क्या पापा – लोल – “लोल हो गया संवाद”

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 2, 2025 व्यंग रचनाएं 2

डिजिटल युग की हंसी अब मुँह से नहीं, मोबाइल से निकलती है। पिता ‘LOL’ सुनकर असली हंसी देखना चाहते हैं, जबकि बेटा ‘BRB’, ‘ROFL’, ‘IDK’ जैसे कोड में ही भावनाएँ व्यक्त कर देता है। व्यंग्य यह है कि असली संवाद खो गया है और अब हंसी भी इमोजी व शॉर्टकट पर आउटसोर्स हो गई है। यही है हमारी पीढ़ियों का नया “लाफ्टर क्लब”—ऑनलाइन!

दीवारों का कैनवास और-दीवारें फिर बोल उठी -हास्य व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 31, 2025 व्यंग रचनाएं 0

“दीवारों का कैनवास और-दीवारें फिर बोल उठी  बचपन में ले चलता हूँ… क्या करूँ, सारी मीठी यादें तो बचपन के पिटारे में ही रह गईं। बिल्कुल उसी दादी माँ के पिटारे की तरह, जिसे हम उनकी नज़रों से बचाकर उत्सुकतावश खोल ही लेते थे। मन में कौतूहल—आख़िर दादी इस पिटारे में क्या छुपाकर रखती हैं? […]

काम करने वाला कोई नहीं घर में-satire-humor

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 30, 2025 Blogs 0

मरीज की असली तकलीफ़ टूटी हुई हड्डी नहीं, बल्कि टूटा हुआ घर-गृहस्थी का संतुलन है। डॉक्टर जब पक्का प्लास्टर लगाने का हुक्म सुनाता है तो लगता है जैसे घर में आपातकाल लागू कर दिया हो। मरीज की गुहार–“डॉक्टर साहब, घर में कोई काम करने वाला नहीं!”–अब डॉक्टर के लिए नए बिज़नेस का आइडिया बन चुकी है। बेसिक, गोल्डन और प्रीमियम पैकेज समेत!

मम्मी रिटर्न्स: ए सी कोच एडिशन-हास्य व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 29, 2025 व्यंग रचनाएं 0

*"ए.सी. डिब्बे की यात्रा कई बार हॉरर फिल्म जैसी लग सकती है। सफेद चादर ओढ़े यात्री ममी जैसे लगते हैं, और चौकीदार हाथ में लालटेन लिए किसी भूतहा हवेली का गार्ड प्रतीत होता है। मोबाइल की टॉर्च से सीट नंबर खोजना किसी रहस्यमयी लिपि पढ़ने जैसा अनुभव बन जाता है। सच मानिए, 'मम्मी रिटर्न्स: ए.सी. कोच एडिशन' किसी भी थ्रिलर मूवी को मात दे सकती है।"*

मूषक राज स्तुति-हास्य व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 27, 2025 व्यंग रचनाएं 0

गणेश चतुर्थी पर जहाँ सब गणपति की स्तुति करते हैं, वहीं उनके वाहन मूषकराज की महिमा भी अद्वितीय है। छोटे आकार में विराट शक्ति का प्रतीक मूषक राज निर्माण और विनाश दोनों का पाठ पढ़ाते हैं। राजनीति की गलियों से लेकर धर्म की रणभूमि तक, उनकी चपलता और सजगता हमें सिखाती है कि सत्य के मार्ग पर बड़ा बनने के लिए आकार नहीं, बल्कि बड़ा दिल चाहिए।

चाय ,दाल और बीबी-हास्य व्यंग्य रचना

Ram Kumar Joshi Aug 25, 2025 व्यंग रचनाएं 0

चाय, दाल और बीबी—तीनों का स्वभाव है उबलना और देर तक उबलना। ठीक से न उबले तो न स्वाद, न खुशबू और न कड़कपन। चाय सुबह ताज़गी देती है, दाल दिन सुधारती है और बीबी जीवन सँवारती है। सही उबालिए, रंग चोखा लाइए, वरना स्वाद बिगड़ जाएगा।

आ गए मेरी शादी का तमाशा देखने!-हास्य व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 25, 2025 व्यंग रचनाएं 0

"आ गए मेरी शादी का तमाशा देखने! नाना पाटेकर की झुंझलाहट, दूल्हे का डर और रिश्तेदारों की हंसी—पूरा दृश्य किसी फिल्मी फाँसी के सीन जैसा है। उधार का सूट, किराए की मुस्कान और भारी लिफाफों के बीच दूल्हा खुद को हलाल होने वाले बकरे सा महसूस कर रहा है। भीड़ के लिए यह रिसेप्शन नहीं, तमाशा है—और दूल्हे के लिए, ज़िंदगी की सबसे बड़ी सज़ा।"

मैं और मेरा मोटापा – एक प्रेमकथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 23, 2025 व्यंग रचनाएं 5

“मैं और मेरा मोटापा – एक प्रेमकथा” में तोंद और इंसान का रिश्ता मोहब्बत जैसा दिखाया गया है। पड़ोसी शर्मा जी की खीझ, रिश्तेदारों की चेतावनी, सरकार की घोषणाएँ—सब बेअसर! मोटापा हर वक्त साथ है, जैसे जीवन-संगिनी। चेतावनी बोर्ड उखाड़कर समोसे खाने की जिद और गोल फिगर को भी गौरव मानना—यह व्यंग्य सिर्फ़ शरीर नहीं, पूरे समाज की मानसिकता पर कटाक्ष है।

आराम करो –आराम में ही राम बसा है-हास्य-व्यंग्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 22, 2025 व्यंग रचनाएं 3

भागम-भाग की ज़िंदगी का असली गणित है—भाग को भाग दो, और उत्तर आएगा ‘आराम’। खाट पर लेटना, कम्बल में दुनिया की फिक्र लपेटना ही असली दर्शन है। काम दुखों की जड़ है, पर आराम में पहले से ही राम बसे हैं। खरगोश दौड़ता है, कछुआ जीतता है, क्योंकि वो आराम से चलता है। तो मेरी मानो—खाट बिछाओ, पैर फैलाओ और कलयुग के मोक्ष ‘आराम’ का आनंद लो।

अफ़सर अवकाश पर है-हास्य-व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 21, 2025 व्यंग रचनाएं 0

सरकारी दफ़्तरों की असलियत पर यह व्यंग्य कटाक्ष करता है—जहाँ अफ़सर तनख़्वाह तो छुट्टियों की लेते हैं, पर काम के नाम पर बहानेबाज़ी ही उनका असली हुनर है। दफ़्तर का बोर्ड "साहब अवकाश पर हैं" एक स्थायी सच बन चुका है। अवकाश-प्रेम की यह आदत अब दफ़्तर की गलियों में लोककथा बन गई है, जहाँ छुट्टियाँ ही मोक्ष हैं और काम केवल ‘सुविधा शुल्क’ से जुड़ा हुआ कर्म।