राष्ट्रीय सुरक्षा और एआई: साइबर युद्ध के नए दौर की चुनौती

Dr Shailesh Shukla Mar 20, 2026 शोध लेख 0

कृत्रिम मेधा (AI) ने युद्ध की परिभाषा बदल दी है। साइबर हमले अब केवल तकनीकी खतरे नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं। यह लेख साइबर युद्ध के बदलते स्वरूप, भारत की स्थिति और एआई की दोधारी भूमिका पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

भारतीय कैलेंडर और उसका वैज्ञानिक आधार: समय का जीवित व्याकरण

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 17, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

“यहाँ समय केवल गिना नहीं जाता, समझा भी जाता है—भारतीय पंचांग इसी जीवंत विज्ञान का प्रमाण है।”“चंद्र और सूर्य के संतुलन में बसता है भारतीय कालज्ञान—जहाँ तिथि भी बदलती है और सोच भी।”

कबीरा खड़ा  बाजार में –

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 14, 2026 People 0

कबीर एक नहीं, अनेक रूपों में हमारे सामने आते हैं—पाठ्यक्रमों में, लोकगीतों में, राजनीतिक विमर्शों में। पर असली कबीर वही है जो काशी का जुलाहा है, जिसकी भाषा में करघे की खनक है और प्रश्नों की धार। वह मंदिर और मस्जिद दोनों से एक ही सवाल पूछता है—राह कहाँ है?

तंत्र का असली स्वरूप और तांत्रिक बाज़ार का भ्रम : युवाओं को कैसे भरमा रहा है नकली तंत्र

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 13, 2026 Lifestyle 0

तंत्र भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की एक गंभीर साधना-पद्धति रहा है, जिसका उद्देश्य चेतना का विस्तार और ऊर्जा का संतुलन था। लेकिन समय के साथ इसके नाम पर भय, चमत्कार और अंधविश्वास का एक पूरा बाज़ार खड़ा हो गया है। आज आवश्यकता है कि हम असली तंत्र और उसके नाम पर चल रहे भ्रम के बीच अंतर समझें।

एकात्म मानववाद : भारतीय चिंतन की समग्र विकास-दृष्टि

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 13, 2026 शोध लेख 0

एकात्म मानववाद भारतीय चिंतन की वह समन्वयवादी दृष्टि है जो मनुष्य को केवल आर्थिक इकाई नहीं बल्कि शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा से बने समग्र अस्तित्व के रूप में देखती है। यह दर्शन व्यक्ति, समाज, संस्कृति और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करते हुए विकास को समग्र रूप में समझने की प्रेरणा देता है।

साहित्य: जीवन, संस्कृति और समाज का रचनात्मक दर्पण

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 10, 2026 शोध लेख 1

साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं बल्कि मनुष्य के अनुभवों, संवेदनाओं और समाज की चेतना का जीवित दस्तावेज़ है। यह लेख साहित्य की अवधारणा, कला-संस्कृति और समाज से उसके संबंध तथा हिंदी साहित्य के प्रमुख वादों—छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता—को रोचक और प्रवाहपूर्ण ढंग से समझाता है।

अयोध्या 2047 — विकसित भारत का सांस्कृतिक प्रतीक

Dr Shailesh Shukla Mar 9, 2026 Blogs 0

अयोध्या 2047 — विकसित भारत का सांस्कृतिक प्रतीक22 जनवरी 2024 को अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। उस दिन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं हुआ था, बल्कि एक राष्ट्र ने अपनी सांस्कृतिक चेतना को पुनः जागृत किया। इस ऐतिहासिक क्षण के बाद मंदिर के द्वार जनता के लिए 23 जनवरी 2024 को खुले और […]

गीता सार: कर्तव्य, समत्व और समर्पण का जीवन-दर्शन

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 24, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

गीता हमें सिखाती है कि जीवन का सबसे बड़ा संकट युद्ध नहीं, निर्णयहीनता है। कर्तव्य करते हुए फलासक्ति त्यागना, समत्व में स्थिर रहना और भीतर के सत्य की शरण लेना ही गीता का सार है।

विकास की सामूहिक कथा: जीन, समाज और चेतना के बीच बहती जीवन-धारा

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 19, 2026 Science Talk (विज्ञान जगत ) 0

यह लेख विकासवाद को केवल जीन या व्यक्ति की सीमा में नहीं बाँधता, बल्कि एपिजेनेटिक्स, सामाजिक प्रजातियों और मानव सांस्कृतिक विकास के माध्यम से यह दिखाता है कि परिवर्तन हमेशा सामूहिक परिस्थितियों में आकार लेता है। जीन बीज हैं, पर उनका भविष्य समाज, पर्यावरण और समय तय करता है।

कहानी से सभ्यता तक: जब मनुष्य ने आग के चारों ओर संस्कृति रची

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 18, 2026 शोध लेख 1

मनुष्य ने जब अनुभव को कहानी में बदला, उसी क्षण सभ्यता का जन्म हुआ। आग के चारों ओर सुनाई गई पहली कथा से लेकर लोककथाओं, महाकाव्यों और आधुनिक डिजिटल कथाओं तक—स्टोरीटेलिंग वह अदृश्य धागा है जिसने स्मृति, संस्कृति और सामाजिक चेतना को एक साथ बाँधे रखा। यह लेख उसी निरंतर बहती कथा की यात्रा है, जहाँ कहानी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की आत्मा है।