डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 6, 2026
समसामयिकी
0
अयोध्या राममंदिर के चढ़ावा चोरी प्रकरण का समाचार स्रोतों पर आधारित निष्पक्ष विश्लेषण। चोरी के खुलासे, जाँच, नेतृत्व परिवर्तन और समितियों के पुनर्गठन की समयरेखा के साथ दान की सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही के सुझाव।
Prem Chand Dwitiya
Oct 5, 2026
व्यंग रचनाएं
0
एआई अब केवल मशीन या तकनीक नहीं रहा, बल्कि शिक्षा से रोजगार, साहित्य से सत्ता और इंसानी सोच तक अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। सवाल यही है—तकनीक हमें आगे ले जा रही है या धीरे-धीरे हमारी ही जगह ले रही है? इसी विसंगति पर केंद्रित है यह चुटीला व्यंग्य—“ए आई, से यह कैसी नौबत आई!”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 3, 2026
व्यंग रचनाएं
0
व्यंग्य लिखते-लिखते जब लेखक को लगे कि अब इस विधा को और नुकसान पहुँचाना संभव नहीं, तो अगला स्वाभाविक कदम क्या हो? शायद व्यंग्य-विमर्श! साहित्यिक संगोष्ठियों, भारी-भरकम शब्दावली, चाय-समोसे, परस्पर महिमामंडन और “व्यंग्य संकट में है” जैसे सदाबहार विषयों पर एक चुटीला आत्मव्यंग्य।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 28, 2026
व्यंग रचनाएं
0
ऑनलाइन रिश्तों में बधाई देना, न्यौता भेजना और अपनापन जताना कितना आसान हो गया है! लेकिन जब कोई मित्र सचमुच दरवाज़े पर आ जाए, तो क्या होता है? डिजिटल दोस्ती की सुविधाओं पर एक चुटीला आत्मव्यंग्य।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 28, 2026
व्यंग रचनाएं
0
आम आदमी आखिर वहम के बिना जिए भी तो कैसे? चुनावी वादों से लेकर महँगाई, ईएमआई, बजट, सोशल मीडिया और घरेलू जिंदगी तक—यह हास्य-व्यंग्य हमारे रोजमर्रा के भ्रमों, उम्मीदों और आत्मसंतोष पर चुटीला कटाक्ष है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 27, 2026
व्यंग रचनाएं
0
धर्म के नाम पर कानफोड़ू डीजे, पंडालों में फूहड़ मनोरंजन, पीछे जुए की बाजी, दबाव का चंदा, रास्ता रोकते जुलूस और कैमरों के सामने धर्म-सेवा—आखिर आस्था कहाँ खत्म होती है और प्रदर्शन कहाँ शुरू होता है? पढ़िए धार्मिक पाखंड और दिखावे पर तीखा व्यंग्य “धर्म में गिरने के नए कीर्तिमान”।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 27, 2026
व्यंग रचनाएं
0
गिरना अब दुर्घटना नहीं, बाकायदा एक कौशल है। पत्रकारिता में टीआरपी, राजनीति में अवसर, धर्म में प्रदर्शन और साहित्य में सम्मान—हर क्षेत्र में गिरावट के नए रास्ते खुल चुके हैं। सवाल सिर्फ इतना है—अगर गिरना ही है, तो आखिर किस क्षेत्र में गिरें?
Prem Chand Dwitiya
Sep 26, 2026
व्यंग रचनाएं
0
पद छोटा हो या बड़ा, उसकी अपनी अलग माया है। कोई पद पाकर रुतबा बनाता है, कोई पद के लिए संगठन तोड़ता है, तो कोई चरण पकड़कर पद हासिल करता है। ‘पद’ की इसी सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक महिमा पर रोचक व्यंग्य—“पद पाकर, नामी बनने वालों की सुनामी!”
Prem Chand Dwitiya
Sep 20, 2026
व्यंग रचनाएं
0
फर्स्ट एसी में चूहों और कॉकरोचों की खबर से शुरू होकर यह व्यंग्य लोकप्रियता, सेलिब्रिटी संस्कृति और राजनीति की विचित्र दुनिया तक पहुँचता है। मूषक महाराज के पास आतंक भी है, इतिहास भी और गणेश जी की सवारी होने का गौरव भी—फिर भी कॉकरोच उनसे आगे कैसे निकल गया? डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का चुटीला व्यंग्य इसी विडंबना पर तीखा कटाक्ष करता है।
Dr Shailesh Shukla
Sep 19, 2026
शोध लेख/विमर्श
0
देवेन्द्र माँझी का साहित्य आम आदमी की भूख, ग़रीबी, राजनीतिक पाखंड, न्यायिक विसंगतियों, स्त्री-शोषण, सांप्रदायिकता और टूटते मानवीय मूल्यों का प्रामाणिक दस्तावेज़ है। प्रस्तुत लेख उनके सृजन-संसार में व्याप्त सामाजिक चेतना का उदाहरणों सहित समग्र विश्लेषण करता है।