डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 29, 2025
Cinema Review
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राजेश खन्ना पहले सुपरस्टार नहीं थे, वे उस दौर का नाम थे जब सिनेमा पूजा बन गया था।
तालियाँ जब बहुत देर तक बजती रहें, तो आदमी शोर का आदी हो जाता है और खामोशी उसे डराने लगती है।
जिसने एक बार शिखर को घर समझ लिया, वह ज़िंदगी भर मैदान को कमतर मानता रहा।
काका की मुस्कान जितनी चमकदार थी, उनके भीतर का अकेलापन उतना ही गहरा।
Ram Kumar Joshi
Dec 29, 2025
व्यंग रचनाएं
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हर विदेशी—चाहे इंसान हो या बोतल—धीरे-धीरे अंदर तक मार करता है।”
“शराब बदबू नहीं, गंध कहलाती है—यह सरकारी मान्यता प्राप्त पेय पदार्थ है।”
“पुलिस थाने में संभ्रांत वर्ग की औकात बस इतनी ही होती है।”
“आम आदमी की सेवार्थ—यह पंक्ति सिर्फ़ बोर्ड पर लिखी जाती है, दिल में नहीं।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 27, 2025
India Story
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यह साल किसी कैलेंडर की तरह नहीं बीता, बल्कि अधूरी डायरी की तरह—जहाँ स्याही कम और धड़कन ज़्यादा थी। घटनाएँ बदलीं, लेकिन उनसे ज़्यादा बदले हमारे डर, ग़ुस्सा और चुप्पियाँ।
यह साल हमें किसी नतीजे तक नहीं लाया, बल्कि सवालों की लंबी सूची सौंप गया—कि हम क्या सोचते हैं, कैसे सोचते हैं और कब चुप रहते हैं।
आतंक, युद्ध, आस्था, कॉमेडी, सोशल मीडिया—हर मोर्चे पर यह साल हमें भीतर तक झकझोरता रहा। इतिहास बनता रहा, और हम बदलते रहे।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 24, 2025
Culture
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यह व्यंग्यात्मक चिट्ठी एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति की उन इच्छाओं का दस्तावेज़ है, जो सरकारों, बैंकों और व्यवस्थाओं से निराश होकर सीधे सांता क्लॉज़ तक पहुँचती हैं। मोज़ों से लेकर स्विस अकाउंट, बिजली बिल से लेकर बॉस की मीटिंग तक—यह रचना हास्य, विडंबना और करुणा के बीच झूलती एक सच्ची सामाजिक तस्वीर पेश करती है।
Abhishek Ghuwara
Dec 24, 2025
Blogs
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अरावली पर्वतमाला को केवल मीटरों में मापना, उसकी अन्तरात्मा को अनदेखा करना है। यह पहाड़ नहीं, जल, जीवन और जलवायु की जीवित अवसंरचना है।
Vivek Ranjan Shreevastav
Dec 19, 2025
व्यंग रचनाएं
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जब साहित्य अकादमी में प्रेस कॉन्फ़्रेंस बिना प्रेस और बिना कॉन्फ़्रेंस के खत्म हो जाए, तब समझ लेना चाहिए कि साहित्य से ज़्यादा राजनीति बोल रही है—और व्यंग्य चुप नहीं रह सकता।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 19, 2025
व्यंग रचनाएं
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शिक्षक अब अ, आ, इ के साथ-साथ भौं-भौं व्याकरण में भी दक्ष हो रहे हैं।”
“लोकतंत्र में अब सिर्फ़ इंसान नहीं, कुत्ते भी सर्वे-योग्य नागरिक हो चुके हैं।”
“देश का भविष्य अब कक्षा में नहीं, गली-मोहल्लों में कुत्तों की गिनती में खोजा जा रहा है।”
“सरकार की नज़र में संख्याबल सर्वोपरि है—चाहे वह इंसान का हो या कुत्ते का।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 17, 2025
व्यंग रचनाएं
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भूमिका वह साहित्यिक ढाल है जिसके पीछे लेखक अपनी रचना की सारी कमजोरियाँ छुपा लेता है। यह किताब का परिचय नहीं, बल्कि लेखक की अग्रिम क्षमायाचना होती है—जहाँ दोष शैली का होता है, लेखक का कभी नहीं।
Pradeep Audichya
Dec 16, 2025
व्यंग रचनाएं
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चौराहे पर बैठा वह कोई साधारण जानवर नहीं था—वह डर, लापरवाही और व्यवस्था की मिली-जुली पैदाइश था। उसकी गुर्राहट में कानून की चुप्पी और उसके सींगों में सत्ता की स्वीकृति चमक रही थी।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 16, 2025
व्यंग रचनाएं
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अब बच्चा भगवान की देन नहीं, माता-पिता की पसंद बनता जा रहा है।
आँखों का रंग, करियर, आईक्यू—सब कुछ पैकेज में मिलेगा।
पर सवाल यह है कि डिज़ाइन में मासूमियत का कॉलम क्यों छूट गया?