ये आईना भी मुझे क्या क्या न बता जाता है ,
टूटा हुआ खुद है, मुझे टुकड़ों में दिखा जाता है ।
कभी दाग छुपा लेता है मेरा
कभी आस जगा देता है मेरा
ये आईना मुझे छुपा घाव भी दिखा जाता है
कमजोर इतना कि चूर चूर हो जाए
बिखर कर वो दूर दूर हो जाए
बिखरे हुए टुकड़ों में भी मुझसे मिला जाता है
कभी हूर कहता है मुझे,
कभी मगरुर कहता है मुझे
मेरे चेहरे का वो हर भाव दिखा जाता है

Comments ( 1)
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डॉ मुकेश 'असीमित'
2 months agoआपकी यह कविता पढ़कर मन सचमुच ठहर-सा गया। आईने को आपने जिस तरह केवल प्रतिबिंब नहीं, बल्कि एक संवेदनशील साक्षी के रूप में रूपायित किया है—वह अत्यंत प्रभावशाली लगा। टूटे आईने की प्रतीकात्मकता, उसके टुकड़ों में बिखरी हुई यथार्थ की झलकियाँ, और मनुष्य के अंतर-घावों तक पहुँचने की उसकी क्षमता—ये सभी बिंब कविता को अद्भुत गहराई प्रदान करते हैं।
“टूटा हुआ खुद है, मुझे टुकड़ों में दिखा जाता है”—
इस एक पंक्ति में भीतर की टूटन, बाहरी सच और आत्मपरिचय के द्वंद्व—all beautifully merged.
आपकी पंक्तियों में संवेदना भी है, स्वीकृति भी, और आत्मालोचन का विनम्र सौंदर्य भी—
कभी दाग छुपाने वाला आईना, कभी आशा जगाने वाला मित्र, तो कभी भीतर छुपे घावों को उजागर करता सच—इन सब रूपों को आपने बड़ी सहजता और कोमलता से रचा है।
हार्दिक बधाई और साधुवाद—
यह कविता न केवल पढ़ने योग्य है, बल्कि स्मरण में बस जाने योग्य है।
सादर शुभकामनाएँ,
डॉ. मुकेश असीमित