रैपिडो युग: अब आदमी से पहले उसकी लोकेशन पहुँच जाती है
हम उस दौर में जी रहे हैं, जहाँ आदमी भले ही समय पर न पहुँचे, लेकिन उसकी लोकेशन पहले पहुँच जाती है। घर से निकलते ही पत्नी का संदेश आता है—“लाइव लोकेशन भेजो।” ऑफिस से बॉस पूछता है—“वेयर आर यू?” और जिस मित्र से मिलने जा रहे हों, वह हर दो मिनट बाद मोबाइल की स्क्रीन देखकर बताता रहता है—“तुम अभी भी वहीं खड़े हो!”
मनुष्य की विश्वसनीयता अब उसके चरित्र से नहीं, मोबाइल की नीली बिंदी से तय होती है।
इस नए युग का सबसे चमकता हुआ वाहन है—रैपिडो। यह केवल बाइक टैक्सी नहीं, बल्कि भारतीय यातायात, बेरोजगारी, जल्दबाजी और जुगाड़—इन चारों का चलता-फिरता संयुक्त उपक्रम है। पहले आदमी कहीं जाने के लिए रिक्शा ढूँढ़ता था। अब वह सड़क के किनारे खड़ा होकर मोबाइल में एक ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ता है, जिससे जीवन में कभी मिला नहीं, लेकिन पाँच मिनट बाद उसी के पीछे बैठकर अपना जीवन उसके ड्राइविंग कौशल के हवाले करने वाला है।
रैपिडो बुक करते ही स्क्रीन पर लिखा आता है—“कैप्टन तीन मिनट में पहुँच रहे हैं।”
‘कैप्टन’ शब्द पढ़कर मन गर्व से भर जाता है। लगता है जैसे नौसेना का कोई अनुभवी अधिकारी हमें लेने आ रहा हो। फिर थोड़ी देर में एक मोटरसाइकिल प्रकट होती है, जिसकी पिछली सीट पर बैठते ही समझ आता है कि हमारी यात्रा समुद्र में नहीं, ट्रैफिक के तूफान में होने वाली है।
कैप्टन फोन करता है—“सर, आपकी लोकेशन पर आ गया हूँ।”
आप चारों ओर देखते हैं। वहाँ कैप्टन तो क्या, उसकी बाइक की परछाईं भी दिखाई नहीं देती।
आप पूछते हैं—“भाई, कहाँ हो?”
वह पूरे आत्मविश्वास से कहता है—“सर, मैप जहाँ बता रहा है, वहीं हूँ।”
अब संकट यह है कि आप भी वहीं हैं, जहाँ मैप आपको बता रहा है। इस प्रकार एक ही लोकेशन पर मौजूद दो मनुष्य एक-दूसरे से आधा किलोमीटर दूर खड़े होकर मोबाइल पर चर्चा करते रहते हैं। एक कहता है—“सामने मेडिकल की दुकान है।” दूसरा कहता है—“मेरे सामने तो मिठाई की दुकान है।” आखिरकार पता चलता है कि दोनों दुकानों का नाम ‘श्री बालाजी’ है, मगर दोनों शहर के अलग-अलग कोनों में स्थित हैं।
हमारे देश में जितने बालाजी हैं, उतनी सटीकता शायद किसी डिजिटल मैप में नहीं हो सकती।
रैपिडो ने सबसे बड़ा परिवर्तन हमारे रिश्तों में किया है। पहले पति देर से घर आता था तो उसके पास कहानी बनाने का समय होता था—“बहुत ट्रैफिक था… गाड़ी खराब हो गई… रास्ते में शर्मा जी मिल गए थे।”
अब पत्नी मोबाइल पर उसकी पूरी यात्रा देख चुकी होती है।
“ट्रैफिक में फँसे थे?”
“हाँ।”
“तो फिर तुम्हारी नीली बिंदी चाय की दुकान पर बीस मिनट से क्या प्राणायाम कर रही थी?”
