Dr Shailesh Shukla
May 15, 2026
व्यंग रचनाएं
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“जनता भविष्य नहीं देख पाती, इसलिए जनता है; और हम भविष्य पहले देख लेते हैं, इसलिए अधिकारी हैं।”
“व्यवस्था नहीं सड़ी… व्यवस्था तो बहुत फलदायी है।”
“मैंने केवल अवसर लिए, नियमों को समझा और संबंध निभाए।”
“जब ‘मैं ही राष्ट्र’ हूँ, तो राष्ट्र की संपत्ति और मेरी संपत्ति में अंतर कैसा?”
“पहले जमीन अपने नाम कराओ, फिर विकास का इंतजार करो।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 8, 2026
व्यंग रचनाएं
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शोक सभा में जाना भी एक सामाजिक परीक्षा है। बाब्बन चाचा इस परीक्षा में इतने अनुभवी हैं कि संवेदना व्यक्त करते-करते रिश्ता, पुट्टी और प्रॉपर्टी तक की चर्चा छेड़ देते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 7, 2026
व्यंग रचनाएं
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जब साहित्य प्रयोगशाला बन जाए, पुरस्कार गुरुत्वाकर्षण से गिरने लगें और चापलूसी ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ की जगह ले ले — तब न्यूटन, आर्किमिडीज़ और डार्विन भी व्यंग्य में प्रवेश कर जाते हैं।
डॉ. मुकेश ‘असीमित’ का समकालीन साहित्य पर तीखा, चुटीला और वैज्ञानिक कटाक्ष।
Ram Kumar Joshi
May 5, 2026
व्यंग रचनाएं
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नई दिल्ली की ट्रेनिंग में उन्हें सिखाया गया था—
“धीरे-धीरे खाओ, ठंडा करके खाओ…”
लेकिन जब सिस्टम गरम हुआ,
तो सबसे पहले जल गया—एक ‘बाबू’।
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 5, 2026
व्यंग रचनाएं
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जब पति भी नौकरी की तरह “फुल-टाइम वैकेंसी” बन जाए, तो समझिए वैवाहिक जीवन ने नया स्टार्टअप मॉडल पकड़ लिया है। यह व्यंग्य न केवल हँसाता है, बल्कि शादी की सच्चाइयों का आईना भी दिखाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 28, 2026
व्यंग रचनाएं
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“मंच सूना है, माइक उदास है, और अध्यक्ष महोदय की कुर्सी… बस वही एक चीज़ है जिसे वे पूरे विश्वास से पकड़कर बैठे हैं—जैसे लोकतंत्र की आखिरी उम्मीद उसी के चार पैरों पर टिकी हो।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 27, 2026
व्यंग रचनाएं
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मुख्य अतिथि बनना केवल सम्मान नहीं, एक कला है—जिसमें मुस्कान सार्वजनिक होती है और असहजता निजी।
यह व्यंग्य उसी ‘कुर्सी’ के इर्द-गिर्द घूमती सामाजिक सच्चाइयों को उजागर करता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 25, 2026
व्यंग रचनाएं
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देशभक्ति वर्क फ्रॉम होम अब देखिए, देश बदला है तो जाहिर है देशभक्ति भी बदली है। अब आप भी कहाँ पुराने देशभक्ति का राग छेड़ने लगे हैं… गया वो ज़माना जब देशभक्ति हल चलाते किसान के पसीने में टपकती थी, सैनिक की वर्दी में शान से सीना उठाए चलती थी, और देश के युवा खून […]
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 24, 2026
व्यंग रचनाएं
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विश्वास जीवन की सबसे पुरानी मुद्रा है। गणित के मास्टरजी के “मान लो” से लेकर प्रेमी के चाँद-तारे, बाबा के स्वर्ग, बाजार की स्कीम और राजनीति के घोषणा पत्र तक—हर जगह आदमी विश्वास करता कम है, करवाया ज्यादा जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 23, 2026
व्यंग रचनाएं
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विश्व पुस्तक दिवस पर यह व्यंग्य लेख उस दौर को याद करता है जब किताबें दोस्त थीं, किराये पर चलती थीं, तकिये के नीचे छुपाई जाती थीं और मोरपंख के साथ विद्या माता को समर्पित रहती थीं। आज के डिजिटल समय में किताबें पढ़ी कम, कोट और सेल्फ़ी ज़्यादा की जाती हैं—इसी विडंबना को लेख ने चुटीले अंदाज़ में पकड़ा है।