नकली इनोवेशन, नकली शर्म: दिखावे के दौर में खोती मौलिकता

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 21, 2026 Science Talk (विज्ञान जगत ) 0

Galgotia University AI Summit विवाद ने केवल एक तकनीकी चूक नहीं, बल्कि हमारे समाज की उस मानसिकता को उजागर किया है जहाँ हम सच्चाई से अधिक दिखावे को महत्व देते हैं। क्या हम मूवी सेट पर जी रहे हैं—जहाँ चमक असली है, पर दीवारें खोखली? यह लेख हमारे सामूहिक आत्ममंथन का आग्रह है।

अनुवाद: शब्दों से परे संस्कृतियों का सेतु

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 18, 2026 आलोचना ,समीक्षा 0

अनुवाद शब्दों का यांत्रिक स्थानांतरण नहीं, बल्कि सभ्यताओं का संप्रेषण है। यह वह पुल है, जिस पर चलते हुए हम एक भाषा से दूसरी भाषा में नहीं, बल्कि एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में प्रवेश करते हैं। अनुवादक शब्दों के पीछे छिपे समय, समाज और संवेदना को पढ़ता है—और उन्हें नए पाठक के हृदय में पुनर्जन्म देता है।

वैलेंटाइन घाट पर ढेंचू-ढेंचू प्रेमकथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 16, 2026 व्यंग रचनाएं 0

फरवरी की गुलाबी ठंडक में वैलेंटाइन घाट पर इंसान प्रेम का प्रदर्शन कर रहे थे, और दो भोले गधे इंसान बनने की कोशिश में पकड़े गए। भला हो धोबी का—कम से कम दो गधों को इंसान बनने से बचा लिया!

वैलेंटाइन महात्म्य कथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 15, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“भद्रा में ‘आई लव यू’ न बोलें, केवल ‘हम्म’ प्राप्त होगा।” “शुक्र उच्च का हो तो गुलाब महँगा होगा।” “वचन लाभ में, आलिंगन अमृत में।” “ग्रह नहीं, बजट वक्री था।”

सरसों के चेपे और मेरी पीली टी-शर्ट

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 14, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“मैं सरसों के खेत का चलता-फिरता प्रतिनिधि बन गया।” “जहाँ पीला, वहाँ हमारा।” बसंत का सौंदर्य दूर से अद्भुत, पास से लोकतांत्रिक चेपा-आक्रमण। कालिदास ने कोयल लिखी, चेपों पर अभी शोध शेष है।

वैलेंटाइन डे: एक भारतीय परिप्रेक्ष्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 14, 2026 India Story 0

“पता है, कौन सा वीक चल रहा है?” “विशेष वैलेंटाइन डिश” दिल के आकार में, पर स्वाद में विस्फोटक! क्या भारत में वैलेंटाइन डे का उन्माद सच में कम हो रहा है? अब सवाल यह है—दिल लाल रहेगा या बसंत पीला?

कीमतें आसमान नहीं छू रहीं—असल में हमारी मान्यताएँ उछल रही हैं।

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 10, 2026 समसामयिकी 0

सोना कोई उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि मानव आकांक्षाओं और असुरक्षाओं का सबसे चमकदार प्रतीक है। न वह भूख मिटाता है, न ठंड से बचाता है, फिर भी सदियों से उसे सबसे अधिक मूल्य दिया गया। इस लेख में सोने की बढ़ती कीमतों को बाज़ार की चाल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक मान्यताओं का परिणाम बताया गया है। कैसे हमने सोने को सम्मान, सुरक्षा, प्रतिष्ठा और विश्वास का पर्याय बना दिया—और बाज़ार ने इन्हीं भावनाओं को भुनाना सीख लिया। मंदिरों, बैंकों और आभूषणों में सिमटे सोने के माध्यम से यह रचना भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंधों पर गहन वैचारिक दृष्टि डालती है। यह लेख सोने से ज़्यादा मानव मन की कीमत पर सवाल उठाता है।

खाओ और खाने दो-पापी पेट का सवाल

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 9, 2026 व्यंग रचनाएं 0

पेट की राजनीति बड़ी सीधी है—खाली पेट सिर्फ़ खाना माँगता है, भरा पेट सवाल। बब्बन चाचा के पेट से देश की प्रगति नापी जा सकती है, क्योंकि जहाँ खाना दिखा, वहाँ लोकतंत्र अपने आप चुप हो जाता है।