एक ही देश में अलग-अलग राजनैतिक सच्चाइयाँ दिखाता सोशल मीडिया
एक देश, एक संविधान, एक राष्ट्रगान — लेकिन लाखों-करोड़ों अलग-अलग राजनीतिक
वास्तविकताएँ। यह विरोधाभास आज के डिजिटल युग में केवल संभव नहीं, बल्कि सामान्य हो चुका है।
सोशल मीडिया के एल्गोरिदम ने एक ऐसी अनोखी परिघटना उत्पन्न की है जिसमें दो नागरिक एक ही देश
में रहते हुए, एक ही दिन, एक ही घटना के बारे में बिल्कुल विपरीत ‘सच’ देखते और उस पर विश्वास करते
हैं। यह केवल दृष्टिकोण का अंतर नहीं है — यह तथ्यों के प्रति सर्वथा भिन्न ‘समानांतर वास्तविकताओं’ का
निर्माण है, जो सामाजिक एकता और लोकतांत्रिक संवाद के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है।
इस घटना को समझने के लिए हमें सोशल मीडिया एल्गोरिदम की मूल प्रकृति को समझना होगा।
फेसबुक, ट्विटर, यूट्यूब और इंस्टाग्राम के एल्गोरिदम का प्राथमिक लक्ष्य उपयोगकर्ता को अधिक से अधिक
समय तक मंच पर बनाए रखना है। इसके लिए वे उन्हें वही दिखाते हैं जिसे वे पहले से पसंद करते हैं, जिस
पर वे प्रतिक्रिया देते हैं, और जो उनकी मौजूदा मान्यताओं को मज़बूत करता है। इस प्रक्रिया में व्यक्ति धीरे-
धीरे एक ‘इको चेंबर’ में बंद हो जाता है जहाँ केवल उसकी अपनी आवाज़ की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।
फेसबुक की पूर्व कर्मचारी फ्रांसेस हाउजेन ने अक्टूबर 2021 में अमेरिकी सीनेट के समक्ष गवाही देते हुए
बताया था कि कंपनी का ‘एंगेजमेंट-बेस्ड रैंकिंग’ उग्र और विभाजनकारी सामग्री को बढ़ावा देता है — और
यह कंपनी के मुनाफे के लिए जानबूझकर किया जाता था।
भारत में व्हाट्सएप की भूमिका इस विभाजन का एक विशेष रूप है। भारत में व्हाट्सएप के
उपयोगकर्ताओं की संख्या करोड़ों में है और यह देश में राजनीतिक सूचनाओं के प्रसार का सबसे प्रमुख
माध्यम बन गया है। इंडियास्पेंड डेटा जर्नलिज्म वेबसाइट के अनुसार, जनवरी 2017 से जुलाई 2018 के
बीच बच्चा चोर गिरोह की अफवाहों से जुड़ी व्हाट्सएप संदेशों के कारण 69 से अधिक भीड़-हमले की
घटनाएँ हुईं जिनमें कम से कम 33 लोग मारे गए। ये अफवाहें जाति और धर्म के आधार पर अलग-अलग
समूहों तक पहुँचाई जाती थीं, जिससे एक ही घटना के बारे में समाज के विभिन्न वर्गों में बिल्कुल विपरीत
‘वास्तविकताएँ’ बनती थीं।
झूठी सूचनाओं के प्रसार की गति पर एमआईटी के शोधकर्ताओं सोरोश वोसोग्ही, देब रॉय और
सिनान अरल का 2018 में ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु है। उन्होंने
2006 से 2017 के बीच ट्विटर पर 126,000 समाचार श्रृंखलाओं का विश्लेषण किया और पाया कि झूठी
खबरें सच्ची खबरों की तुलना में 1,500 लोगों तक पहुँचने में करीब छह गुना तेज़ी दिखाती हैं। सबसे
महत्वपूर्ण यह था कि यह प्रसार बॉट्स की वजह से नहीं, बल्कि स्वयं मानवीय निर्णयों की वजह से हो रहा
था — लोग झूठी खबरों को इसलिए साझा करते हैं क्योंकि वे अधिक नई और भावनात्मक रूप से उत्तेजक
होती हैं।
भाषाई बुलबुलों का मामला भारत में विशेष रूप से गंभीर है। हिंदी, तमिल, बंगाली, तेलुगु, मराठी
— प्रत्येक भाषाई समूह का अपना सोशल मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र है। इन भाषाई बुलबुलों में जो
राजनीतिक आख्यान प्रचलित हैं, वे अक्सर एक-दूसरे से न केवल भिन्न, बल्कि परस्पर असंगत भी होते हैं।
एक ही राष्ट्रीय घटना को लेकर हिंदी भाषी सोशल मीडिया और दक्षिण भारतीय भाषाओं के सोशल
मीडिया में जो विमर्श बनता है, वह कभी-कभी मौलिक रूप से अलग होता है। यह भाषाई विभाजन पहले
से ही क्षेत्रीय और सांस्कृतिक विभाजनों को और गहरा करता है।
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के इंटरनेट इंस्टीट्यूट की 2019 की ‘द ग्लोबल डिसइन्फर्मेशन ऑर्डर’
रिपोर्ट ने 70 देशों में सोशल मीडिया पर संगठित जनमत-हेरफेर का दस्तावेज़ीकरण किया। इस रिपोर्ट में
भारत को उन सात देशों में शामिल किया गया जो फेसबुक और ट्विटर पर वैश्विक प्रभाव अभियान चलाते
