जाति, गरीबी और अवसर: क्या आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा का समय आ गया है?
क्या भारत की आरक्षण व्यवस्था का लाभ सबसे जरूरतमंद नागरिकों तक पहुँच रहा है? सामाजिक न्याय, आर्थिक अभाव, अनाथ और दिव्यांग बच्चों के लिए आवश्यकता-आधारित अवसरों पर संतुलित विमर्श।
राजभाषा अधिकारी, एनएमडीसी लिमिटेड [भारत सरकार का उद्यम] हीरा खनन परियोजना, मझगवाँ, पन्ना (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए.(हिंदी), एम.ए.(जनसंचार), पीएचडी प्रकाशन : भारत सहित विश्व के अनेक देशों से प्रकाशित विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं - अस्मिता, राजभाषा भारती,
क्या भारत की आरक्षण व्यवस्था का लाभ सबसे जरूरतमंद नागरिकों तक पहुँच रहा है? सामाजिक न्याय, आर्थिक अभाव, अनाथ और दिव्यांग बच्चों के लिए आवश्यकता-आधारित अवसरों पर संतुलित विमर्श।
लोकतंत्र : संवैधानिक प्रावधान और वास्तविक व्यवहार में बड़ा अंतर डॉ. शैलेश शुक्ला लोकतंत्र को विश्व की सर्वाधिक जनोन्मुख और उत्तरदायी शासन व्यवस्था माना जाता है। इसकी मूलअवधारणा अत्यंत सरल और आकर्षक है—सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। जनता अपनेप्रतिनिधियों का चुनाव करती है, सरकार बनाती है और अंततः वही शासन की अंतिम स्वामिनी होती […]
भारतीय लोकतंत्र में मतदाता अब केवल परंपरागत राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहना चाहता। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, राजनीतिक ध्रुवीकरण और जनसमस्याओं के समाधान की कमी ने नागरिकों को नए राजनीतिक विकल्पों की तलाश के लिए प्रेरित किया है। आम आदमी पार्टी, टीवीके और सोशल मीडिया आधारित अभियानों की लोकप्रियता इसी बदलती जनभावना का संकेत है। यह लेख भारतीय मतदाता की मनोवृत्ति, राजनीतिक विश्वास के संकट और लोकतंत्र में उभरते नए विकल्पों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
भीषण गर्मी, सूखते जलस्रोत, प्रदूषित हवा और अनियोजित विकास आज मानव सभ्यता के सामने अस्तित्व का संकट बनकर खड़े हैं। यह लेख पर्यावरण संतुलन के बिगड़ते हालात और धरती को बचाने की अनिवार्यता पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है।
लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सत्ता से प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता में निहित होती है। यह लेख अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वायत्तता, मीडिया की जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है।
हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्षों के इतिहास में महिलाओं की भागीदारी अब भी बेहद सीमित है। यह लेख हिंदी मीडिया में महिला पत्रकारों की स्थिति, नेतृत्व में असमानता, लैंगिक पूर्वाग्रह और बदलाव की संभावनाओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
“जनता भविष्य नहीं देख पाती, इसलिए जनता है; और हम भविष्य पहले देख लेते हैं, इसलिए अधिकारी हैं।” “व्यवस्था नहीं सड़ी… व्यवस्था तो बहुत फलदायी है।” “मैंने केवल अवसर लिए, नियमों को समझा और संबंध निभाए।” “जब ‘मैं ही राष्ट्र’ हूँ, तो राष्ट्र की संपत्ति और मेरी संपत्ति में अंतर कैसा?” “पहले जमीन अपने नाम कराओ, फिर विकास का इंतजार करो।”
“पहले प्रकृति नष्ट करो, फिर प्रकृति की नकल खरीदो — यही आधुनिक विकास का सबसे बड़ा दर्शन बन चुका है।”
चुनावी घोषणा पत्र लोकतंत्र का सार्वजनिक वचन होते हैं, लेकिन आज वे अक्सर राजनीतिक प्रचार का साधन बनकर रह गए हैं। यह लेख चुनावी वादों की जवाबदेही, राजनीतिक नैतिकता और लोकतांत्रिक विश्वास की पुनर्स्थापना पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है।
पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन क्यों आवश्यक है? जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, सतत विकास, जल संरक्षण, जंगल, ऊर्जा और भारत के भविष्य पर आधारित विस्तृत हिंदी लेख पढ़ें।