कागजों में मरण
डा राम कुमार जोशी
छगने की मौत हो गई, नाम तो छगन लाल था पर गांव में सभी परंपरानुसार छगना ही बुलाते थे। बड़ा और पूरा नाम तो गांव के ठाकुर साहब का बोला जाता है या फिर कलेक्ट्री से आये अफसर – बाबू का नाम, इन दोनों के सिवाय गांव में और कोई आदर का अधिकारी ही नहीं होता है।
हां – गांव पटवारी जी सबसे बड़े है। पता नहीं सब कोई क्यों कहते हैं- उपर करतार और नीचे पटवार। एकबार तो गांव एक बुढ़िया ने सरकार में कलेक्टर से भी बड़े अफसर को आशीर्वाद स्वरूप कहा भी था कि बस अबे तो थे अठे(यहां) पटवारी बण जाओ। पूरों गांव निहाल हो जाई। कमाई ही कमाई है। सबने बराबर हलाल करों।
छगन लाल के बेटे पोते पढ़े-लिखे तो थे नहीं पर उन्होंने बुढ़े बाप की खूब सेवा की। सब कहते थे बेटे पोते हो तो ऐसे। किसानी मेहनत मजदूरी से कमाये दो पैसे भी डोकरे की दवा दारू पर खर्च किए। उम्र तो बढ़ानी हाथ में नहीं थी पर मौत को सहज जरुर बना दिया।
छगने के पीछे दसवां-बारहवें का क्रियाकर्म भी कर लिया। सभी को बुला-बुला कर जीमण करवाया। कर्जा तो हुआ पर हिम्मत नहीं हारी। सबको याद था कि हिम्मतें मर्दा तो मददे ख़ुदा। उसका एक छुपा कारण भी था कि छगने के पास शहर की फैक्ट्री के पास की जमीन थी वो उसी फैक्ट्री के मैनेजर साहब को बेच दी थी। उसका पैसा जो भी आया था वह छगने के नाम बैंक में जमा था। गांव का बनिया यह सब जानता था। उसने भी अनाज, कपड़े, किराणा उधार देने में कोई कमी नहीं रखी। वह भली भांति समझता है कि किसान कर्ज़े में रहेगा तभी तो फसल बेचेगा और वो भी बाजार से सस्ती। सरल सी इकानामी है।
बस यही सिद्धांत सरकारी विशेषज्ञों को यह समझ नहीं आता। किसी के माथे पर चोट हो तो सरकारी विशेषज्ञ उसके पांव में मल्हम लगाने का सुझाव देंगे। देश में ऐसी नीति ही कामयाब हैं।
सुख का समय तेजी से गुजरता है दुःख वाला ठहरा सा। छगने को मरे तीन महीने हो गये थे। बनिये का तकाजा आया तो सब चौंक पड़े। याद आया कि बैंक में रुपए पड़े हैं निकाल कर दे देंगे। जब बड़ा वाला बेटा कनिया बैंक पहुंचा और रुपए निकालने का तकाजा किया तो मृत्यु प्रमाणपत्र की ताकीद की गयी। साथ में वारिसान सर्टिफिकेट।
बैंक बाबू बोला – हमें पता है कि तुम चार भाई और तीन बहनें हों पहले सातों में पैसा बंटेगा। फिर एक-एक कर के पैसा उठा सकेंगे।
एकबारगी बेचारे कनिये के पांवों के नीचे की जमीन खिसक गई। अब क्या होगा? पिता का मृत्यु प्रमाणपत्र कौन देगा। ये भी तो मालूम नहीं। छगने के मरण पीछे जीम के तो सब गये पर ये लफड़ा किसी ने भी बताया तक नहीं था। मालूम होता तो बड़ा खर्च करते ही नहीं।
कनिये के साथ आये गबरु छोरे ने बाबूजी की झटक के काॅलर पकड़ ली और जोर से बोल पड़ा कि मेरे दादा का पैसा है उधार नहीं मांग रहे हैं चू,,,, हमारे खुद के है। देगा कैसे नहीं? जूत पड़ेंगे तो ,,,,,,,,,,,,,,। बैंक में नौकरी भूला दूंगा भों….। साथ में मां बहन की गालीया अर्पित कर दी।