तकनीक ने पारिवारिक जीवन से कल्पनाशीलता लगभग समाप्त कर दी है। आदमी झूठ बोलने से पहले अपनी लोकेशन हिस्ट्री जाँचता है।
रैपिडो यात्रा भी किसी साहसिक खेल से कम नहीं। पीछे बैठते ही सबसे पहले यह निर्णय करना पड़ता है कि हाथ कहाँ रखें। बाइक के पीछे लगे हैंडल को पकड़ें तो हर गड्ढे पर लगता है कि उँगलियाँ वहीं छूट जाएँगी। कैप्टन के कंधे पर हाथ रखें तो औपचारिकता आड़े आती है। हवा में हाथ रखें तो संतुलन लोकतंत्र की तरह डगमगाने लगता है।
ऊपर से हेलमेट! यात्री वाला हेलमेट प्रायः ऐसा होता है, जिसे पहनने से पहले मन में सवाल उठता है—इसे पिछली बार किसने पहना था और वह अभी स्वस्थ है या नहीं? उसे सिर पर रखते ही अनेक अनजान यात्रियों की सामूहिक स्मृतियाँ सुगंध के रूप में आपका स्वागत करती हैं।
फिर भी हम हेलमेट पहन लेते हैं, क्योंकि जीवन प्यारा है और ट्रैफिक पुलिस उससे भी अधिक सतर्क।
कैप्टन पूछता है—“सर, जल्दी है क्या?”
यह प्रश्न मात्र औपचारिक होता है। आपने ‘हाँ’ कहा नहीं कि वह बाइक को सड़क से उठाकर संभावनाओं के आकाश में ले जाता है। वह कार, बस और ऑटो के बीच से ऐसे रास्ते निकालता है, जिन्हें सामान्य मनुष्य सड़क का हिस्सा मानता ही नहीं। जहाँ हमें दो वाहनों के बीच हवा निकलने जितनी जगह दिखाई देती है, वहाँ उसे पूरी बाइक निकलने का एक्सप्रेसवे नजर आता है।
यात्री पीछे बैठा-बैठा अपने सभी देवी-देवताओं को क्रमवार याद करने लगता है। यात्रा छोटी हो तो हनुमान चालीसा पर्याप्त है; लंबी हो तो महामृत्युंजय मंत्र भी साथ रखना चाहिए।
रैपिडो के आने से पते बताने की हमारी प्राचीन कला भी संकट में है। पहले पते बड़े आत्मीय हुआ करते थे—“पीपल के पेड़ से दाएँ मुड़ना, जहाँ पहले पान की दुकान थी, उसके सामने वाली गली में आ जाना। किसी से गुप्ता जी का मकान पूछ लेना।”
अब पता है—“लोकेशन भेज दी है।”
सामने वाला फिर भी फोन करता है—“सर, लोकेशन तो आ गई, पर आप कहाँ हैं?”
यानी आधुनिक युग ने हमें निर्देशांक दे दिए, दिशा छीन ली।
रेटिंग का दबाव भी अद्भुत है। यात्रा समाप्त होते ही ऐप पूछता है—“आपका अनुभव कैसा रहा?” अभी यात्री अपने काँपते घुटनों को स्थिर कर रहा होता है और स्क्रीन पाँच सितारे माँगने लगती है। कैप्टन विनम्रता से कहता है—“सर, फाइव स्टार कर देना।”
भारतीय संस्कार आड़े आ जाते हैं। यात्रा के दौरान तीन बार आत्मा शरीर छोड़ते-छोड़ते बची हो, फिर भी हम पाँच स्टार दे देते हैं। सोचते हैं—लड़का मेहनत कर रहा है। हमारे देश में दया और डिजिटल रेटिंग का गहरा संबंध है।
सच तो यह है कि रैपिडो ने शहर की दूरी कम की हो या न की हो, इंतजार का तरीका जरूर बदल दिया है। अब हम किसी व्यक्ति की प्रतीक्षा नहीं करते, उसकी चलती हुई बिंदी की करते हैं। वह बिंदी कभी आगे बढ़ती है, कभी गोल-गोल घूमती है और कभी एक ही स्थान पर अटक जाती है। तब लगता है मानो कैप्टन ट्रैफिक में नहीं, जीवन के किसी दार्शनिक प्रश्न में फँस गया हो।
यह सचमुच रैपिडो युग है—जहाँ आदमी बाद में मिलता है, उसका नाम, फोटो, बाइक नंबर, रेटिंग और लोकेशन पहले पहुँच जाती है। तकनीक ने हमें इतना करीब ला दिया है कि अब हर किसी को पता है हम कहाँ हैं—सिवाय उस व्यक्ति के, जो हमें लेने आ रहा है!
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