डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 9, 2025
Poems
1
रक्षा सूत्र का संकल्प सिर्फ परंपरा नहीं, यह भय के अंधेरों में जलती प्रतिज्ञा की मशाल है। नाज़ुक धागे में बंधा विश्वास, समाज की दरारों में फैली दरिंदगियों को राख कर, नए जीवन की नींव रखता है। यह वादा है — ढाल बनने का, साथ खड़े रहने का।
Vidya Dubey
Aug 5, 2025
हिंदी कविता
2
यह कविता मायके की गहरी भावनात्मक यादों को समेटे हुए है। इसमें एक बेटी का अपने बचपन के आंगन, गली-चौबारे, पुराने नाम, प्यार-दुलार और पुरानी धुनों को वापस पाने की ललक उभरती है। कवयित्री को सोना-चांदी या हीरे-मोती की चाह नहीं, बस अपने मायके की मिट्टी की गंध, उस छोटे किनारे की गर्माहट और अपनों का सहारा चाहिए। यह कविता नारी की संवेदनशील भावनाओं का चित्रण है, जो विवाह के बाद अपने मायके की अनमोल स्मृतियों को दिल में संजोए रहती है। यह ममता, अपनापन और अतीत की सजीव झलक पेश करती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 4, 2025
Poems
2
समय की धारा में बहते हुए रिश्तों का यह मार्मिक चित्रण है — जहाँ कभी हँसी-ठिठोली, सपनों की साझेदारी और चाय की चौपाल थी, वहाँ अब दिखावटी पोस्ट और व्यस्तताएँ हैं। 'दोस्त बदल गए हैं यार' न केवल एक वाक्य है, बल्कि एक पीढ़ी की सामूहिक टीस है, जो अपनी जड़ों की तलाश में आज भी पलटकर देखती है।
Sanjaya Jain
Jul 27, 2025
हिंदी कविता
3
इस कविता में एक रात का भावचित्र है — जहाँ चाँद नहीं निकला, फिर भी कोई और "चाँद सा" मौजूद है जो सबका ध्यान खींच रहा है। उसकी अदाएँ, शर्मीलापन, सौंदर्य और भावनाओं की सजीवता से पूरी महफिल रोशन है। वह निराशा के अंधेरे में भी एक दीपक सा जगमगा रहा है — शान-ए-महफिल बनकर।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 25, 2025
हिंदी कविता
4
यह कविता एक खोज है उस झूठ की, जिसे हमने सच मान लिया—जिसे प्रार्थनाओं, राष्ट्रगान, टीवी बहसों और भावनाओं में पवित्रता की तरह सजाया गया। यह झूठ अब विश्वास से अधिक विश्वसनीय हो गया है, और सत्य को दरकिनार कर चुका है।
Dr Shailesh Shukla
Jul 17, 2025
हिंदी कविता
1
यह कविता हिंदी भाषा को राजभाषा का दर्जा मिलने के बावजूद उसके व्यावहारिक उपयोग में आने वाली चुनौतियों और उपेक्षा को दर्शाती है। यह बताती है कि कैसे हिंदी केवल कागजी कार्यवाही और भाषणों तक सीमित है, जबकि दैनिक जीवन, प्रशासन और तकनीकी क्षेत्रों में अंग्रेजी का वर्चस्व है। कविता हिंदी के प्रति दिखावे के सम्मान और वास्तविक उपेक्षा के बीच के अंतर को उजागर करती है, और इस बात पर जोर देती है कि हिंदी को सही मायने में सम्मान तभी मिलेगा जब वह जन-जन की भाषा बने और हर क्षेत्र में उसका सच्चा उपयोग हो।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 15, 2025
हिंदी कविता
0
बारिश की धीमी बूँदें जैसे प्रेम पत्र हों, जो धरती पर उतरते ही एक गीत बन जाएं। डॉ. मुकेश असीमित की कविता "बरसात की बूंदे" न केवल प्रकृति की कोमलता को दर्शाती है, बल्कि उसमें छिपे प्रेम, आत्मिक जुड़ाव और आशाओं को भी खूबसूरती से रचती है।
Vidya Dubey
Jul 15, 2025
हिंदी कविता
2
बारिश की हर बूंद, प्रतीक्षा की तपिश से दहकती है। पेड़-पत्ते जवां हैं, बगिया महकी है, लेकिन प्रेमी नहीं आया। बूंदें अब फूल नहीं, अंगारे बन गई हैं। विद्या पोखरियाल की स्वरचित कविता प्रेम, विरह और मानसून की इस जटिल रागिनी को भावभीने ढंग से उजागर करती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 14, 2025
हिंदी कविता
2
क्या आज़ादी सिर्फ कैलेंडर की छुट्टी बनकर रह गई है?
डॉ. मुकेश असीमित द्वारा स्वरचित और स्वरांजलि में प्रस्तुत यह समकालीन कविता "स्वतंत्रता के शेष प्रश्न" — आज़ादी के अर्थ पर एक गूढ़, विचारोत्तेजक और आत्ममंथन कराती रचना है। जब पूरा देश तिरंगे के नीचे झूम रहा है, कुछ सवाल अब भी हवा में तैर रहे हैं...
यह वीडियो स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर, भारत की आज़ादी की वर्तमान व्याख्या को लेकर एक भावपूर्ण प्रस्तुति है।
पूरी कविता ज़रूर सुनिए — शायद इन सवालों में कहीं आपका भी एक सवाल छुपा हो।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 13, 2025
हिंदी कविता
0
बरसात की एक शाम, एक बूढ़ा अपनी बीमार पत्नी को लिए डॉक्टर के क्लिनिक के बाहर खड़ा है। डॉक्टर छतरी देता है, पर बूढ़े की आँखों की बारिश नहीं रुकती। यह कविता सामाजिक विषमता, करुणा और आत्मचिंतन की सघन अनुभूति कराती है।