भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहारअस्ति

जब कोई आम नागरिक सरकारी कार्यालय के चक्कर काटते-काटते थक जाता है, तब उसे एक मार्गदर्शक तारे की तरह भ्रष्टाचार की रोशनी दिखाई देती है। बिना चाय-पानी के भुगतान के फाइलें धूल फांकती रहती हैं, पर जैसे ही जेब गर्म होती है, फाइलें पंख लगाकर उड़ती हैं और मंज़िल तक पहुँच जाती हैं। सोचिए, अगर भ्रष्टाचार न होता, तो एक वृद्ध व्यक्ति पेंशन के लिए चार साल सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता और अंत में दम तोड़ देता, पर भ्रष्टाचार की कृपा से अब वह केवल चार हजार रूपये खर्च कर उसी सप्ताह पेंशन प्राप्त कर लेता है। यह समय की बचत है, जीवन की बचत है औरकहने की आवश्यकता नहीं कि यह व्यवस्था की गतिशीलता का प्रतीक है। स्कूल में दाखिले से लेकर अस्पताल में इलाज तक, हर जगह भ्रष्टाचार की अनौपचारिक सेवा जनता को अत्यंत लाभ पहुंचा रही है। जो गरीब नागरिक पहले हफ्तों सरकारी राशन के लिए लाइन में लगता था, वह अब “थोड़ा दे-दिलाकर” अगले ही दिन अनाज का थैला लेकर मुस्कुराते हुए घर लौटता है। और ऊपर से ये सेवा बिना किसी जीएसटी या टैक्स के है — कितनी उदार व्यवस्था है ये। अतः यह स्पष्ट है कि जनता के जीवन को सरल, सुगम और संगीतमय बनाने में भ्रष्टाचार से बढ़कर कोई उपाय नहीं — भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहार अस्ति।

पैसे देने वालों को लाभ : अगर कोई सोचता है कि रिश्वत देना महज पैसे की बर्बादी है, तो वह आज के यथार्थ से अंजान है। पैसे देने वाला हर बार अपना काम “नो सवाल, नो अटकाव” के सिद्धांत पर करवा लेता है। सरकारी बाबू को पैसा देकर यदि पासपोर्ट जल्दी बन जाए, बिजली कनेक्शन बिना सत्यापन के लग जाए, या पुलिस रिपोर्ट आपके मन-मुताबिक तैयार हो जाए — तो इसमें घाटा कहाँ है? दरअसल, पैसा देने वाला अपना ‘सामाजिक निवेश’ कर रहा होता है औरयह निवेश इतना लाभकारी है कि शेयर बाज़ार भी शर्मा जाए। एक छात्र जिसने परीक्षा में पास नहीं किया, वह थोड़े प्रयास और मोटे नोटों के दम पर न सिर्फ पास हो जाता है, बल्कि अच्छे अंकों से होता है — यह प्रगति नहीं तो और क्या है? भ्रष्टाचार ने पैसे देने वालों को वह अधिकार दिया है जो पहले केवल योग्यता वालों के पास होता था — अब योग्यता की जगह मौद्रिक विनम्रता ने ले ली है। ये नया लोकतांत्रिक सिद्धांत है जिसमें हर किसी को बराबर मौका मिलता है, बशर्ते वह जेब गर्म रखे। इस प्रकार, पैसे देकर काम करवाने की व्यवस्था में फायदा ही फायदा है — भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहार अस्ति।

पैसा लेने वालों को लाभ : भ्रष्टाचार की असली लॉटरी तो उस महान आत्मा के हाथ लगती है जो पैसे लेता है। सरकारी बाबू से लेकर ऊंचे पद के अधिकारी तक, यदि कोई सचमुच अपने परिवार का भविष्य उज्ज्वल बनाना चाहता है तो उसकी पहली पाठशाला भ्रष्टाचार ही होनी चाहिए। सैलरी तो सिर्फ जीने के लिए होती है, लेकिन रिश्वत जीवन को “लाइफस्टाइल” में बदल देती है। बच्चों की इंग्लिश मीडियम स्कूल, विदेश यात्रा, पाँच मंज़िला बंगला और बीएमडब्ल्यू — ये सब ‘सर्विस रूल्स’ से नहीं, ‘सेवा भाव’ से आते हैं, जहाँ सेवा का मूल्य नकद में चुकाया जाता है। और सोचिए, इससे सरकार का भी फायदा है — अफसर खुश तो व्यवस्था खुश औरव्यवस्था खुश तो देश खुश। ऊपर से यह सब ‘नॉन-ऑफिशियल’ होता है, जिससे टैक्स की कोई झंझट नहीं। इससे अफसर अपने कर्मचारियों को ‘अनौपचारिक बोनस’ भी देते हैं, जिससे पूरी व्यवस्था में प्रोत्साहन और भाईचारे की भावना पनपती है। हर महीने सैलरी के अलावा यदि पाँच जगहों से ‘सहयोग राशि’ मिल जाए तो नौकरी में नई ऊर्जा और प्रेरणा आती है — भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहार अस्ति।

