देंगे क्यों?”
बुधिया ने ताली बजाई। पर उसके हाथ अब उतने मजबूत नहीं थे — पाँच साल की बेकारी ने उन्हें ढीला कर दिया था।
Comments ( 1)
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डॉ मुकेश 'असीमित'
4 hours agoडॉ. शैलेश शुक्ला की ये लघुकथाएँ आकार में छोटी लेकिन प्रभाव में अत्यंत तीखी हैं। हर कथा समाज के एक ऐसे सच को सामने लाती है जिसे हम अक्सर देख तो लेते हैं, पर स्वीकार करने से बचते हैं। इन कथाओं में लालच, विश्वासघात, व्यवस्था की विसंगतियाँ, जाति की राजनीति और मुफ़्तखोरी की मानसिकता का गहरा सामाजिक चित्र उभरता है। कम शब्दों में गहरी चोट करना ही इन लघुकथाओं की सबसे बड़ी ताकत है।