बड़ी मुश्किल से सबने मिलकर बैंक बाबू को छुड़वाया, नहीं तो उस दिन अच्छा ठुक जाता। पिलपिले शहरी बाबू पर गांव वाले गबरु का भारी हाथ कहीं भारी हो जाता तो गज़ब हो जाता। उम्र भर चक्की पीसने का मामला बन चुका होता। सभी ने मिलकर बचा लिया।
गांव बाबू से संपर्क किया तो पता चला कि महीने के भीतर तक तो गांव बाबू मृत्यु प्रमाणपत्र दे सकते थे। अब तो तीन महीने देरी वाला जिले वाले ही दे सकते हैं। वहां जाना होगा।
गांव बाबू को अच्छा जिमाया था सो उसने फ़ार्म फोटो सब तैयार करके दे दिये थे और जाते जाते कान में फुंकनी भी ठोक दी।
अगले दिन गले में सफ़ेद गमछा व सिर पर सफेद पगड़ी बांध कनिया शहर की ओर चल पड़ा। कलेक्ट्री में घुस तो गया पर किसके पास जावें कि बाप का फौत सर्टिफिकेट मिलें, ये ढूंढना होगा।
मुख्य दरवाजे के भीतर घुसते ही चपरास बांधे दरबान ने रोक दिया – ऐ भाई कहां जा रहा है। अफसर से टाइम लिया है या वैसे ही घुसा जा रहा है। बता?
कनिये ने सारी बात बताई- बाप मरा है। सो कागज़ लेने आया हूं कि जिसमें लिखा हो कि मेरा बाप छगन मरा हैं। आपजी सहायता करों।
दरबान – तेरा बाप मरा है तो मुझे क्या!
कनिया तुरंत समझ गया,हाथ पोला तो जगत गोला। जेब से दस रुपये के नोट की सम्भाल दे दी। कहा कि और दे दूंगा चिंता मत करना। काम होना चाहिए।
दरबान – दस रुपए में चाय भी नहीं आती, पहले दे, फिर काम बता, यही सरकारी नियम है। बाबू जी पहले यही पूछेंगे, क्या मिला। उपर तक सबको देना होता है। चल बताता हूं। बीच रास्ते एक और दस का नोट झड़प ही लिया।
दरबान आगे और कनिया पीछे। तेज़ तेज़ चलते गलियारों से गुजरते, सीढ़ियों से उपर नीचे होते हुए एक बड़े हाल के एक कोने में बैठे एक बाबूजी के सामने खड़ा कर दिया।
कनिया – मैरो बाप तीन महीनों पैले फौत हो गयों सो लिखीत में दे दो ,बैंक वालों मांग रियो है।
बाबूजी – मैं कौन सो तेरो बाप मारियो है जो लिखीत में दे दूं। म्हैं तो किसी को जानूं ना। पहले तेरी मेरी पहचान बना, फिर बात करेंगे।
दरबान ने इशारा कर दिया तो कनिये ने पचास के नोट के साथ गांव से लाए कागज टेबल पर सरका दिये।
“इत्ते से क्या हो, पहले तो गवाहन के सामने उस तारीख को मरा दिखावेंगे। तब सर्टिफिकेट बनेगो। बैंक में कित्तो पैसों जमा है वाके अनुसार खरचा होउगो। ऐसे ना बने। आदमी को जिंदा बताना सरल हैं पर मरा दिखाना यमराज का काम है, बड़ों मुश्किल से आदमी मरें है। देख लो। बैंक में जमा रकम बैंक के चूहे कुतर लेंगे पर तुझे नहीं मिलेगी।” बाबूजी ने बड़े शान्त भाव से देशी भाषा में समझा दिया।
ये सब सुनते ही कनिया के चेहरे पर मौजूद मुस्कान ग़ायब हो गई और घबराहट के भाव छा गये। पर फिर पिता छगन को याद कर जोर से बिसूरते हुए बोला – हे बापू, तेरों मरने से तो बड़ों मुश्किल होरियो है। अब तो तू बापस ही आजा। बिन पईसा ये बाबूजी तने कागजों में मारेंगे नहीं और तबतक मैं तो यहां से जाऊं नहीं। मेरे घर से तू मर गया पर बाबूजी के फाइल में तू नहीं मरा। ये कैसों कानून वालों सरकार है।
