Ram Kumar Joshi
Feb 11, 2026
हिंदी कविता
2
यह कविता महानगर दिल्ली की चकाचौंध, अव्यवस्था और आम आदमी की असहजता पर तीखा, लेकिन हल्का-फुल्का व्यंग्य है। ‘बीबी कहाँ छिटक गई’ सिर्फ़ एक व्यक्ति के खोने की बात नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की स्थिति का रूपक है, जो महानगरीय भीड़, जेबकतरी, शोर और भ्रम में स्वयं को खो बैठता है। हाथी की पूँछ और हिलती डोर जैसी प्रतीकात्मक पंक्तियाँ सत्ता, व्यवस्था और भ्रमजाल पर करारा कटाक्ष करती हैं। कविता सरल भाषा में शहरों की जटिल सच्चाई उजागर करती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 6, 2026
हिंदी कविता
0
“रास्ते मिल गए हैं,
पर मंज़िल गुम हो गई है कहीं।”
“हम आगे इसलिए नहीं बढ़े
कि सबको साथ ले जाएँ,
बल्कि इसलिए
कि पीछे छूटे लोग
दिखाई न दें।”
“वे लोकतंत्र के पहियों तले कुचले गए—
लेकिन ट्रैफिक नहीं रुका।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 1, 2026
हिंदी कविता
0
हुक्का सिर्फ़ धुआँ नहीं छोड़ता,
वह सदियों की जाति उगलता है।
उसकी चिलम में तंबाकू नहीं,
इतिहास सुलगता है।
जिसका हुक्का, उसकी हवा—
बाक़ी सब अपराधी साँसें।
यह गीत लोक का नहीं,
जन्म से थोपे गए पहचान का है।
Ram Kumar Joshi
Jan 11, 2026
हिंदी कविता
2
“हिन्दी में बिन्दी की महत्ता, ज्यों खोजे गहराती है।”
“तुलसी मीरा सूर कबीरा, अलख जगाई हिन्दी की।”
“राजभाषा भले कहे हम, दोयम दर्जा थोप दिया।”
“अभिमान करें अपनी थाती का, स्वभाषा का सम्मान करें।”
Prahalad Shrimali
Jan 9, 2026
हिंदी कविता
0
कभी कच्चा केला, कभी पका आम—
बाज़ार, राजनीति और मोबाइल की आंच में
हर रिश्ता, हर मूल्य
अपना रंग बदलता हुआ मिलता है।
Ram Kumar Joshi
Jan 5, 2026
हिंदी कविता
1
सम्मान, पुरस्कार और नोटों की थैलियों से सजे कवि सम्मेलन,
जहाँ कविता की तलाश में गए श्रोता
मसखरी लेकर लौटे।
यह व्यंग्य उन बड़े नामों पर है,
जिनकी आवाज़ भारी है
और अर्थ हल्का।
Prahalad Shrimali
Dec 26, 2025
हिंदी कविता
0
“हमसे हर ओर उजाले हैं, क्योंकि हम दिलवाले हैं!”
“चेहरे पर कोई चेहरा नहीं, जो हैं, हम हूबहू हैं वही!”
“प्रेम हमारा जीवन सार, प्रकृति से करते हैं प्यार!”
“अनुपम यह आत्म-उपहार, तुकबंदी भरे ये प्रिय उद्गार!”
Vidya Dubey
Dec 13, 2025
हिंदी कविता
1
“टूटा आईना कभी दाग छुपा लेता है, कभी छुपे घाव दिखा देता है—एक ही प्रतिबिंब में बिखराव और आत्मबोध का सुंदर द्वंद्व।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 9, 2025
Poems
0
“कचरा —
बन बैठा है मानवीय संबंधों का नया व्याकरण।
वह चाय के प्यालों में बहस बनकर उफनता है,
और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के ‘ज्ञान’ में
अवधारणाओं को सड़ा देता है।”
Vidya Dubey
Dec 1, 2025
हिंदी कविता
2
“प्रेम की मदहोश धड़कनों में खोई एक आत्मा—जिसे न जाने कब अपने ही भीतर से किसी और का उजाला छू गया। ‘मैं तेरी ही कब हो गई’ में विद्या दुबे प्रेम की उस सूक्ष्म अनुभूति को रेखांकित करती हैं जहाँ व्यक्ति स्वयं से सरककर प्रिय की परछाई बन जाता है, अनकहे जादू में डूबता चला जाता है।”