राष्ट्रीय सुरक्षा और एआई: साइबर युद्ध का नया दौर
समय की सरगम में जब तकनीक तरंगित त्वरितता के साथ तैरती है, तब सुरक्षा की संरचना भी सतत
सावधानी की साधना बन जाती है। आज का युग केवल सीमाओं, सैनिकों और शस्त्रों का नहीं, बल्कि सर्वर,
सॉफ्टवेयर और साइबर स्पेस का युग है। कृत्रिम मेधा ने युद्ध की व्याख्या को विस्तारित करते हुए एक ऐसे
नए दौर का उद्घाटन किया है, जहाँ संघर्ष बंदूकों से नहीं, बल्कि बाइट्स और एल्गोरिद्म से संचालित हो
रहा है। यह नया दौर ‘साइबर युद्ध’ का है, जिसमें राष्ट्रों की सुरक्षा अब केवल भौतिक सीमाओं पर निर्भर
नहीं, बल्कि डिजिटल ढाँचों की दृढ़ता पर आधारित हो गई है।
यदि इस परिवर्तन को प्रमाणिक तथ्यों के आधार पर समझें तो स्पष्ट होता है कि एआई ने साइबर खतरों
की प्रकृति, गति और गहराई—तीनों को बदल दिया है। वर्ष 2025 में भारत में साइबर घटनाओं की संख्या
29.44 लाख से अधिक दर्ज की गई, जैसा कि भारतीय कंप्यूटर आपात प्रतिक्रिया दल के आधिकारिक
विवरण में उल्लेखित है, जो यह दर्शाता है कि डिजिटल हमले अब अपवाद नहीं, बल्कि निरंतरता बन चुके
हैं। यह संख्या केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा का केंद्र अब साइबर स्पेस
की ओर स्थानांतरित हो रहा है।
कृत्रिम मेधा के प्रवेश ने साइबर युद्ध को और अधिक जटिल बना दिया है। वैश्विक विश्लेषणों के अनुसार
वर्ष 2025 में एआई-सक्षम साइबर हमलों में लगभग 47 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, और लगभग 87
प्रतिशत संगठनों ने यह स्वीकार किया कि वे किसी न किसी रूप में एआई-आधारित हमलों का सामना कर
चुके हैं। यह वृद्धि केवल संख्या में नहीं, बल्कि हमलों की गुणवत्ता और रणनीति में भी परिलक्षित होती है।
अब हमलावर मशीन लर्निंग एल्गोरिद्म का उपयोग करके सुरक्षा प्रणालियों की कमजोरियों को तेजी से
पहचानते हैं और उन पर सटीक आक्रमण करते हैं।
भारत के संदर्भ में स्थिति और भी गंभीर है। विभिन्न साइबर सुरक्षा रिपोर्टों में यह पाया गया है कि वर्ष
2025 में भारत में औसतन प्रति संगठन प्रति सप्ताह 3000 से अधिक साइबर हमले दर्ज किए गए, जो
वैश्विक औसत से कहीं अधिक है। इसके अतिरिक्त, एक अन्य विश्लेषण में यह उल्लेख किया गया है कि
भारत के संगठनों को प्रति सप्ताह लगभग 2000 से अधिक हमलों का सामना करना पड़ा, जिससे यह स्पष्ट
होता है कि भारत विश्व के सबसे अधिक लक्षित देशों में शामिल है।
साइबर युद्ध की इस नई संरचना में एआई ने हमलों को न केवल तीव्र, बल्कि अधिक सटीक और
स्वचालित बना दिया है। उदाहरण के लिए, फिशिंग हमलों में एआई का उपयोग अत्यधिक बढ़ गया है, और
अनुमान है कि लगभग 80 प्रतिशत फिशिंग हमले अब एआई आधारित तकनीकों से तैयार किए जा रहे हैं।
इससे हमलावरों को व्यक्तिगत स्तर पर लक्षित हमले करने में आसानी होती है, जिससे उनकी सफलता की
संभावना बढ़ जाती है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि अब हमले केवल वित्तीय या
व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे महत्वपूर्ण अवसंरचनाओं को भी लक्ष्य बना रहे हैं। वर्ष
2025 में भारत की ऊर्जा प्रणाली और सरकारी वेबसाइटों पर बड़े पैमाने पर वितरित सेवा बाधा (डीडीओएस)
हमले दर्ज किए गए, जिनमें हजारों प्रयासों के माध्यम से सिस्टम को बाधित करने का प्रयास किया गया।
यह संकेत देता है कि साइबर युद्ध अब केवल डेटा चोरी तक सीमित नहीं, बल्कि यह राष्ट्रीय सेवाओं को
बाधित करने का माध्यम भी बन रहा है।
एआई के कारण साइबर हमलों की गति भी अभूतपूर्व हो गई है। वैश्विक सुरक्षा रिपोर्टों में यह उल्लेख किया
गया है कि वर्ष 2025 में साइबर हमलों का औसत ‘ब्रेकआउट समय’ घटकर लगभग 29 मिनट रह गया, जो
पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम है। इसका अर्थ यह है कि हमलावर अब कुछ ही मिनटों में सिस्टम में
प्रवेश कर सकते हैं और व्यापक नुकसान पहुँचा सकते हैं। यह तीव्रता पारंपरिक सुरक्षा प्रणालियों के लिए
एक बड़ी चुनौती बन गई है।
साइबर युद्ध का एक और गंभीर पहलू है डीपफेक और डिजिटल दुष्प्रचार। एआई के माध्यम से नकली
वीडियो, ऑडियो और संदेश तैयार करके समाज में भ्रम और अविश्वास फैलाया जा सकता है। वर्ष 2026 की
