|शर्त की सौगंध
डा राम कुमार जोशी
कलेक्ट्रेट के दो बाबू, चम्पा लाल व मांगीलाल के मध्य शर्त लग गयी कि एक तोला सोना पहले कौन खरीद लेता है!
शर्त की गुप्त भावना स्पष्ट थी कि इस कीमती धातु को तनख्वाह के रूपयों से नहीं बल्कि सरकारी नियमों से प्राप्त कृपा युक्त ऊपरी कमाई से खरीद करना है। प्रत्येक दिन के कमायें धन की सूचना बेटे की सौगंध के साथ हैड साहब को देनी होगी। उतने माल की राशि जो भी शख्स पहले इकट्ठी कर लेता है वह जीता कहलायेगा। हारने वाला सबको दाल-बाटी की पार्टी देगा। भांग, दारू का व्यय अपना अपना होगा।
हैड साहब वैरागी आदमी थे। उन्होंने हिसाब किताब रखने केलिए प्रत्येक से मात्र पांच प्रतिशत लेना स्वीकार किया जो दोनों को मंजूर था, मान्य था।
सुयोग ही कहे कि चंपालाल और मांगीलाल, दोनों के पिता भी इसी कलेक्ट्रेट में साथ ही नौकरी लगे थे और बाबू जी बन आम जन की सेवा में जुट गये थे। उन्होंने फाइलों को वजनी बनाने के लिए कई नये सूत्र इजाद किए थे। रेवेन्यू मामलों में कई बार एडीएम तक दांतों तले अंगुली दबा लेते थे।
जिला कलेक्टरों की बात कुछ और उपरी स्तर की होती है। वो अंगुली नही सीधे गर्दन ही दबाते हैं।
दोनों ने मिलकर हालात यहां तक बना लिए थे कि पुराने वकीलों को भी बिना सुविधा शुल्क के बख्शा नहीं जाता था।
चम्पा लाल के पिता की मृत्यु पहले हुई। उसका बारहवां जीमने से पहले मांगीलाल का पिता बड़ी जोर से रोया था। सार्वजनिक आवाज में कह रहा था – “यार तूने जल्दी मरके अपने बेटे चंपालाल केलिए सारी उम्र की हुण्डी लिख दी। अनुकंपा नियुक्ति के साथ ढेर सारी बीमा राशि……। बाप हो तो ऐसा। अपना तो सब कुछ सौंप गया ही, सरकार से भी ताजिंदगी दिलवा गया।
फिर रुककर – (आमजन से) मेरा तो सरकार से कहना है कि जब इतना सबकुछ दे दिया तो श्मशान की लकड़ी से लेकर बारहवें तक के खर्चे साथ दे देने चाहिए। जिससे मरने के बाद वाले खर्चों का भार बेचारे बेटों पर ना पड़े।”
निठल्ले छोरों केलिए सरकार ने ऐसी शानदार पतली गली निकाल रखी है – ड्यूटी करते गर बाप मर जाय तो निकम्मी से निकम्मी औलाद केलिए सरकारी नौकरी खरी।
व्याख्या में स्पष्ट लिखा कि ड्यूटी का अर्थ केवल आफिस में मरने तक सीमित नही है बल्कि रात में सोते हुए मरने को भी ‘ड्यूटी मरन’ समझा जावें।
मांगीलाल का पिता – (ऊपर हाथ उठाकर रोते हुए) हे भगवान, मुझे भी उठा ले। मैं जानता हूं कि मेरा बेटा मांगीलाल कैसा है। वह फेल ज्यादा होता है पास कम। रविवार से रविवार, सप्ताह में छुट्टी के दिन कालेज जाता है, शेष सप्ताह के छः दिन घर पर पड़ा रहता है। बाद में हम सबकी आंखें खुली कि केवल कालेज के मैदान में रविवारीय क्रिकेट खेलने से इम्तहान पास नही होते है।
“ऐसे लड़के की नौकरी नही होगी तो कौन अपनी लाडली बेटी को खड्ड में उतारेगा? बस एक ही उपाय शेष बचा है, मैं भी रिटायरमेंट से पहले मर जाऊं। इससे बेटे मांगीलाल का जमारा सुधर जायेगा और घर भी बस जायेगा।”
उस दिन के बाद अष्ट प्रहर दिन-रात, दोस्त को याद करते मांगीलाल के बाप ने भी एक महीने के भीतर ज़बरदस्ती प्राण छोड़ दिए।
नौकरी बाकी थी सो जैसे चंपालाल वैसे मांगीलाल को भी अनुकंपा नियुक्ति मिल गईं। इनके बाप तो करेला थे पर बेटे तो शुरुआत से नीम चढ़े से हो गये।
कुटुंबियों के साथ आम जानकारों में दोनों के पूजनीय पिताश्री की खूब वाहवाहियां हुईं। सब कहते थे बाप हो तो ऐसे। मरकर एक भला कारज कर गये। जीवित रहे तब तक तो किसी का भला किया नही अब मर के कम से कम आल औलाद समेत परिवार का भला कर दिया।
बहुत से कमीने बाप कर्जा छोड़कर मरते हैं पर इन्होंने सात पीढ़ियों का पहले कमाया और आगामी सात पीढ़ियों केलिए बेटों को राह पकड़ा गये।
न ज़्यादा न कम, जोड़ तोड़ के वजन के साथ उसी कमरे में नौकरी लगी जहां दोनों के पिता ने पूरा जीवन पाई पाईं जोड़ने में होम दिया था। आम व खास से पैसे इकट्ठे करने में इनके बाप माहिर थे।
जीव विज्ञान भी यही कहता है कि पिता के गुण, मां के गुणों से मिल, सन्तान में सवाये उत्पन्न कर देता हैं। यही हुआ। जब चंपालाल और मांगीलाल अवतरित होने वाले थे उस समय अकाल राहत कार्यों ने जोड़ पकड़ रक्खा था। दोनों पिता में होड़ मची थी कौन कितना बटोर घर ले जाये?
