Ram Kumar Joshi
Jan 2, 2026
व्यंग रचनाएं
1
1971 का चुनाव हार-जीत से नहीं, एक पीए के भाषण से इतिहास बन गया।
सत्ता के गलियारों में बोले गए शब्द, जनता ने जेलों में गिने।
आपातकाल की कीमत उन लोगों ने चुकाई, जिनका भाषण से कोई लेना-देना नहीं था।
दिल्ली से नागौर तक—हर चुनाव में कोई न कोई पीए इतिहास लिख ही देता है।
लोकतंत्र में कई बार कर्म किसी के होते हैं, फल किसी और को भुगतने पड़ते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 1, 2026
India Story
0
नया साल कोई तारीख नहीं, भीतर की एक हल्की-सी हलचल है।
उत्सव का सवाल नहीं, चेतना का सवाल है।
जो छूट गया, वही नया है; जो थाम लिया, वही बोझ।
कैलेंडर बदलते रहते हैं, साल तभी बदलता है जब दृष्टि बदलती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 31, 2025
हिंदी कविता
0
वर्ष पच्चीस एक ही नहीं था—वह हर व्यक्ति के लिए अलग निकला।
कहीं हँसी थी, कहीं आँसू;
कहीं खजाना भरा, कहीं खाली हाथ।
यह कविता समय की उसी भीड़ को दर्ज करती है
जहाँ हर जीवन अपना-सा सच लेकर चलता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 30, 2025
Cinema Review
0
“स्कारलेट भूख से लड़ती है, राधा भूख को सहकर मूल्य बचाती है।”
“एक स्त्री स्वयं को बचाने के लिए समाज से टकराती है, दूसरी समाज को बचाने के लिए स्वयं से।”
“स्कारलेट की जिद निजी है, राधा की दृढ़ता सामूहिक।”
“दोनों हारती नहीं हैं, पर जीत की उनकी परिभाषा अलग है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 30, 2025
Lifestyle
0
हम बच्चे के हाथ में खिलौना नहीं, भविष्य थमा देते हैं।”
“शरारत दोष नहीं, जीवन की पहली प्रयोगशाला है।”
“थोपे गए संस्कार अनुशासन पैदा करते हैं, चेतना नहीं।”
“गलती न करने का अभिनय, गलती करने से ज़्यादा अनैतिक है।”
“जिस बचपन में शरारत मर जाती है, उस जीवन में साहस कभी जन्म नहीं लेता।”
Pawan Ghumara
Dec 29, 2025
Blogs
0
“बीच में है नौकरशाही — जो पुल नहीं, दीवार बन चुकी है।”
“फ़ाइलों और कानूनों की दुनिया में ‘संवेदना’ को ‘अपवाद’ मान लिया गया है।”
“लोकतंत्र का सौंदर्य उसकी करुणा में है, उसकी कठोरता में नहीं।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 29, 2025
Cinema Review
0
राजेश खन्ना पहले सुपरस्टार नहीं थे, वे उस दौर का नाम थे जब सिनेमा पूजा बन गया था।
तालियाँ जब बहुत देर तक बजती रहें, तो आदमी शोर का आदी हो जाता है और खामोशी उसे डराने लगती है।
जिसने एक बार शिखर को घर समझ लिया, वह ज़िंदगी भर मैदान को कमतर मानता रहा।
काका की मुस्कान जितनी चमकदार थी, उनके भीतर का अकेलापन उतना ही गहरा।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 29, 2025
हिंदी कविता
0
चार दीवारों के भीतर
धीरे-धीरे
गलता जीवन,
और बाहर
चमकता ताला—
संस्कार ज़िंदा थे,
बस माता-पिता नहीं रहे।
Ram Kumar Joshi
Dec 29, 2025
व्यंग रचनाएं
1
हर विदेशी—चाहे इंसान हो या बोतल—धीरे-धीरे अंदर तक मार करता है।”
“शराब बदबू नहीं, गंध कहलाती है—यह सरकारी मान्यता प्राप्त पेय पदार्थ है।”
“पुलिस थाने में संभ्रांत वर्ग की औकात बस इतनी ही होती है।”
“आम आदमी की सेवार्थ—यह पंक्ति सिर्फ़ बोर्ड पर लिखी जाती है, दिल में नहीं।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 27, 2025
India Story
0
यह साल किसी कैलेंडर की तरह नहीं बीता, बल्कि अधूरी डायरी की तरह—जहाँ स्याही कम और धड़कन ज़्यादा थी। घटनाएँ बदलीं, लेकिन उनसे ज़्यादा बदले हमारे डर, ग़ुस्सा और चुप्पियाँ।
यह साल हमें किसी नतीजे तक नहीं लाया, बल्कि सवालों की लंबी सूची सौंप गया—कि हम क्या सोचते हैं, कैसे सोचते हैं और कब चुप रहते हैं।
आतंक, युद्ध, आस्था, कॉमेडी, सोशल मीडिया—हर मोर्चे पर यह साल हमें भीतर तक झकझोरता रहा। इतिहास बनता रहा, और हम बदलते रहे।