Shakoor Anvar
Mar 21, 2026
गजल
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फागुन आते ही दिल के तार अपने आप झनझना उठते हैं—
यादें रंग बनकर लौटती हैं, मोहब्बत कश्तियों की तरह पार लगती है,
और कहीं भीतर एक हल्की-सी चिंता भी सिर उठाती है—
कि ये रंग, ये रिश्ते, और ये व्यवस्थाएँ… टिकें भी रहेंगी या नहीं?
Prahalad Shrimali
Jan 9, 2026
हिंदी कविता
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कभी कच्चा केला, कभी पका आम—
बाज़ार, राजनीति और मोबाइल की आंच में
हर रिश्ता, हर मूल्य
अपना रंग बदलता हुआ मिलता है।
Pradeep Audichya
Nov 10, 2025
व्यंग रचनाएं
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भरोसीलाल ने चाय के डिस्पोज़ल कप को देखते हुए कहा — “ये चाय है चुनाव और कप है जनता, चुनाव खत्म तो जनता कचरे में!”
चुनाव के मौसम में बिजली ओवरटाइम करती है, सड़कें अचानक स्वस्थ हो जाती हैं, और नेता जनता की “कीमत” लगाते हुए मंडी में उतर आते हैं। वोट की कीमत कभी दस हज़ार, कभी तीस हज़ार, तो कभी एक साड़ी और पेय पदार्थ में तय होती है। भरोसीलाल का निष्कर्ष था — “इससे बढ़िया हाट बाजार तो कोई हो ही नहीं सकता!”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 10, 2025
व्यंग रचनाएं
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मुद्दा कोई साधारण प्राणी नहीं — यह राजनीति की चुहिया है, जिसे वक्त आने पर पिंजरे से निकालकर भीड़ में छोड़ दिया जाता है। झूठे वायदों की हवा और घोषणाओं के पानी से यह फूली-फली जाती है, और फिर चुनाव आते ही इसका खेल शुरू होता है। नेता डुगडुगी बजाते हैं, जनता तालियाँ पीटती है — और “मुद्दा” लोकतंत्र का मुख्य पात्र बनकर सबका मनोरंजन करता है।
Prahalad Shrimali
Oct 16, 2025
व्यंग रचनाएं
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दीपावली की यह व्यंग्यात्मक ‘फटूकड़ियां 2025’ केवल रोशनी का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, राजनीति, न्याय और समाज की मानसिकता पर तीखा हास्य है। लेखक प्रह्लाद श्रीमाली ने पटाखों की जगह बयानों, दीपों, और विचारों को जलाकर एक ऐसी दीपमाला रची है जिसमें नागरिक विवेक, राजनैतिक धुआं और आत्मावलोकन की झिलमिलाहट सब एक साथ चमकते हैं।
Ram Kumar Joshi
Oct 11, 2025
व्यंग रचनाएं
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"सर्किट हाउस की दीवारों में लोकतंत्र की गूँज नहीं — सिर्फ फ़ोटोग्राफ़ और आरक्षण की गंध है।"
"माला पहनी, सेल्फी ली — और गांधी टोपी मंच के कालीन में दफन। यही है हमारे सार्वजनिक उत्सव की सच्ची तस्वीर।"
"चुनाव नज़दीक हैं; इसलिए सच्चाई थोड़ी पीछे छूट जाए — पर सेल्फी तो अभी ले लो।"
डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 7, 2025
Blogs
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लोकतंत्र की गाड़ी पम-पम-पम करती आगे बढ़ रही है—टायरों में हवा नहीं, पर वादों की फुलावट है। ड्राइवर बूढ़ा है पर जीपीएस नया, जो सिर्फ उसी की सुनता है। जनता सीट बेल्ट बाँधकर सफ़र का आनंद ले रही है—मंज़िल का सपना है ‘2047 का भारत’। इंजन पुराने भाषणों से गरम है, और भोंपू झूठे वादों का गान गा रहा है।
Ram Kumar Joshi
Oct 4, 2025
हिंदी कविता
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सूरत की राजनीति में खानदानी गुरुर ने ऐसा पेंच फँसाया कि ‘बाई’ की जगह ‘राड’ निकल गया। जनसभाओं में गुणगान करते-करते सीट हाथ से निकल गई। लोकसभा में आंख मिचमिचाना भारी पड़ गया और खानदानी कुर्सी भी खिसक गई। मोहब्बत की दुकानें खोलने चले थे, मगर कुछ घर टूट गए—अब जनता भी कह रही है, “हाय देवा, हमें बचा!”
Vivek Ranjan Shreevastav
Sep 27, 2025
हिंदी लेख
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लोकतंत्र का आधार जनता का शासन है, परंतु जब जनसंख्या की संरचना बदलती है तो लोकतंत्र का संतुलन डगमगाने लगता है। भारत जैसे विविध देश में यह चुनौती और गहरी है। यदि किसी समुदाय की संख्या अत्यधिक बढ़े और अन्य हाशिये पर जाएँ, तो लोकतंत्र बहुमत का खेल बन जाता है। सच्चा लोकतंत्र तब ही सम्भव है जब अवसर, संसाधन और प्रतिनिधित्व में संतुलन कायम रहे।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 25, 2025
व्यंग रचनाएं
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"चलो बुलावा आया है… दिल्ली ने बुलाया है।
नेता, लेखक, कलाकार—सब दिल्ली की ओर ताक रहे हैं। दिल्ली एक वॉशिंग मशीन है, जहां दाग तक धुल जाते हैं। 'दिल्ली-रिटर्न' टैग लगते ही भाव बढ़ जाता है, पूँछ लग जाती है, मक्खियाँ तक डर जाती हैं। बस किसी तरह दिल्ली पहुँचना है—चाहे बुलावा आए या न आए।"