नाग पंचमी हर पल: दूध पिलाया, विष ही पाया | व्यंग्य गीत
हम जिन “साँपों” को विश्वास और समर्थन का दूध पिलाते हैं, उनसे बार-बार विष ही क्यों मिलता है? पढ़िए डॉ. मुकेश ‘असीमित’ के व्यंग्य गीत “नाग पंचमी हर पल” का भावार्थ और सुनिए पूरा गीत।
हम जिन “साँपों” को विश्वास और समर्थन का दूध पिलाते हैं, उनसे बार-बार विष ही क्यों मिलता है? पढ़िए डॉ. मुकेश ‘असीमित’ के व्यंग्य गीत “नाग पंचमी हर पल” का भावार्थ और सुनिए पूरा गीत।
मोबाइल में सैकड़ों कॉन्टैक्ट, दर्जनों व्हाट्सऐप ग्रुप और सोशल मीडिया पर अनगिनत दोस्त—फिर भी जीवन में अकेलापन क्यों बढ़ रहा है? डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का यह हास्य-व्यंग्य वर्चुअल दोस्ती, वास्तविक रिश्तों, रिटायरमेंट और बदलते सामाजिक जीवन पर तीखी लेकिन मनोरंजक टिप्पणी करता है।
सोशल मीडिया के डिजिटल दरबारों ने घाघ-भड्डरी की लोक-कहावतों से लेकर मौसम विभाग तक सबको पीछे छोड़ दिया है। पढ़िए मौसम की ऑनलाइन भविष्यवाणियों और किसानों की उलझनों पर डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का चुटीला व्यंग्य।
# मेरी OPD का शीशा मेरी OPD के दरवाज़े में एक शीशा लगा दिया गया था। जब लगाया गया था, तब कोई बहुत गहरी सोच-विचार नहीं हुई थी। बस किसी दूसरे अस्पताल में ऐसा शीशा लगा देखा और हमने भी उसकी नकल कर ली। शीशा लगाने वाले ने बड़े गर्व से उसकी खासियत बताई, […]
वादा एक ऐसी भविष्य की मुद्रा है, जिसे आज खर्च करके भुगतान कल पर छोड़ दिया जाता है। प्रेम, परिवार और राजनीति से लेकर चुनावी घोषणाओं तक फैले वायदों की दुनिया पर एक तीखा एवं रोचक व्यंग्य।
कलेक्ट्रेट के दो बाबू ऊपरी कमाई से एक तोला सोना खरीदने की शर्त लगाते हैं। मगर जब बेईमानी की प्रतियोगिता में भी बेईमानी होने लगती है, तो रिश्वतखोरी का पूरा खेल सार्वजनिक हो जाता है। डा. राम कुमार जोशी की यह व्यंग्य रचना सरकारी दफ्तरों, भ्रष्टाचार, अनुकंपा नियुक्ति और व्यवस्था की विडंबनाओं पर तीखा प्रहार करती है।
रैपिडो बुक करते ही आदमी बाद में मिलता है, लेकिन उसका नाम, बाइक नंबर, रेटिंग और लोकेशन पहले पहुँच जाती है। डिजिटल मैप, लाइव लोकेशन और बाइक टैक्सी के इस दौर पर पढ़िए एक चुटीला हास्य-व्यंग्य।
आज साहित्य में लेखक बढ़ रहे हैं, पाठक घट रहे हैं और पुरस्कारों की संख्या दोनों से तेज़ी से बढ़ रही है। उम्र, वजन, लेखन गति से लेकर डिजिटल रिचार्ज तक—यदि सम्मान बाँटने की यही रफ्तार रही तो हर लेखक के लिए कोई-न-कोई पुरस्कार तय मिलेगा। साहित्यिक पुरस्कार संस्कृति पर एक चुटीला और धारदार व्यंग्य।
लेखक किसी रचना को विचारों की प्रसव-पीड़ा सहकर जन्म देता है, शब्दों और मात्राओं से पालता-पोसता है और फिर पत्र-पत्रिका को भेज देता है। लेकिन जब वही रचना संपादक के “खेद सहित” लौट आती है, तो लेखक के मन की दशा वैसी हो जाती है जैसे मोबाइल घंटों चार्ज पर लगा हो और बाद में पता चले कि स्विच ही बंद था। साहित्यिक दुनिया की इसी विडंबना पर एक आत्मीय और चुटीला व्यंग्य।
जंतर-मंतर केवल आंदोलनों का ठिकाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र का ऐसा जादुई मंच है जहाँ नारों की आवाज संसद तक पहुँचती है। यहाँ कुछ आंदोलन तंत्र को बदल देते हैं, तो कुछ स्वयं छूमंतर हो जाते हैं। कॉकरोच-पार्टी से लेकर तंतर, मंतर और टाइम-आउट तक—डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का रोचक राजनीतिक व्यंग्य।