उत्सवों का देश: स्मृति से पुनर्जागरण तक

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 24, 2025 Culture 0

“कभी ‘यंतु, नजिक, चियां-चुक’—स्वर्ग के केंद्र—कहलाने वाली धरती आज अपने ही लोक-उत्सव भूल रही है। देव उठान एकादशी हमें याद दिलाती है कि रोशनी बिजली से नहीं, स्मृति से जलती है।” “रंग पंचमी से सामा-चकेबा और इगास तक—सैकड़ों लोक-त्यौहार विलुप्ति की कगार पर हैं। समाधान सरल है: परिवार को फिर केंद्र बनाइए, कथा सुनाइए, आँगन में देव उकेरिए, और परंपरा को फिर से जी लीजिए।” “गोवर्धन की गोबर-आकृति, हरियाली तीज के झूले, लोहड़ी का अलाव—ये सब ‘इवेंट’ नहीं, समाज की धड़कन हैं। देव उठान की शुरुआत के साथ याद करें: अनुष्ठान का अर्थ ‘औचित्य’ है, ‘आडंबर’ नहीं।”

भाईदूज — तिलक की रेखा में स्नेह, उत्तरदायित्व और रोशनी

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 23, 2025 Culture 0

“भाईदूज सिर्फ़ माथे का तिलक नहीं, रिश्ते की आत्मा में बसे भरोसे का पुनर्स्मरण है।” “जब बहन तिलक लगाती है, वह केवल दीर्घायु नहीं मांगती—वह भाई की सजगता और संवेदना की प्रार्थना करती है।” “तिलक की लाल रेखा विश्वास की नीति बन जाती है—जहाँ असहमति भी आदर के साथ संभव होती है।” “भाईदूज का असली दीप वह है जो रिश्ते के अंधकार में भी एक-दूसरे को देखने की रोशनी देता है।”

अन्नकूट महाप्रसाद — स्वाद, परंपरा और साझेपन की कथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 22, 2025 Culture 0

दीवाली और गोवर्धन के बीच का दिन केवल त्योहार का अंतराल नहीं, बल्कि साझेपन की परंपरा का उत्सव है। पहले अन्नकूट में हर घर का स्वाद एक प्रसाद में घुलता था — अब प्लेटें बदल गईं, मसाले डिब्बाबंद हो गए, परंपरा जीवित है, बस आत्मा में ‘मॉडर्न टच’ आ गया है। स्वाद अब स्मृति में है — और स्मृति ही असली प्रसाद है।

संघ-साहित्य: शब्दों में अनुशासन, विचारों में संवाद

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 17, 2025 Culture 0

संघ-साहित्य केवल प्रचार का उपकरण नहीं, बल्कि विचार की निरंतरता का प्रमाण है। यह शाखाओं से निकलकर पुस्तकों, पत्रिकाओं और डिजिटल संवादों में प्रवाहित होती एक चेतना है, जो अनुशासन के साथ आत्ममंथन भी सिखाती है। इन पन्नों में न केवल विचारों की गर्माहट है, बल्कि वह मौन भी है जो संस्कार बनकर पीढ़ियों में उतरता है। यह साहित्य नारे नहीं, आत्मसंवाद रचता है — और यही इसकी स्थायी प्रासंगिकता है।

भीतर का समुद्र-मंथन: विष से अमृत तक की आत्मिक यात्रा

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 30, 2025 Culture 0

समुद्र-मंथन की कथा हमें बताती है कि जीवन की साधना सबसे पहले विष का सामना है—आलोचना, उपहास और असुविधा का। लेकिन यही विष जब धारण कर लिया जाए तो भीतर से रत्न प्रकट होते हैं—प्रतिभा, विवेक, गरिमा, समृद्धि और अंततः अमृत। यह कथा हमें याद दिलाती है कि हर संघर्ष एक नया जागरण है और भीतर की देवी ही हमारी असली शक्ति है।

सामवेद—नाद ब्रह्म, ध्वनि से समाधि तक

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 26, 2025 Culture 0

सामवेद हमें सिखाता है कि शब्द तभी पूर्ण होते हैं जब वे सुर और लय में ढलकर कंपन बनें—वही कंपन मन को विन्यस्त करता है, ऊर्जा को संतुलित करता है और चेतना को निर्मल करता है। नाद-ब्रह्म का अर्थ है: ध्वनि ही दिव्य है; सुर से भीतर का शोर शांत होता है और मौन में अनहद नाद प्रकट होता है। जीवन को राग बनाइए—काम यज्ञ बने, संबंध उत्सव, और प्रकृति गुरु।

नवरात्र : नई ऊर्जा और शक्ति जागरण का पर्व

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 17, 2025 Culture 0

नवरात्र केवल देवी उपासना का अवसर नहीं, बल्कि आत्मबल और चेतना जागरण का पर्व है। नौ रातें हमें याद दिलाती हैं कि शक्ति हमारे भीतर ही है—साहस, करुणा, विवेक और धैर्य के रूप में। प्राचीन ग्रंथों की तरह यह पर्व भी अमर संदेश देता है—अपने भीतर के अंधकार को पहचानो और उसे परास्त कर दिव्यता की ओर बढ़ो। यही नवरात्र का शाश्वत सत्य है।

ग्रहण : आत्मचिंतन की छाया में सूर्य और चंद्र

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 8, 2025 Culture 0

ग्रहण केवल खगोलीय घटना नहीं, बल्कि भीतर की छाया का प्रतीक है। राहु हमारे मन और ज्ञान दोनों को ग्रसने की कोशिश करता है — कभी भावनाएँ मलिन करता है, कभी विवेक धुँधला। सूर्य और चंद्र की यह लीला हमें आत्मचिंतन सिखाती है: छाया चाहे गहरी हो, प्रकाश लौटता अवश्य है।

राधाष्टमी : राधा-कृष्ण प्रेम की अनंत व्याख्या

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 31, 2025 Art and Craft 0

राधाष्टमी केवल जन्मोत्सव नहीं, बल्कि प्रेम और समर्पण की परम व्याख्या है। राधा-कृष्ण का मिलन आत्मा और परमात्मा का प्रतीक है। उनके प्रेम में अधिकार नहीं, समर्पण है; वियोग में भी साधना है। यही निष्कलुष प्रेम हमें सिखाता है कि प्रेम का असली सौंदर्य त्याग और अर्पण में है।

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त्रिम्बकेश्वर से जुडी पौराणिक कथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 10, 2021 Blogs 0

त्र्यंबकेश्वर से संबंधित दो कथाएं हैं। एक कहानी पद्म पुराण के अनुसार सिंहस्थ पर्व के बारे में है। कहानी १  सदियों पहले भारत में देवी-देवता विचरण करते थे। उन्होंने विभिन्न कठिनाइयों के समय यहां रहने वाले संतों और लोगों की मदद की, खासकर राक्षसों से जो उपद्रव कर रहे थे। हालाँकि, इस लड़ाई में आम […]