हाथी का शोर और डोर की कविता

ख्वाहिश थी दिल में कि, कवियों को सुनेंगे
रात भर जाग कर कुछ हासिल  करेंगे
कवियों को बुलाया हमने बड़े सम्मान से
नोटों भरी थैलियां सौंपी, बड़े मान से,
चुटकुलों को सुनकर चोट कुछ ऐसी लगी
राष्ट्र कवियों के रुप में मसखरों से भेंट थी।
नाम था जितना बड़ा, खोखली जमीन थी
बहुत शोर सुनते थे हाथी की पूंछ का
निकट आके देखा तो डोर हिल रही थी

Ram Kumar Joshi

Ram Kumar Joshi

डा राम कुमार जोशी ललित कुंज, जोशी प्रोल सरदार पटेल…

डा राम कुमार जोशी ललित कुंज, जोशी प्रोल सरदार पटेल मार्ग, बाड़मेर (राज) [email protected]

Comments ( 1)

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डॉ मुकेश 'असीमित'

2 months ago

यह रचना आज के कवि–सम्मेलनी यथार्थ पर तीखा लेकिन सुरुचिपूर्ण व्यंग्य है। बड़े नामों, भारी शोर और नोटों की थैलियों के पीछे छिपी साहित्यिक खोखलेपन की सच्चाई को यह कविता बिना शोर किए उजागर कर देती है। “हाथी की पूँछ” और “डोर” का बिंब पूरी रचना को अर्थपूर्ण कटाक्ष में बदल देता है। मुस्कराते हुए चुभने वाला यह व्यंग्य देर तक याद रहता है।