Prem Chand Dwitiya
Apr 28, 2026
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यह व्यंग्य चुनावी तोहफों और फ्रीबीज राजनीति की उस विडंबना को उजागर करता है, जहाँ वादों की फेहरिस्त से जन्मे तोहफे मतदाताओं को लुभाते हैं और लोकतंत्र को एक अलग ही दिशा में ले जाते हैं।
Prem Chand Dwitiya
Apr 15, 2026
व्यंग रचनाएं
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भारतीय समाज में लाइन में लगना एक कला बन चुकी है—गैस सिलेंडर से लेकर ऑनलाइन बुकिंग तक। पढ़िए एक रोचक और तीखा व्यंग्य “लाइन में खड़े रहने का हुनर”।
Prem Chand Dwitiya
Apr 8, 2026
व्यंग रचनाएं
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रंग बदलने के पुराने उस्ताद गिरगिट भी आजकल इंसानों की रंगबाज़ी से हैरान हैं।
सुरक्षा के लिए रंग बदलने वाले जीव अब अपनी साख बचाने की बैठक कर रहे हैं।
व्यंग्य यह है कि बदनाम गिरगिट हैं, मगर रंग बदलने की असली महारत इंसानों ने हासिल कर ली है।
Prem Chand Dwitiya
Mar 29, 2026
व्यंग रचनाएं
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वैश्विक युद्ध की चिंगारी जब चूल्हे तक पहुँची, तो गैस सिलेंडर अचानक ‘राम रतन धन’ बन गया—और आम आदमी लाइन, लाचारी और व्यंग्य के बीच झूलता रह गया।
Prem Chand Dwitiya
Mar 16, 2026
व्यंग रचनाएं
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आज के सार्वजनिक जीवन में संवेदना भी एक सार्वजनिक प्रदर्शन बन गई है। किसी की पीड़ा कम हो या न हो, पर फोटो, पोस्ट और लाइक-शेयर की दुनिया में संवेदना का बाजार खूब गर्म है। यह व्यंग्य उसी विडंबना को पकड़ता है जहाँ असली वेदना से ज्यादा महत्व संवेदना की तस्वीरों को मिल जाता है।
Prem Chand Dwitiya
Mar 8, 2026
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कस्बे के अज्ञान चबूतरे पर जमा हुई यह होली की टोली केवल रंग-गुलाल का उत्सव नहीं, बल्कि ढलती उम्र के अकेलेपन, अनुभव और हास्य का संगम है। सेवानिवृत्त अधिकारी, प्रोफेसर, पंडित और पुराने मित्र — सब मिलकर होली के बहाने जीवन की त्रासदियों को ठिठोली में बदल देते हैं।
Prem Chand Dwitiya
Feb 24, 2026
व्यंग रचनाएं
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कभी पटिए पर बैठकर शहर की राजनीति, समाज और संस्कार तय होते थे; अब वही चर्चाएँ व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम की स्क्रीन पर सिमट गई हैं। पटिया संस्कृति का यह पटाक्षेप समय की विडंबना है।
Prem Chand Dwitiya
Feb 4, 2026
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पद्म पुरस्कारों की सूची ने एक बार फिर साबित किया कि नाम पहले नहीं, काम पहले आता है। जो लोग जिंदगी भर गुमनाम रहकर समाज की सफाई, शिक्षा, पर्यावरण और संवेदना की नींव मजबूत करते रहे—वही एक दिन नाम बन गए। असल में नाम कोई पदक नहीं, वह गुमनामी से निकलकर कर्मों की पहचान बन जाता है।
Prem Chand Dwitiya
Jan 20, 2026
व्यंग रचनाएं
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“कुत्ते पाल लो, मुगालते पाल लो—
लेकिन सफेद हाथी मत पालो,
उसके दाँत अच्छे-अच्छों को पसीना ला देते हैं।”
Prem Chand Dwitiya
Jan 8, 2026
व्यंग रचनाएं
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सोशल मीडिया पर बैन की ख़बर ने किशोरों को सिर्फ़ चिंतित नहीं किया, उन्हें किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया।
जहाँ किशोर अपनी डिजिटल पहचान के छिनने से डर रहे हैं, वहीं बुज़ुर्ग पीढ़ी उसी स्मार्टफोन में गुम है, जिस पर प्रतिबंध की बात हो रही है।
यह कहानी केवल मोबाइल की नहीं, बल्कि पीढ़ियों के दोहरे चरित्र और डिजिटल नैतिकता की है।