उसी राह पर चलते वे आज जीव विज्ञान की जीन परंपरा को दोनों पुत्र सत्य साबित कर रहे थे।
आगे जैसे जैसे साल गुजर गए दोनों बेटों ने ऐसा तहलका मचाया कि आमजन त्राहि त्राहि कर उठा। लोग कहने लग रहें कि इनसे तो इनके बाप बहुत अच्छे थे। सुनवाई तो फ्री में करते थे। ये तो हरामखोर बात करने की भी फीस मारते हैं। फाइल निपटान बिना वज़न करते ही नहीं। सारे अफसरों को नचा रखा है। हरे कागज़ लेकर ही सुनवाई होती है। सफारी सूट के सारे जेब जब-तक भर नहीं जाते तब तक घर भी नहीं जाते हैं।
एक दिन कैंटीन में चाय पीते चंपालाल मांगीलाल से कह रहा था – “भाई! आजकल अपने बापों की बड़ी प्रशंसा हो रही है। हमने उनको अच्छा कहलवा दिया है। उनकी आत्माएं अपने को आशीष दे रही होगी।”
अभी पखवाड़ा बीतने में कुछ दिन शेष थे कि हैड साहब ने दोनों को तलब किया कि शर्त की क्या पोजीशन है और नियमानुसार पांच पांच प्रतिशत साहूकारी कमीशन जमा किया जाय।
अमानत में ख़यानत का क्या काम।
सीक्रेट डायरियां प्रस्तुत हुई, टोटल लगाने केलिए कम्प्यूटर का उपयोग लिया गया। सारे आंकड़े फीड हुए, फीडिंग के प्रारंभ काल में कभी चंपालाल आगे तो कभी मांगीलाल के जीत की संभावना बढ़ती। कभी चंपालाल की ओर झुकाव तो कभी मांगीलाल की ओर स्वचालित तालियों की गड़गड़ाहट। बीच-बीच में हैड साहब अपनी सांस रोककर कमीशन का चिंतन करने लगते।
जैसे ही हैड साहब ने मांगी लाल के विजय की घोषणा की और अलमारी के भीतर रखें सीक्रेट बाक्स को खोल रकम गिनना शुरू किया कि चंपालाल बिफर पड़ा।
चम्पा लाल – (जोर से) हैड साहब जीता मैं हूं । इस बार वकीलों समेत मैंने किसी को भी नहीं छोड़ा है। मेरी रकम गिन लो। गर मांगीलाल से कम निकल जाये तो सारी रकम आपकी।
वास्तविकता भी यही थी पर मांगीलाल ने हैड साहब को पहले से ही पांच की बजाय दस प्रतिशत देने का गुप्त वादा कर दिया था।
आज हैड साहब चंपालाल को छोड़ मांगीलाल की सुनवाई कुछ ज्यादा ही कर रहे थे।
अपने ऊपर अन्याय की जब अति होगई तो चम्पालाल बिगड़े सांड सा हो गया और जोर जोर से चिल्लाने लग गया। कक्ष के बाहर तमाशबीन भीड़ जमा हो गई।
दोनों जने भूल गए कि सरकारी नौकरी आजकल संवेदनशील हो गई है। हर व्यक्ति मोबाइल विज्ञान की बदौलत रिकार्डर जेब में लेकर घूम रहा है।
मां बहन की गालियों की बौछार के साथ कलेक्टर साहब को भी नहीं बक्शा।
गुस्सैल सांड के मुंह से निकले झाग जैसे कच्चे पक्के सभी किस्से बाहर आ गए। सुविधा शुल्क सीक्रेट नही रहा।
हैड साहब चुप चुप कहते रह गये पर चंपालाल के सिर ईमानदारी का भूत चढ़ गया था।
बेईमानी में ईमानदारी का खटाव होता है पर बेईमानी में बेईमानी का बिल्कुल नही। याद रहे विज्ञान का भी सिद्धांत कहता है – विपरीत ध्रुवों में ही करेंट बहता है चाहे वह प्रेम हो या विद्युत। समान ध्रुवों से करेंट की बजाय चिंगारी ही निकलती है।
आरोप प्रत्यारोप की चिंगारी ऐसी उछली कि सीधी कलेक्टर चैम्बर में जा गिरी। उनको आखिर बाहर आना पड़ा और हरियल सामान की गोपनीय ज़ब्ती करनी पड़ी और तीनों महारथियों को जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया।
जो हुआ वो अच्छा हुआ। अखबार में खबर तक छप नही पाईं। शाम को लोकल टीवी एंकर, इशारों में कहने के बाद खुद ही स्पष्टीकरण में कह रही थी कि हम इस खबर की पुष्टि नही करते है।
जिलाधिकारी की बद् मिजाजी से सभी वाकिफ थे।
तीसरे दिन हैड साहब समेत चंपालाल व मांगीलाल ने कलेक्टर के कक्ष में उपस्थित हो, आकाश की तरफ हाथ उपर कर सौगंध खाई कि भविष्य में फिर कभी ऐसी शर्त नहीं लगायेंगे। ईश्वर ने हमेशा साथ दिया है और भविष्य में भी देगा।
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