ठेकेदारों को लाभ : जब कोई ठेकेदार सरकारी दफ्तर में प्रवेश करता है, उसके पास दो फाइलें होती हैं — एक में उसका प्रस्ताव और दूसरी में प्रस्ताव की ‘प्रेरणा’। यह प्रेरणा ही है जो फाइल को सरकाती है, मंज़ूरी लाती है और कार्यादेश का वरदान प्रदान करती है। और सच पूछिए तो यही प्रेरणा पूरे निर्माण उद्योग को जीवन देती है। यदि सड़क, पुल, भवन, जल योजना, विद्युत ग्रिड जैसी विशाल परियोजनाओं के पीछे अगर कोई अदृश्य शक्ति है, तो वह भ्रष्टाचार ही है।
ठेकेदार को लाभ मिलता है क्योंकि वह जानता है कि यदि वह इंजीनियर, निरीक्षक औरआपूर्ति अधिकारी को उनकी “सहभागिता राशि” देगा, तो कार्य बिना अवरोध संपन्न होगा। इसका सीधा लाभ यह होता है कि समय पर भुगतान भी हो जाता है और गुणवत्ता के नाम पर सस्ता माल चल जाता है। और इसी पैसे से वह अगला टेंडर भी सुनिश्चित करता है। यही कारण है कि देश की सड़कें पहली बारिश में बह जाती हैं — यह किसी त्रुटि का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुगठित वित्तीय व्यवस्था का प्रमाण है, जो हर बार निर्माण, मरम्मत और पुनर्निर्माण के लिए पैसे जारी करवा देती है। और इसमें हर कोई संतुष्ट — ठेकेदार को पैसा, अधिकारी को हिस्सा औरजनता को सड़क। तो जब ठेकेदार कम लागत में ज़्यादा लाभ कमाए, बिना झंझट ठेका ले, बिना गुणवत्ता की चिंता किए भुगतान पा जाए, तो इसे भ्रष्टाचार नहीं — ‘स्मार्ट ठेका प्रबंधन’ कहना उचित होगा। और जब सभी संबंधित पक्ष प्रसन्नचित्त हों, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहार अस्ति।

आपूर्ति करने वाली कंपनियों को लाभ : सरकारी आपूर्ति में हिस्सा लेना, कोई मामूली कार्य नहीं — यह साहस, समझदारी और नेटवर्किंग की मांग करता है। लेकिन यदि सप्लायर समझदार हो और उसे पता हो कि किस अधिकारी को कौन सी चीज़ प्रिय है, तो वह बिना किसी टेंडर प्रक्रिया के भी सीधे ऑर्डर पा सकता है। आप कल्पना करें, एक स्टेशनरी सप्लायर, जो 20 रुपये की पेन को 200 रुपये में आपूर्ति करता है औरफिर उसी रकम का 50% अधिकारी को ‘प्रसन्नता शुल्क’ के रूप में लौटाता है। ऐसा नहीं है कि यह छल है, बल्कि यह ‘गोपनीय व्यापार सहयोग’ है। इससे विभाग को फाइलें लिखने की सुविधा, सप्लायर को अधिक लाभ औरअधिकारी को मनचाहा उपहार — सभी का हित एकसाथ।
बड़ी कंपनियाँ भी इसे अपनाती हैं — सरकारी अस्पतालों में दवा की आपूर्ति हो, स्कूलों में मिड-डे मील हो, या जल निगम में पाइप की डिलिवरी — सभी कुछ ‘सहयोग शुल्क’ आधारित होता है। इससे कंपनियों को निरंतर सरकारी ऑर्डर मिलते हैं औरउन्हें बाजार की प्रतिस्पर्धा की चिंता नहीं रहती। सप्लाई चेन में यदि भ्रष्टाचार न हो, तो वह चेन टूट जाती है — यह आधुनिक आपूर्ति व्यवस्था की आधारशिला है। अगर आप चाहें कि समय पर डिलिवरी हो, भुगतान ना अटके औरअगली बार का टेंडर भी पक्का हो — तो रिश्वत ही वह चाबी है जो इन सब दरवाज़ों को खोलती है। अतः जब कंपनियाँ तरक्की करें, अधिकारी लाभ लें और जनता तक सामान पहुँचे — तब यह सिद्ध होता है कि भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहार अस्ति।

