डिजिटल लत और परिवारों के बिखरते ताने-बाने
भारत में डिजिटल क्रांति ने जहां अवसर दिए, वहीं एक नई चुनौती भी खड़ी कर दी—डिजिटल लत। यह लेख बताता है कि कैसे स्क्रीन के बढ़ते समय ने बच्चों, रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया है।
भारत में डिजिटल क्रांति ने जहां अवसर दिए, वहीं एक नई चुनौती भी खड़ी कर दी—डिजिटल लत। यह लेख बताता है कि कैसे स्क्रीन के बढ़ते समय ने बच्चों, रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित किया है।
भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है, फिर भी वैश्विक रैंकिंग में वह छठे स्थान पर खिसक गई—यह विरोधाभास केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि विकास, वितरण और वास्तविक समृद्धि की गहरी कहानी है।
What if humans never lost their tails—or worse, replaced them with something far more powerful? This biting satire explores how caste has become the invisible tail that defines identity, power, and democracy in India.
भारत की बी.पी.एल. संस्कृति पर तीखा व्यंग्य—जहाँ लग्ज़री कार वाले भी गरीब हैं और असली गरीब सिस्टम में फंसे हैं। पढ़ें लोकतंत्र की विडंबनाओं पर हास्य-व्यंग्य से भरपूर लेख।
गंगापुर सिटी के पास स्थित नाजिम वाला तालाब—जहां 60 से अधिक प्रवासी पक्षी हर सर्दी में अपना बसेरा बनाते हैं। प्रकृति प्रेमियों और बर्ड वॉचर्स के लिए यह एक अनमोल धरोहर है।
सत्य बनाम सफलता: साध्य–साधन की कसौटी पर जीवन जीवन के चौराहों पर सबसे पेचीदा प्रश्न यही उठता है सत्य चुनें या सफलता? अनुभव कहता है कि झूठ, छल और शॉर्टकट से लोग जीतते दिखते हैं; मन डगमगाता है। पर इतिहास, संस्कृति और अंतरात्मा तीनों मिलकर धीरे-धीरे एक ही निष्कर्ष पर लाते हैं: साध्य तभी पवित्र […]
वाराणसी—जहां गंगा के तट पर बसता है इतिहास, आध्यात्म और जीवन का अनोखा दर्शन। इस यात्रा-वृत्तांत में जानिए काशी विश्वनाथ मंदिर, गंगा घाटों और बनारसी संस्कृति की गहराई।
भारतीय समाज में लाइन में लगना एक कला बन चुकी है—गैस सिलेंडर से लेकर ऑनलाइन बुकिंग तक। पढ़िए एक रोचक और तीखा व्यंग्य “लाइन में खड़े रहने का हुनर”।
“संकल्प”—एक ऐसी सीरीज़ जो दिमाग से खेलती है, लेकिन दिल तक पहुँचने में वक्त लेती है। क्या यह चाणक्य की रणनीति है या धीमी कहानी का जाल? पढ़िए पूरा विश्लेषण।
“हमने बेशर्मी को साधना की तरह साध लिया है—और अब जब पड़ोसी देश सुधार की बात करते हैं, तो हमें असुविधा होने लगती है।” यह व्यंग्य न केवल भारतीय राजनीति की विडंबनाओं को उजागर करता है, बल्कि हमारे सामाजिक स्वभाव पर भी तीखा सवाल खड़ा करता है।