होड़ से परे फकीरी में ठहरा मन

Dr Shailesh Shukla Feb 11, 2026 हिंदी कविता 1

यह कविता आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ से उपजी थकान, आंतरिक रिक्तता और आत्मचिंतन की आवश्यकता को कोमल लेकिन गहरे दार्शनिक स्वर में व्यक्त करती है। यश, धन और शक्ति की आकांक्षाओं से मुक्त होकर शांति, प्रेम और करुणा को जीवन का वास्तविक सौभाग्य बताया गया है। मीरा, राम और वैराग्य के प्रतीकों के माध्यम से यह रचना विकास और शांति के संतुलन पर प्रश्न उठाती है और पाठक को ठहरकर अपने भीतर झाँकने का अवसर देती है।

बीबी कहां छिटक गई-कविता रचना

Ram Kumar Joshi Feb 11, 2026 हिंदी कविता 2

यह कविता महानगर दिल्ली की चकाचौंध, अव्यवस्था और आम आदमी की असहजता पर तीखा, लेकिन हल्का-फुल्का व्यंग्य है। ‘बीबी कहाँ छिटक गई’ सिर्फ़ एक व्यक्ति के खोने की बात नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की स्थिति का रूपक है, जो महानगरीय भीड़, जेबकतरी, शोर और भ्रम में स्वयं को खो बैठता है। हाथी की पूँछ और हिलती डोर जैसी प्रतीकात्मक पंक्तियाँ सत्ता, व्यवस्था और भ्रमजाल पर करारा कटाक्ष करती हैं। कविता सरल भाषा में शहरों की जटिल सच्चाई उजागर करती है।

मेरा देश आगे बढ़ रहा है-kavita

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 6, 2026 हिंदी कविता 0

“रास्ते मिल गए हैं, पर मंज़िल गुम हो गई है कहीं।” “हम आगे इसलिए नहीं बढ़े कि सबको साथ ले जाएँ, बल्कि इसलिए कि पीछे छूटे लोग दिखाई न दें।” “वे लोकतंत्र के पहियों तले कुचले गए— लेकिन ट्रैफिक नहीं रुका।”

हुक्का-गीत

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 1, 2026 हिंदी कविता 0

हुक्का सिर्फ़ धुआँ नहीं छोड़ता, वह सदियों की जाति उगलता है। उसकी चिलम में तंबाकू नहीं, इतिहास सुलगता है। जिसका हुक्का, उसकी हवा— बाक़ी सब अपराधी साँसें। यह गीत लोक का नहीं, जन्म से थोपे गए पहचान का है।

मेरी हिन्दी -डा राम कुमार जोशी

Ram Kumar Joshi Jan 11, 2026 हिंदी कविता 2

“हिन्दी में बिन्दी की महत्ता, ज्यों खोजे गहराती है।” “तुलसी मीरा सूर कबीरा, अलख जगाई हिन्दी की।” “राजभाषा भले कहे हम, दोयम दर्जा थोप दिया।” “अभिमान करें अपनी थाती का, स्वभाषा का सम्मान करें।”

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 10, 2026 Poems 0

यह रचना हिंदी को “राजभाषा” के तमगे से बाहर निकालकर दफ़्तर, घर, गली और मनुष्य के बीच खड़ी दीवार पर सवाल करती है— क्या भाषा सिर्फ़ एक दिन का उत्सव है या रोज़ की साँस?

हवाओं से जंग और अज़्म की जीत

Shakoor Anvar Jan 8, 2026 गजल 0

तेज़ हवाओं और उग्र लहरों के बीच खड़ा मनुष्य जब हार मानने को होता है, तभी उसका अज़्म उसे जीवन की ओर लौटा लाता है। यह कविता द्वेष से मुक्त होकर, वफ़ा के सागर में एक नए जीवन-निज़ाम की कल्पना करती है।

हाथी का शोर और डोर की कविता

Ram Kumar Joshi Jan 5, 2026 हिंदी कविता 1

सम्मान, पुरस्कार और नोटों की थैलियों से सजे कवि सम्मेलन, जहाँ कविता की तलाश में गए श्रोता मसखरी लेकर लौटे। यह व्यंग्य उन बड़े नामों पर है, जिनकी आवाज़ भारी है और अर्थ हल्का।

अलविदा पच्चीस!-kavita-dr mueksh

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 31, 2025 हिंदी कविता 0

वर्ष पच्चीस एक ही नहीं था—वह हर व्यक्ति के लिए अलग निकला। कहीं हँसी थी, कहीं आँसू; कहीं खजाना भरा, कहीं खाली हाथ। यह कविता समय की उसी भीड़ को दर्ज करती है जहाँ हर जीवन अपना-सा सच लेकर चलता है।