ये कहते हुए पहले सफेद गमछा फर्श पर फेंका और कनिया वहीं फर्श पर बैठ गया और बुक्का फाड़ रोने लग गया।
रोने की आवाज सुन सारा आफिस स्टाफ इकट्ठा हो गया और तरह तरह की बातें बनने लग गयी। साथ आया चपरास वाला दरबान भाग ही रहा था कि लोगों को सुनाई दिया – “मेरों बीस रुपिया लेके जा रिया है।” कनिया रोते हुए सबको बोल रहा था- बाबूजी तुमको को पचास दे दिया, कोई भूले ना। हे बापू! तू क्यूं मरा?अब एकबार कागज पे मर जा रे। हाय हाय।
इतने कोई अखबार वाला भी टपक पड़ा। कनिये के गले का सफ़ेद गमछा ज़मीन पर बिछा व सिर पर सफेद पगड़ी देख समझ गया कि माजरा क्या है! विभाग का नाम भी जनम मृत्यु दर्ज विभाग है। ज्यों ज्यों कनिया रोते बोलता जाता, कहानी स्पष्ट होती गयी।
वह तुरंत गांव से आये पीड़ित कनिये की ओर हो लिया और बाबूजी को हड़काने लग गया। ताकि बहती नदियां से वह भी कुछ ले पड़े। मोबाइल निकाल रिकार्ड की सारी तैयारी कर ली गयी।
सबके भाग्य अच्छे थे सो इतने में विभाग का अफसर भी आ गया। बात सबकुछ साफ थी। उन्होंने भांप लिया कि बाजी हाथ से गर निकल गयी तो बदनामी के साथ ट्रांसफर वाला विदाई समारोह भी आयोजित हो सकता है।
तुरंत आगे बढ़ सबसे पहले कनिये को पानी का गिलास आफर कर बाबूजी के लिए मौखिक सस्पेंशन के आदेश जारी किये और सभी कागजों को अपने कब्जे में लेकर कनिये को पचास रुपये वापस दिये। सबको अपनी सीट पर जाने का हुक्म जारी करने के बाद कनिये को अपने कक्ष में बिठा चाय के साथ कचोड़ी भी खिलाई और विनय पूर्वक कहा – “किसान भाई, जो हुआ उसे भूल जाना और अखबार वालों को कुछ भी मत बताना। उस बाबू के घर मां- बाप बीमार पड़ें है। कहीं नौकरी से निकाल दिया तो तेरे को उसके बीबी बच्चों की हाय लगेगी। ऐसा काम मत करना, भगवान सब देख रहा है। अपने आप सज़ा देगा। कोयला खायें उसका मुंह काला।”
तब तक उसी बाबू ने स्व छगनलाल के नाम मृत्यु प्रमाणपत्र बना दिया जब-तक साहब ने उसे चाय पानी में उलझाए सा रखा। लीपा पोती तो करनी ही थी।
कनिया साहब के सामने बैठा गांव बाबू की दी हुईं फूंक को याद कर भीतर ही भीतर ख़ुश हो रहा था कि नाटक करना फलपत होगया तो इधर साहब भी भीतर से खुश हो रहे थे कि आज तो बाल-बाल बच गए। रुपए पैसे तो फिर कोई दे देगा। ये नहीं तो इसका बाप दूसरा आयेगा और दे जायेगा।
आखिर स्व छगनलाल के नाम से हाथों हाथ मृत्यु प्रमाणपत्र जारी हुआ और लिफाफे में रख उसे सारे स्टाफ ने मिल के कनिये को अदब के साथ दे गांव केलिए रवाना किया। इस तरह छगना कागजों में मृत घोषित हुआं।
डा राम कुमार जोशी
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डॉ मुकेश 'असीमित'
2 months ago“काग़ज़ों में मरण” एक सशक्त और करुण व्यंग्य कथा है, जहाँ मृत्यु भी सरकारी प्रक्रिया बन जाती है। यह रचना हँसाते-हँसाते व्यवस्था की उस नृशंस सच्चाई से रू-बरू कराती है, जिसमें आदमी मरने के बाद भी काग़ज़ों में ज़िंदा रहता है—जब तक रिश्वत उसे ‘मरा हुआ’ साबित न कर दे। भाषा, पात्र और स्थितियाँ इसे तीखा, विश्वसनीय और गहरे सामाजिक अर्थों से भर देती हैं।