करें कोई भरें कोई
डा राम कुमार जोशी
अब तक हुए भारतीय चुनावों में एक चुनाव जो बहुत ही प्रसिद्ध हुआ वह था 1971 का लोकसभा चुनाव। प्रसिद्धि का कारण कोई हार जीत या संख्या बल नही था, गर कारण था तो पी ए साहब का कारनामा।
तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी के एक पीए थे यशवंत शर्मा। सरकारी नौकर थे, उनके किसी विभाग से प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचने की भी कहानी है पर छोड़िये, इन महाशय ने जोश में होश खोते हुए एक मंच पर जा भाषण दे दिया और कांग्रेस आइ के लिए वोट देने की अपील करदी और विरोधीयों को मसला दे दिया। कोर्ट कचहरी से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट तक के सफर में इंदिरा गाँधी पर सरकारी अमले की सहायता का आरोप क्या सिद्ध हुआ कि आंतरिक आपातकाल से परिणीति हुई।
उस दौरान संजय गाँधी के हम दो हमारे दो वाले नारे की वजह से नकारा बूढों समेत कुंवारे जवानियों तक को नस कटवाने की कीमत चुकानी पड़ी। भाषण तो पीए ने दिया पर बाद लगीं इमरजेंसी का हरजाना बहुतों को चुकाना पड़ा। विपक्ष के नेताओं के साथ गुंडे मवाली से लेकर बहुत से लोगों को बिना किसी कोर्ट के आदेश जेलों में ठूंस दिया गया था।
22 महीनों बाद इमरजेंसी में हुये सन् 77 के लोकसभा चुनावों में हालात ये हो गये थे कि इन्दिरा माँ के साथ संजय बेटे समेत उत्तर भारत के सभी नामी गरामी कांग्रेसी नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा। एक सीट नागौर को छोड़ कर। बाद में उन्होंने भी कांग्रेस छोड़ दी थी।
मेरे हिसाब से पीए एक ऐसी जात है जिसके कर्मों को मंत्री से लेकर अफसरों तक और निरीह जनता तक को फल भोगने ही पड़ते हैं।
जोधपुर के एक पीए साहब नेहरू पार्क कांड में अपने मिनिस्टर को इतने गहरे ले डूबे जो शेष बचे जीवन में राजनीतिक सतह पर आ ही नही पाएं। बिचारे पूर्व मंत्री जी कहते भी थे कि इंदिरा जी को यशपाल ले डूबा तो मुझे मेरे पीए ने डूबो दिया।
अब नयी कहानी दिल्ली के मुख्यमंत्री के पीए साहब ने जोड़ दी। अपनी पार्टी की वरिष्ठ सदस्या को सरेआम पीट दिया। सारी घटना कैमरे में क़ैद हो गयी। परिणाम यह रहा कि पार्टी तो हारी ही, खुद मुख्यमंत्रीजी भी हार गये। जब भी दिल्ली के चुनाव का इतिहास लिखा जायेगा तो पीए साहब का उल्लेख जरूर होगा जिसमें हार का ठीकरा पीए के माथे ही रहेगा।
इसे कहते हैं “करें कोई भरे कोई”।
Ram Kumar Joshi
Jan 2, 2026
व्यंग रचनाएं
1 Comments
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डॉ मुकेश 'असीमित'
3 hours agoभारतीय लोकतंत्र के उस अदृश्य लेकिन निर्णायक पात्र—पीए संस्कृति—पर तीखा और तथ्यपूर्ण व्यंग्य है, जहाँ गलती किसी एक की होती है, पर उसकी सज़ा पूरी व्यवस्था और जनता भुगतती है। 1971 के चुनाव से लेकर आपातकाल और समकालीन राजनीतिक घटनाओं तक लेखक यह स्पष्ट करता है कि सत्ता के गलियारों में बोले गए गैर-जिम्मेदार शब्द इतिहास की दिशा मोड़ सकते हैं।
“करें कोई, भरे कोई” मुहावरा हमारे लोकतांत्रिक अनुभव का कड़वा यथार्थ बनकर उभरता है। यह लेख चेतावनी भी है और आत्ममंथन का आग्रह भी—कि सत्ता के आसपास खड़े लोगों की जवाबदेही तय किए बिना लोकतंत्र सुरक्षित नहीं रह सकता।