हैं। रिपोर्ट में पाया गया कि फेसबुक 56 देशों में सोशल मीडिया हेरफेर का प्रमुख मंच बना हुआ है। इन
ऑपरेशनों में हज़ारों फर्जी और वास्तविक खातों का उपयोग करके विशेष राजनीतिक विमर्श को ‘ट्रेंड’
कराया जाता है और विरोधी विमर्श को दबाया जाता है।
अमेरिका में 2016 और 2020 के राष्ट्रपति चुनावों में यह ध्रुवीकरण अत्यंत स्पष्ट था। पीयू रिसर्च
सेंटर के अध्ययनों के अनुसार, डेमोक्रेट और रिपब्लिकन समर्थकों के मीडिया उपभोग में भारी अंतर था।
दोनों वर्ग न केवल अलग-अलग समाचार स्रोतों पर निर्भर थे, बल्कि उनकी तथ्यात्मक मान्यताएँ भी एक-
दूसरे से मेल नहीं खाती थीं। जलवायु परिवर्तन, कोविड-19 की गंभीरता और चुनावी प्रक्रिया की
विश्वसनीयता जैसे विषयों पर दोनों समूहों की ‘तथ्यात्मक समझ’ अलग थी। यह केवल राजनीतिक मतभेद
नहीं था — यह वास्तविकता की अलग-अलग परिभाषाएँ थीं।
म्यांमार में रोहिंग्या समुदाय के विरुद्ध 2017 में हुई हिंसा में फेसबुक की भूमिका को संयुक्त राष्ट्र
की तथ्य-अन्वेषण टीम ने अपनी 2018 की रिपोर्ट में ‘निर्णायक’ बताया। संयुक्त राष्ट्र के तथ्य-अन्वेषण
मिशन के अध्यक्ष मार्ज़ुकी दरुस्मान ने कहा था, “म्यांमार की स्थिति के संदर्भ में, सोशल मीडिया का अर्थ
फेसबुक है, और फेसबुक का अर्थ सोशल मीडिया है।” यह एक देश के भीतर अलग-अलग ‘वास्तविकताओं’ के
निर्माण का एक अत्यंत गंभीर और जानलेवा परिणाम था। 2022 में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी एक
विस्तृत रिपोर्ट में मेटा के एल्गोरिदम की भूमिका को प्रमाणित किया।
इस विभाजन का दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव राजनीतिक ध्रुवीकरण में स्पष्ट दिखता है। जब
लोग लंबे समय तक केवल अपनी मान्यताओं की पुष्टि करने वाली सामग्री देखते हैं, तो विपरीत विचारों
वाले लोगों के प्रति उनकी सहिष्णुता घटती है। वे विरोधी विचारों को केवल ‘गलत’ नहीं, बल्कि ‘दुश्मनाना’
या ‘देशद्रोही’ मानने लगते हैं। भारत में भी, जहाँ सामाजिक विभाजन पहले से ही बहुस्तरीय हैं, यह
डिजिटल ध्रुवीकरण सामाजिक तनाव को बढ़ाने का एक सशक्त कारक बन गया है।
भारत में ऑल्ट न्यूज़, बूम और फैक्टली जैसी तथ्य-परीक्षण संस्थाएँ फर्जी खबरों की जाँच करती हैं,
लेकिन उनके पास संसाधन और पहुँच सीमित है। एमआईटी के उपर्युक्त शोध ने यह भी पाया कि झूठी खबरें
ट्विटर पर सच्ची खबरों की तुलना में 70 प्रतिशत अधिक रीट्वीट की जाती हैं। इस प्रकार, सोशल मीडिया
नागरिकों को एक ऐसे सूचना-पारिस्थितिकी तंत्र में धकेल देता है जहाँ सच्चाई को खोजना एक श्रमसाध्य
और अनिश्चित कार्य है।
अंततः, एक ही देश में समानांतर राजनीतिक वास्तविकताओं का निर्माण लोकतंत्र के लिए एक
बुनियादी संकट है। लोकतंत्र की पूर्वशर्त यह है कि नागरिक एक साझा तथ्यात्मक आधार पर खड़े होकर
राजनीतिक निर्णय लें। जब यह साझा आधार टूट जाता है, जब हर समूह की अपनी ‘सच्चाई’ होती है और
दूसरे की सच्चाई ‘फर्जी’ लगती है, तो लोकतांत्रिक संवाद और समझौते की संभावना ही समाप्त हो जाती है।
इस चुनौती से निपटने के लिए डिजिटल मंचों की जवाबदेही, गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता का पुनर्जीवन, और
नागरिकों की मीडिया साक्षरता — तीनों की एक साथ आवश्यकता है।
Comments ( 1)
Join the conversation and share your thoughts
डॉ मुकेश 'असीमित'
7 hours agoयह लेख समकालीन डिजिटल युग की एक गंभीर सच्चाई को बेहद संतुलित और तथ्यपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करता है। खास बात यह है कि इसमें केवल समस्या का चित्रण नहीं, बल्कि उसके सामाजिक और लोकतांत्रिक प्रभावों की भी गहरी पड़ताल की गई है।
लेखक ने इको-चेंबर, फेक न्यूज और एल्गोरिद्मिक नियंत्रण जैसे जटिल विषयों को सरल भाषा में समझाते हुए पाठक को सोचने पर मजबूर किया है। यह केवल एक विश्लेषण नहीं, बल्कि चेतावनी भी है कि यदि साझा ‘सच’ समाप्त हो गया, तो संवाद भी समाप्त हो जाएगा।