एक रिपोर्ट में यह पाया गया कि भारत की लगभग 65 प्रतिशत कंपनियों को एआई-आधारित डीपफेक
हमलों का सामना करना पड़ा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह खतरा केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित
नहीं, बल्कि संस्थागत स्तर पर भी प्रभाव डाल रहा है।
आर्थिक दृष्टि से भी साइबर युद्ध का प्रभाव अत्यंत गंभीर है। वर्ष 2025 में भारत में साइबर धोखाधड़ी से
होने वाला नुकसान 36,000 करोड़ रुपये से अधिक दर्ज किया गया, जैसा कि विभिन्न साइबर सुरक्षा
विश्लेषणों में उल्लेखित है। यह आँकड़ा इस बात का प्रमाण है कि साइबर हमले अब केवल तकनीकी
समस्या नहीं, बल्कि आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी प्रश्न बन चुके हैं।
कृत्रिम मेधा ने हमलावरों के साथ-साथ रक्षात्मक तंत्र को भी सशक्त किया है। एआई आधारित सुरक्षा
प्रणालियाँ अब असामान्य गतिविधियों की पहचान करने, संभावित खतरों का पूर्वानुमान लगाने और
स्वचालित प्रतिक्रिया देने में सक्षम हैं। भारत में एआई आधारित साइबर सुरक्षा बाजार का मूल्य 2024 में
लगभग 1.18 अरब डॉलर था और यह 2030 तक कई गुना बढ़ने का अनुमान है, जो इस क्षेत्र में बढ़ते निवेश
और महत्व को दर्शाता है।
इसके बावजूद एक महत्वपूर्ण चुनौती ‘एआई सुरक्षा अंतर’ की है। आईबीएम की वर्ष 2025 की रिपोर्ट में यह
उल्लेख किया गया है कि एआई का उपयोग सुरक्षा से अधिक तेजी से बढ़ रहा है, जिससे ऐसे सिस्टम
विकसित हो रहे हैं जिनमें पर्याप्त सुरक्षा प्रबंधन नहीं है और वे अधिक जोखिमग्रस्त हैं। यह स्थिति राष्ट्रीय
सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा उत्पन्न करती है, क्योंकि अनियंत्रित एआई प्रणाली स्वयं ही साइबर हमलों
का लक्ष्य बन सकती है।
साइबर युद्ध के इस नए दौर में ‘राज्य प्रायोजित हमले’ भी तेजी से बढ़ रहे हैं। विभिन्न वैश्विक रिपोर्टों में
यह पाया गया है कि कई देश अब एआई का उपयोग अपने रणनीतिक हितों की रक्षा और विस्तार के लिए
कर रहे हैं। इससे साइबर स्पेस में प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही है, जिसे ‘एआई आर्म्स
रेस’ कहा जा रहा है।
भारत के लिए इस स्थिति का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि देश तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था
की ओर बढ़ रहा है। वर्ष 2025 तक भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 100 करोड़ के पार पहुँच चुकी
है, जिससे डिजिटल प्लेटफार्मों का उपयोग अत्यधिक बढ़ गया है। यह विस्तार अवसरों के साथ-साथ
जोखिमों को भी बढ़ाता है।
सरकार ने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। साइबर सुरक्षा के लिए बजट आवंटन, साइबर
हेल्पलाइन 1930, और लाखों संदिग्ध सिम कार्डों का निष्क्रियकरण जैसे उपाय इस बात का संकेत हैं कि
राष्ट्रीय स्तर पर इस चुनौती को गंभीरता से लिया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, साइबर सुरक्षा ऑडिट और
प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।
निष्कर्षतः यह स्पष्ट है कि एआई ने साइबर युद्ध को एक नए युग में प्रवेश कराया है, जहाँ संघर्ष अदृश्य,
आक्रमण अदृश्य और परिणाम अत्यंत वास्तविक होते हैं। यह युद्ध सीमाओं से परे, समय से परे और
पारंपरिक परिभाषाओं से परे है। इसमें जीत केवल शक्ति से नहीं, बल्कि रणनीति, सतर्कता और समन्वय
से निर्धारित होगी।
समय की सशक्त सीख यही है कि तकनीक का तटस्थ रहना संभव नहीं, उसका प्रभाव उसके उपयोग पर
निर्भर करता है। यदि एआई को सुरक्षा के साधन के रूप में विकसित किया जाए, तो यह राष्ट्रों को सुरक्षित
और सशक्त बना सकता है। परंतु यदि इसे अनियंत्रित और अनैतिक रूप से उपयोग किया गया, तो यह
वैश्विक अस्थिरता का कारण बन सकता है।
अतः आवश्यक है कि हम इस नए साइबर युग में संतुलन, सजगता और सहयोग के साथ आगे बढ़ें। राष्ट्रीय
सुरक्षा अब केवल सीमाओं की रक्षा नहीं, बल्कि साइबर स्पेस की संरक्षा का भी प्रश्न है। यही समझ भविष्य
के सुरक्षित, सक्षम और सशक्त राष्ट्र की आधारशिला बनेगी।
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