तन माटी रो पुतला: कबीर भजन श्रृंखला की चौथी निर्गुण भजन प्रस्तुति

“तन माटी रो पुतला” — कबीर भजन श्रृंखला की चौथी रचना | निर्गुण भक्ति, सूफ़ियाना लोक और जीवन-सत्य का गीत

कबीर की वाणी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह जीवन के सबसे गहरे सत्य को बहुत सहज, सीधे और लोकभाषा के अंदाज़ में कह देती है। न कोई भारी-भरकम शास्त्रीय बोझ, न कोई जटिल व्याख्या—बस एक सादा-सा शब्द, और भीतर तक उतर जाने वाली चोट। इसी परंपरा को आगे बढ़ाने का एक छोटा-सा प्रयास है मेरी नई रचना “तन माटी रो पुतला”, जो मेरी कबीर भजन श्रृंखला की चौथी प्रस्तुति है।

इससे पहले इस श्रृंखला की रचनाओं को YouTube पर आप सभी का बहुत स्नेह और लोकप्रियता मिली है। उसी प्रेम, प्रेरणा और आत्मिक ऊर्जा से यह नया निर्गुण भजन रचा और संगीतबद्ध किया गया है।

पूरी रचना YouTube पर सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें:


निर्गुण भजन क्या होते हैं?

निर्गुण भजन उस भक्ति परंपरा से जुड़े हैं जहाँ ईश्वर को किसी एक मूर्ति, आकार, प्रतीक या बाहरी कर्मकांड में सीमित नहीं किया जाता। यहाँ ईश्वर को भीतर के सत्य, चेतना, प्रेम, नाम और आत्मबोध के रूप में देखा जाता है।

कबीर, रैदास, दादू, बुल्ले शाह जैसी संत परंपराओं में यह भाव बार-बार आता है कि मनुष्य बाहर खोजता रहता है, जबकि असली साधना भीतर उतरने की है। निर्गुण भजन हमें याद दिलाते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है, देह नश्वर है, धन-संपत्ति साथ नहीं जाती—केवल कर्म, प्रेम और नाम का सहारा रहता है।


“तन माटी रो पुतला” का मूल भाव

इस भजन का केंद्रीय भाव है—
माया का अभिमान मत कर, देह का गुमान मत कर, क्योंकि यह तन अंततः माटी का ही पुतला है।

गीत की पंक्तियाँ जीवन की नश्वरता को लोकभाषा के सरल प्रतीकों से व्यक्त करती हैं। कभी देह को माटी का पुतला कहा गया है, कभी जीवन को तेल पर जलते दीये जैसा बताया गया है। जब तक तेल है, लौ है; जब तेल समाप्त, तो उजाला भी समाप्त। यही जीवन का सीधा-सादा सत्य है।


गीत के बोल

माटी का तन रे बंदे

[Refrain / मुखड़ा]
मत कर धन का रे अभिमान,
मत कर तन का रे गुमान,
तन माटी रो पुतला।

मत कर धन का रे अभिमान,
मत कर तन का रे गुमान,
तन माटी रो पुतला।

[Pre-Chorus]
ओ… तन माटी रो पुतला रे,
जैसे बादल री छाया।

[Chorus]
एक झोंको काल को आवे,
एक पल में सब खो जावे,
नाम बिना क्या पाया?
रे बंदे, नाम बिना क्या पाया?

[Verse 1]
राज महल में बैठा राजा,
सोना-चाँदी बाजा-बाजा,
संग न कछु भी जावे।

[Pre-Chorus]
ओ… संग न कछु भी जावे रे,
हाथ खाली रह जावे।

[Chorus]
एक झोंको काल को आवे,
एक पल में सब खो जावे,
नाम बिना क्या पाया?
रे बंदे, नाम बिना क्या पाया?

[Verse 2]
काया नगरी झूठी सारी,
साँस-साँस है उधारी,
कौन यहाँ ठहराया?

