असम के 200 से ज्यादा ग्रामों में हाथियों के तांडव की वजह से फसल नष्ट करने से किसानों को जब खेती करना मुश्किल हो गया तो उन्होंने हाथियों के हिस्से की फसल खाने के लिए छोड़ दी और स्वयं किसान फसल को खाने का आमंत्रण देकर हाथियों को बुलाते हैं ,इससे इंसानों और हाथियों का टकराव खत्म हो गया !
यह खबर पढ़कर मॉर्निंग वाॅक के दौरान पंडित शिवनारायण जी हाथियों के लिए छोड़े गए फसल के हिस्से की चर्चा कर भोले हम इंसानों से तो जानवर अच्छे हैं जैसे कि हाथियों को फसल खाने के लिए किसान उनका स्वागत कर रहे हैं, उन्हें बुला रहे हैं ,उनके लिए रेस्तरां खोल कर फसल का एक हिस्सा हाथियों के नाम छोड़ रहे हैं । उधर हाथी के पहले कुत्ते और बिल्लियों को भी हमारे इंसान की बिरादरी कितना नवाजती है ,ये किसी से छिपा नहीं है ।अरे इंसान जीते जी तो ठीक मरने के बाद भी पाले हुए जानवरों को इज्जत बख्शता है । कुत्तों की यादों को सहजने के लिए कुत्तों के स्मारक बनाए जा रहे हैं उनकी वफादारी का गुणगान किया जा रहा है । लेकिन इंसान ऐसे प्राणी है जिनमें इंसानियत की नियत ही नहीं है और इंसान इंसान का दुश्मन बन जाता है।
इंसानों की इंसानियत का जिक्र करने पर छोटेलाल जी बोले जानवरों ने संगठित होकर ,एका कर इंसानों के सयानेपन को धता बता दी और हाथियों ने अपने 10 से हिस्से दसवंद को हथिया लिया । और हाथी को ही देखो हाथी ऐसा अजूबा प्राणी है जिसके खाने के और दिखाने के दांत अलग-अलग होते है । उसने अपने दिखाने के बड़े-बड़े दांतों को दिखा दिखा कर अपने खाने के दातों को सुरक्षित रखकर अपना खाना प्राप्त कर लिया। जब हाथी के दांतों की बात चली तो लचकराम जी बोले हमारे माननीय ने हाथियों से भले ही कुछ नहीं सीखा हो लेकिन उसके दांतों से बहुत कुछ सीख लिया। माननीयों के पास आश्वासन, प्रलोभन , रेवड़ी लोक लुभावन वादे,मिलनसारी , चमकदार मनमोहक दिखने वाले दांतों से सीख लिए जिससे उनकी आम अवाम में छवि बन गई ।उसके बाद इन दिखने वाले दांतों के माध्यम से खाने वाले दांत इतने हृष्ट पुष्ट, पुख्ता और मजबूत कर लिए कि उनके दांत सीमेंट,चारा, खेल का मैदान ,गरीबों की बस्ती, सरकारी जमीन , बिल्डिंग, तालाब, स्टाप डेम तक चबा गए और डकार भी नहीं लेते हैं।
जब जब मॉर्निंग वॉक के दौरान हाथी कुत्तों की बात चली तो प्रोफेसर रीतेश अपने पाले हुए कुत्ते को लेकर सैर करने और उसे खाली करने आ गए और बोले प्राणियों के हर वर्ग में छोटे बड़े ,ऊंचे-नीचे ,पालतू फालतू दुत्कारने वाले ,कारों में सफर करने वाले ,मेम साब की गोद में खेलने वाले ,गंदे नालों में रूदन करने वाले जानवर होते हैं । देखो ना अपना ,पैंथर ,डाॅग कितना स्मार्ट और सुरक्षित है और इसके आसपास मंडराने वाले स्ट्रीट डाॅग कैसे प्रताड़ित है, उनकी कोई पूछ परख नहीं है । जब स्ट्रीट डाॅग को