लौहपुरुष सरदार पटेल : जिसने बिखरे भारत को एक सूत्र में बाँधा

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 1, 2025 People 0

On Sardar Vallabhbhai Patel Jayanti, the nation remembers the “Iron Man of India” — a leader who transformed 565 fragmented princely states into one united Bharat. From his early days as a lawyer to his monumental role as India’s first Home Minister, Patel’s courage, foresight, and diplomacy built the foundation of modern India.

विवेकानंद और आधुनिक प्रायोगिक वेदान्त की प्रासंगिकता

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 21, 2025 People 0

स्वामी विवेकानंद ने वेदान्त को ग्रंथों से निकालकर जीवन के प्रत्येक कर्म में उतारा — उन्होंने कहा, “यदि वेदान्त सत्य है, तो उसे प्रयोग में लाओ।” उनका “प्रायोगिक वेदान्त” हमें सिखाता है कि पूजा केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि मनुष्य की सेवा में है; ध्यान केवल मौन में नहीं, बल्कि कर्म और करुणा में है। आज जब समाज भेदभाव, स्वार्थ और मानसिक असुरक्षा से जूझ रहा है, तब विवेकानंद का यह संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है — “हर आत्मा संभावित रूप से दिव्य है; उस दिव्यता को प्रकट करना ही जीवन का लक्ष्य है।”

अमिताभ: स्टारडम से सरोकार तक — एंग्री यंग मैन की जर्नी, रिश्ते और विवाद

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 13, 2025 People 1

चार पीढ़ियों को मोहित करने वाली आवाज़ से लेकर राजनीति, रिश्तों और 1984 के आरोपों तक—अमिताभ बच्चन की जर्नी जहां स्टारडम चमकता है और सरोकार सवाल पूछते हैं। ‘जंजीर’ की विजय-गाथा, ‘दीवार–शोले’ का स्वर्णकाल, जया–रेखा एपिसोड, गांधी परिवार से नज़दीकियाँ, ‘कूली’ हादसा और 1984 पर उठे प्रश्न—एक समग्र टाइमलाइन और संदर्भ।

ला:स्लो क्रॉस्नॉहोरकै — शब्दों के प्रवाह में बहता अँधकार : साहित्य का नोबेल पुरस्कार 2025

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 10, 2025 News and Events 0

László Krasznahorkai, the Hungarian master of long, meditative sentences and existential depth, has been awarded the 2025 Nobel Prize in Literature. His works—filled with flowing intensity, philosophical unease, and haunting imagery—redefine the limits of narrative form. As the world celebrates him, Hindi readers too stand to rediscover the boundless possibilities of literary expression and human introspection through his timeless prose.

बिटिया दिवस – कैलेंडर में साल में एक दिन दर्ज, दिल में स्थायी रूप से

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 28, 2025 Important days 0

बेटी दिवस पर यह व्यंग्य पूछता है—क्या बेटी के लिए कोई अलग डे बनाना ज़रूरी है? वो तो पिता के जीवन की सदा बहार वसंत है। उसके आंसू पिघला दें, उसकी हंसी दिल जीत ले। समाज उसे देवी कहता है, पर फैसले छीन लेता है। असली उत्सव तब होगा जब बेटियों को दिन नहीं, बल्कि पूरी दुनिया मिले।

शिक्षक दिवस: राधाकृष्णन की रोशनी में आज का अँधेरा पढ़ना

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 5, 2025 Important days 5

शिक्षक दिवस केवल तारीख नहीं, विचार की परीक्षा है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन हमें सिखाते हैं कि शिक्षा डिग्री नहीं, चरित्र-निर्माण है; ज्ञान तभी शक्ति है जब वह सेवा बने। गुरु सीढ़ी हैं—जो हमें ऊपर ले जाती है। आज की चुनौती है सूचना के शोर में स्वतंत्र चिंतन बचाना, स्क्रीन-टाइम घटाकर मनन बढ़ाना, और ईमानदारी की छोटी प्रतिज्ञाओं से समाज में बड़ा परिवर्तन लाना—दीप से दीप जलाने की परंपरा निभाना।

राजा भर्तृहरि : श्रृंगार से वैराग्य तक की जीवनयात्रा

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 1, 2025 Important days 2

कभी मुकुट और महल के स्वामी रहे भर्तृहरि, अंततः साधु की लाठी और तप की गहनता में लीन हो गए। उनकी कथा सिखाती है—श्रृंगार मोहक है, नीति स्थिर है और वैराग्य शाश्वत। यही त्रिवेणी है उनका शतक, जो आज भी जीवन के सत्य का दर्पण है।

World Photography Day – A Nostalgic Reflection

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 19, 2025 Fashion,Food and Traveling 0

On World Photography Day, I look back at my 12-year journey—from a compact birthday gift camera to chasing birds at Ranthambhore and Ghana. Those days of patience, setups, and waiting for the perfect shot feel magical now, in contrast to today’s AI blur where real and generated frames look alike.

सच्ची दोस्ती की कड़ियाँ — एक अद्भुत बंधन की बुनावट

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 3, 2025 Important days 2

जीवन की उलझनों के बीच, यह कहानी एक ऐसे मित्र की है, जिसकी उपस्थिति पुराने स्कूल दिनों की मासूमियत और बेलगाम हँसी की याद दिलाती है। ये दोस्ती समय और दूरी से परे, एक ऐसा रिश्ता है जो सामाजिक मुखौटों को हटाकर आत्मीयता की गहराइयों में उतरता है। चाहे टमाटर चुराना हो या किराए के कमरे में फिल्में देखना, हर स्मृति इस बंधन को अमूल्य बनाती है। यह मित्र न सिर्फ सहारा है बल्कि आत्मीयता का प्रतीक भी है — एक ऐसा रत्न जो दुनिया की हर दौलत से अनमोल है।

मुंशी प्रेमचंद जी की कुर्सी-व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 31, 2025 People 0

मुंशी प्रेमचंद की ऐतिहासिक कुर्सी अब एक प्रतीक है—सच्चे लेखन, मूल्यों और विचारों की अडिगता का। पर आज का लेखक इस कुर्सी की स्थिरता नहीं, उसकी रिवॉल्विंग खोजता है—जो सत्ता, समीक्षकों और विमोचन मंडलियों की दिशा में घूम सके। प्रेमचंद की फटी चप्पलें तो स्वीकार हैं, पर उनकी कुर्सी का सीधा-सरल डिज़ाइन नहीं। आज की कुर्सियाँ चिपकने वाली हैं, घूमने वाली हैं, कई पहियों वाली हैं। लेखक का संघर्ष अब सृजन का नहीं, कुर्सी को हथियाने और बचाने का हो गया है। प्रेमचंद की कुर्सी आज भी अडिग है—क्योंकि उसमें गोंद नहीं था, केवल आत्मा थी।