[Pre-Chorus]
ओ… कौन यहाँ ठहराया रे,
सब मेले का माया।

[Chorus]
एक झोंको काल को आवे,
एक पल में सब खो जावे,
नाम बिना क्या पाया?
रे बंदे, नाम बिना क्या पाया?

[Verse 3]
दीया जले जब तेल रहावे,
तेल खुटे तो लौ बुझ जावे,
अंधियारो छा जावे।

[Pre-Chorus]
ओ… अंधियारो छा जावे रे,
ज्यों सपनो बिखराया।

[Chorus]
एक झोंको काल को आवे,
एक पल में सब खो जावे,
नाम बिना क्या पाया?
रे बंदे, नाम बिना क्या पाया?

[Verse 4 / Kabir Bhav]
कहत असीमित सुन रे ज्ञानी,
झूठी काया, झूठी कहानी,
साचा नाम सहारा।

[Pre-Chorus]
ओ… साचा नाम सहारा रे,
बाकी जग बंजारा।

[Final Chorus]
एक झोंको काल को आवे,
एक पल में सब खो जावे,
नाम बिना क्या पाया?
रे बंदे, नाम बिना क्या पाया?

मत कर धन का रे अभिमान,
मत कर तन का रे गुमान,
तन माटी रो पुतला॥


संगीत शैली और प्रस्तुति

इस भजन को Kabir-Cafe inspired Sufi-Folk Nirgun Bhajan की शैली में तैयार किया गया है। इसमें देसी लोकधुन, सूफ़ियाना असर और इंडी-फोक फ्यूज़न का मेल रखा गया है।

संगीत में तानपुरा/हारमोनियम ड्रोन, अकॉस्टिक गिटार स्ट्रमिंग, खड़ताल, ढोलक, मंजीरा, हल्की तबला संगत, फोक बेस, बाँसुरी के छोटे-छोटे स्पर्श और समूह कोरस का प्रयोग उपयुक्त रहेगा।

इसका टेम्पो लगभग 92–100 BPM के आसपास, 6/8 फोक स्विंग फील में रखा जा सकता है, जिससे भजन में लोक-लय भी बनी रहे और सूफ़ियाना ट्रांस जैसा ध्यानमय प्रभाव भी आए।

मुख्य हुक—
“नाम बिना क्या पाया, रे बंदे नाम बिना क्या पाया”
को कॉल-एंड-रिस्पॉन्स शैली में गाया जाए तो यह श्रोताओं के मन में तुरंत बैठ सकता है।


क्यों सुनें यह भजन?

यह गीत केवल सुनने के लिए नहीं, ठहरकर सोचने के लिए है। यह हमें याद दिलाता है कि राजमहल, धन, तन, अहंकार—सब क्षणिक हैं। अंत में मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है।

कबीर की परंपरा में यही सबसे बड़ा प्रश्न है—
अगर नाम, प्रेम, सत्य और कर्म साथ नहीं, तो फिर जीवन में सचमुच पाया क्या?


मेरी कबीर भजन श्रृंखला

यह रचना मेरी कबीर भावधारा से प्रेरित भजन श्रृंखला की चौथी प्रस्तुति है। इससे पहले की रचनाओं को YouTube पर श्रोताओं ने बहुत प्रेम दिया। आप उन्हें भी यहाँ सुन सकते हैं:

  1. मनवा मेरा बन गया जोगी
  2. मन रे जरा ठहर तो सही
  3. वक्त का पहिया घूमे रे
  4. दर पे भूखा बैठा रे

अंतिम बात

“तन माटी रो पुतला” एक लोक-सूफ़ियाना निर्गुण भजन है, जो देह और धन के अभिमान से हटाकर भीतर के नाम, सत्य और सहज भक्ति की ओर ले जाने का प्रयास करता है।

आपसे निवेदन है—गीत सुनें, महसूस करें, और अच्छा लगे तो अपने मित्रों, परिजनों और कबीर-प्रेमियों के साथ अवश्य साझा करें।

पूरे भजन का YouTube लिंक:

– डॉ. मुकेश असीमित
Music with Mukesh

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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