नालायक बच्चों को नौकरी पर लगवाने का लाभ : हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बेटा बड़ा अफसर बने, भले ही वह गणित में शून्य लाता हो या इंटरव्यू में चुप्पी साध लेता हो। यहाँ भ्रष्टाचार ही वह संजीवनी है जो नालायक बच्चों को सरकारी नौकरियों में लगवाने का सपना साकार करती है।
बिना पढ़े-लिखे, बिना किसी योग्यता के जब कोई लड़का विभाग में लिपिक, इंस्पेक्टर या बाबू बन जाता है, तो यह भ्रष्टाचार का चमत्कार ही तो है। ऐसे लड़के न केवल नौकरी पाते हैं, बल्कि आगे चलकर खुद भी रिश्वत लेकर दूसरों को नियुक्त करते हैं — यानी भ्रष्टाचार की वंश परंपरा को आगे बढ़ाते हैं।
यह उन अभिभावकों के लिए ईश्वरदत्त वरदान है जो बच्चों की पढ़ाई में निवेश नहीं कर सके, लेकिन रिश्वत में अवश्य कर सकते हैं। और फिर समाज में भी तो एक संतुलन चाहिए — हर कोई टॉपर नहीं हो सकता, पर यदि हर किसी को नौकरी मिले, तो नालायकी भी रोजगार सृजन का साधन बनती है।
इसी से वह बच्चा भी शादी कर पाता है, घर बनाता है औरफिर आगे चलकर खुद एक अफसर बनता है — यानी समाज में स्थान पाता है। यह कार्य पारंपरिक तरीकों से संभव नहीं था — यह केवल भ्रष्टाचार की कृपा से ही संभव हुआ है।
तो जब मूर्ख भी सम्मान पाए, नालायक को नौकरी मिले औरअभिभावक का सिर गर्व से ऊँचा हो — तब कहना ही होगा कि भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहार अस्ति।

जब सबका हो भलातो क्यों लगता बुरा है? : इस पूरे विमर्श से स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार मात्र एक कुरीति नहीं, बल्कि एक सर्वस्वीकृत, सर्वव्याप्त और सर्वलाभकारी प्रणाली है। यह प्रशासन को गतिशील करता है, अर्थव्यवस्था को बल देता है औरसमाज में संतुलन बनाए रखता है। जब अधिकारी, कर्मचारी, ठेकेदार, नेता, व्यापारी, जनता — सभी को इससे लाभ मिलता है, तो फिर यह ‘भ्रष्टाचार’ नहीं, एक ‘लोकप्रिय जननीति’ है। भ्रष्टाचार वह रसधार है जो मृतप्राय व्यवस्थाओं को जीवंत बनाती है। यह एक समानांतर व्यवस्था है जो सत्ताओं से अधिक प्रभावी, नीति से अधिक व्यावहारिक औरजनता से अधिक प्रिय है। यदि किसी प्रणाली से सभी पक्ष लाभान्वित हों और कोई विद्रोह ना हो, तो उसे दोष नहीं, गुण कहा जाना चाहिए। इसलिए, देश को सही मायनों में सुचारु और ‘विकसित’ बनाने का मार्ग केवल एक ही है — सभी को समझना होगा कि… भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहार अस्ति।

Dr Shailesh Shukla

राजभाषा अधिकारी, एनएमडीसी लिमिटेड [भारत सरकार का उद्यम] हीरा खनन…

राजभाषा अधिकारी, एनएमडीसी लिमिटेड [भारत सरकार का उद्यम] हीरा खनन परियोजना, मझगवाँ, पन्ना (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए.(हिंदी), एम.ए.(जनसंचार), पीएचडी प्रकाशन : भारत सहित विश्व के अनेक देशों से प्रकाशित विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं - अस्मिता, राजभाषा भारती,

Comments ( 1)

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डॉ मुकेश 'असीमित'

2 hours ago

यह व्यंग्य रचना व्यवस्था की एक कड़वी सच्चाई को तीखे हास्य के साथ प्रस्तुत करती है। लेखक ने भ्रष्टाचार को “व्यवस्था की अदृश्य ऊर्जा” के रूप में चित्रित करते हुए दिखाया है कि कैसे यह तंत्र आम नागरिक, अधिकारी और ठेकेदार—सभी के लिए एक अनौपचारिक लेकिन प्रभावी व्यवस्था बन चुका है। व्यंग्य का प्रभाव इस बात में है कि पाठक हँसते-हँसते उस कटु यथार्थ से रूबरू हो जाता है जिसे समाज अक्सर सामान्य मानकर स्वीकार कर चुका है।