डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 21, 2025
Culture
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भारत के जनजातीय समुदायों का पारम्परिक पर्यावरण विज्ञान प्रकृति के साथ उनके जीवित, गहरे और सर्जनात्मक संबंध को व्यक्त करता है। मौसम, जंगल, जल, बीज और पशु-पक्षियों के व्यवहार को पढ़ने की उनकी क्षमता अद्भुत है। उनका ज्ञान तकनीक नहीं—अनुभव, आध्यात्मिकता और सामुदायिक विवेक का परिणाम है। आज IPCC और UNESCO इसे जलवायु अनुकूलन और सतत भविष्य का वैश्विक स्तम्भ मानते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 20, 2025
शोध लेख/विमर्श
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परम्परागत पर्यावरणीय ज्ञान प्रकृति से मनुष्य के सदियों पुराने संबंध का जीवित दस्तावेज़ है। यह अनुभव, अवलोकन, अनुकूलन, सामुदायिक जिम्मेदारी और आध्यात्मिक संवेदना पर आधारित ज्ञान प्रणाली है, जो प्रकृति को एक जीवित, समग्र तंत्र मानती है। आधुनिक विज्ञान जहाँ प्रयोगशाला में समाधान खोजता है, वहीं यह ज्ञान स्थानीय संसाधनों, सामुदायिक विवेक और सांस्कृतिक नैतिकता से टिकाऊ भविष्य का मार्ग प्रस्तुत करता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 3, 2025
Blogs
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“If there is any beauty in my speech, it is not mine — it is the gift of tradition and divine grace.”
“Kalidasa’s journey is the transformation of ignorance into illumination, of pride into humility.”
“When Vidyottama said, ‘Asti kashchid vāgviśeṣaḥ,’ she named not a poet, but an eternal principle — that true speech is always born of reverence.”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 17, 2025
Book Review
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संघ-साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि आत्मसंयम और सेवा की जीवंत साधना है। यह परंपरा के मौन और आधुनिकता के संवाद के बीच बहने वाला विचार-सरोवर है, जिसमें हर पन्ना अनुशासन की साँस लेता है। यह नारा नहीं देता, विचार बोता है; विरोध को अस्वीकार नहीं करता, उसे आत्मसात करता है। यही साहित्य संघ की वह आत्मा है, जो शब्दों से कर्म तक, और कर्म से विचार तक अपना चक्र पूरा करती है — निरंतर, भारतीय और जीवंत।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 17, 2025
Culture
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संघ-साहित्य केवल प्रचार का उपकरण नहीं, बल्कि विचार की निरंतरता का प्रमाण है। यह शाखाओं से निकलकर पुस्तकों, पत्रिकाओं और डिजिटल संवादों में प्रवाहित होती एक चेतना है, जो अनुशासन के साथ आत्ममंथन भी सिखाती है। इन पन्नों में न केवल विचारों की गर्माहट है, बल्कि वह मौन भी है जो संस्कार बनकर पीढ़ियों में उतरता है। यह साहित्य नारे नहीं, आत्मसंवाद रचता है — और यही इसकी स्थायी प्रासंगिकता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 16, 2025
शोध लेख/विमर्श
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“भारतीय साहित्य में गहराई की कमी नहीं, पर संवाद और अनुवाद की दीवार उसे वैश्विक कानों तक पहुँचने नहीं देती। नोबेल से बड़ा है वह शब्द जो सीमाएँ लांघ जाए।”
Vivek Ranjan Shreevastav
Oct 4, 2025
Important days
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विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘भोपाल’ का लेख “वे स्थान जहां नहीं किया जाता रावण दहन” भारतीय संस्कृति की विविधता और सहिष्णुता का जीवंत प्रमाण है। इसमें उन स्थानों का वर्णन है जहां रावण को खलनायक नहीं, बल्कि विद्वान, शिवभक्त और पूजनीय रूप में याद किया जाता है — जैसे बिसरख, मंडोर, कांकेर, विदिशा, कांगड़ा और गढ़चिरौली। लेख बताता है कि भारत में हर कथा का एक से अधिक पक्ष होता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 26, 2025
शोध लेख/विमर्श
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Pandit Deendayal Upadhyaya envisioned a philosophy where politics, economics, and society revolve around the dignity of the individual. Through Integral Humanism, he rejected blind imitation of capitalism and communism, stressing Antyodaya—upliftment of the last person. As a thinker, journalist, and organizer, his writings combined philosophy with practicality. From “Rashtradharma” to economic critiques, his legacy remains a guide for human-centered, ethical development, resonating in India’s contemporary policies.
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 25, 2025
शोध लेख/विमर्श
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Pandit Deendayal Upadhyaya’s philosophy of *Integral Humanism* placed the individual at the heart of politics, economics, and society. For him, development was not about statistics but about dignity, harmony, and the upliftment of the last person—*Antyodaya*. Through writings, journalism, and organization, he built a framework where state, society, and individual worked as partners. His legacy reminds us that true progress is human-centered, not power-centered.
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 14, 2025
शोध लेख/विमर्श
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हिंदी का भविष्य केवल भावनाओं से तय नहीं होगा, बल्कि छह खानों में इसकी ताक़त और चुनौतियाँ दिखती हैं—संस्कृति, व्यापार, न्याय, शिक्षा, मीडिया और सद्भाव। बोलचाल और मनोरंजन में हिंदी मज़बूत है, पर न्याय-व्यवस्था और उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व चुनौती बना हुआ है। समाधान है मातृभाषा-आधारित शिक्षा, द्विभाषिक पुल, देवनागरी-प्रथम मानक और अंतरभाषिक सम्मान। हिंदी तभी लोकतांत्रिक धड़कन बनेगी जब आत्म-सम्मान और समावेशन साथ चलेंगे।