पता चला कि इंसानों ने हमारे कुत्तापने को अपना लिया है तो उन्होंने इंसानों को ,बाइट ,करने की ठान ली और उनकी ,बाइट , की गूंज गली मोहल्ले तक ही नहीं सीमित रही वरन शासन प्रशासन और सुप्रीम तक पहुंच गई । उनकी भौं भौं सड़क से संसद और सुप्रीम तक गुंजायमान हो गई । उन्हें पकड़ने उन्हें नपुंसक बनाने एक स्थान से दूसरे स्थान छोड़ने के लिए विशेष दल गठित होने लगे ।सरकार के हलफनामें लगने लगे ,बावजूद इसके हम सब कुत्तों ने यह ठान रखी है कि जब इंसान अपनी नियत बदलकर जब तक इंसानियत के रास्ते नहीं आएगा तब तक हम उन्हें रेबीज के लिए भटकाते रहेंगे ।बाइट देने वालों की तरह बाइट करते रहेंगे ! इस पर नरेंद्र स्वामी जी बोले कहां हाथी की बात चल रही थी कि कुत्ते बिल्ली चर्चा में शामिल कर लिए अरे हमारे समाज में हाथी कौन पालते हैं ,विशेष कर सफेद हाथी तो कोई नहीं पालता है ।सफेद हाथी के सफेद दांत अच्छे-अच्छे को पसीना ला देते हैं इसलिए सफेद हाथी पालने से लोग कतराते हैं और हाथी हाथी होते हैं जब भी हाथी बाजार में चलते हैं तो हजार कुत्ते उन पर भोंकते हैं और हाथी को उनके भौंकने का कोई असर नहीं होता है! लेकिन स्ट्रीट डॉग के भौंकने पर हर कोई भपकता है ,बहकता है , डरता है लेकिन जो डाॅग स्ट्रीट से बंगलों में चले गए हैं उनके लिए लोग कहते हैं कुत्ते पाल लो, मुगालते पाल लो लेकिन सफेद हाथी मत पालो !
हाथी कुत्तों को संगठित होने और सफलता पाने से दुनिया के अन्य जानवरों ने भी एक हो जाने की मुहिम छेड़ी ।घोड़ा रोज़ रोज़ हरी फसलों को रौंद रहे हैं वह भी फसल का हिस्सा मांग रहे हैं । उधर बंदर की टोलिया भी जंगल से बस्ती में आ गई है ,वे सड़कों पर दौड़ लगाने लगे है ।बंदरों से बचने के लिए उन्हें कोई बिस्कुट खिलाने के लिए ,तो कोई पीछा छुड़ाने को मजबूर हो रहा है। हाथियों के लिए खेतों में जब रेस्तरां खुलने की भनक अन्य जानवरों को लगी तो घोड़ा रोज़, बंदर ,कुत्ते ,सूअर ,मुर्गे, कबूतर तोते भी अपने-अपने हिस्से की मांग के लिए झुंड बनाकर, संगठित होकर एकत्रित हो गए और अपने- अपने मर्तबे की छाप छोड कर उदरपूर्ति के हक के लिए अपना हिस्सा और अपने मान सम्मान की मांग पर आमादा हो गए है !
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Comments ( 1)
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डॉ मुकेश 'असीमित'
2 hours agoयह व्यंग्य लेख समकालीन समाज और राजनीति की विकृत मानसिकता पर तीखा, परंतु रोचक प्रहार करता है। हाथी, कुत्ते और अन्य पशुओं के प्रतीकों के माध्यम से लेखक ने सत्ता, स्वार्थ और दोहरे मानदंडों को जिस चतुराई से उजागर किया है, वह पाठक को हँसाते हुए गहरी सोच में डाल देता है। भाषा में प्रवाह, कथ्य में व्यंग्य और प्रतीकों की सटीकता इस रचना को प्रभावशाली और स्मरणीय बनाती है।