डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 18, 2025
Blogs
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दोस्ती अमृत है, मगर उधार की चिपचिपाहट इसे छाछ बना देती है। वही दोस्त जो आपकी माँ का हाल पूछता था, अचानक आपकी क्रेडिट कार्ड लिमिट साफ़ कर देता है। रिकवरी के लिए आप गुड मॉर्निंग भेजते हैं और जवाब का इंतज़ार वैसा ही करते हैं जैसे पहले क्रश के ‘हम्म्म’ का। और जब वह अंडरग्राउंड हो जाए, तो समझिए आपकी दोस्ती अब एक व्हाट्सऐप ग्रुप की भावनात्मक कर्ज़ बैठक बन चुकी है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 23, 2025
व्यंग रचनाएं
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“मैं और मेरा मोटापा – एक प्रेमकथा” में तोंद और इंसान का रिश्ता मोहब्बत जैसा दिखाया गया है। पड़ोसी शर्मा जी की खीझ, रिश्तेदारों की चेतावनी, सरकार की घोषणाएँ—सब बेअसर! मोटापा हर वक्त साथ है, जैसे जीवन-संगिनी। चेतावनी बोर्ड उखाड़कर समोसे खाने की जिद और गोल फिगर को भी गौरव मानना—यह व्यंग्य सिर्फ़ शरीर नहीं, पूरे समाज की मानसिकता पर कटाक्ष है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 22, 2025
व्यंग रचनाएं
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भागम-भाग की ज़िंदगी का असली गणित है—भाग को भाग दो, और उत्तर आएगा ‘आराम’। खाट पर लेटना, कम्बल में दुनिया की फिक्र लपेटना ही असली दर्शन है। काम दुखों की जड़ है, पर आराम में पहले से ही राम बसे हैं। खरगोश दौड़ता है, कछुआ जीतता है, क्योंकि वो आराम से चलता है। तो मेरी मानो—खाट बिछाओ, पैर फैलाओ और कलयुग के मोक्ष ‘आराम’ का आनंद लो।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 6, 2025
व्यंग रचनाएं
1
बजट और बसंत का यह राग अब प्रकृति से नहीं, सत्ता की चौंखट से संचालित होता है। सत्ता पक्ष ढोल-ताशे के साथ लोकतंत्र के मंडप में राग बजट-भरतार गा रहा है, जबकि आम आदमी खाली थाली में चटनी की एक बूंद देखकर संतोष कर रहा है। गरीब अपने मरसिये में बजट को मज़ाक बता रहा है — एक सड़ा हुआ राग, जिसे हर साल दोहराया जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 15, 2025
व्यंग रचनाएं
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बाढ़ आई नहीं कि सरकारी महकमें ‘आपदा प्रबंधन’ में ऐसे सक्रिय हो गए जैसे ‘मनौती’ पूरी हो गई हो। नदी उफनी नहीं कि पोस्टर लग गए, हेलिकॉप्टर उड़ गए, और राहत की थैलियाँ गिरने लगीं। मगरमच्छ तक घरों में घुस आए और मंत्रीजी बोले—“हर घर नल-जल योजना अब पूरी हो चुकी है।” प्रेस कांफ्रेंस में ठंडा पिलाकर सवाल बंद करवाना ही शायद सरकार का असली राहत प्रबंधन है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 15, 2025
Book Review
3
डॉ. मुकेश असीमित का व्यंग्य संग्रह ‘गिरने में क्या हर्ज़ है’ न केवल भाषा की रवानगी दिखाता है, बल्कि विसंगतियों की गहरी पड़ताल भी करता है। समकालीन व्यंग्य की धारा में यह संग्रह एक उम्मीद की रेखा खींचता है।
Pradeep Audichya
Jul 14, 2025
व्यंग रचनाएं
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सेठजी को अब ‘सेठ’ होने से संतोष नहीं, उन्हें ‘समाजसेवी’ भी बनना है—वो भी बिना समाज की सेवा किए! अखबार, होर्डिंग, माला और माइक की व्यवस्था है, गाय तक बुलवाई गई है फोटो के लिए। जीवन पर प्रकाश डालते मास्टर साहब बिजली चोरी, मंदिर पर कब्ज़ा और गरीबों की "सुरक्षा" के किस्से खोल देते हैं। मुनीम तुरंत टोका — “अब ज्यादा प्रकाश ठीक नहीं है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 27, 2025
Blogs
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Roses and Thorns – a satire bouquet straight from the OT (Operation Theatre) of an orthopedic doctor turned wordsmith.
No enlightenment. No “6-pack abs” philosophy.
Just full-blown prep to shake your brainstem and tickle your funny bone.
👉 From viral buffaloes to potholes with divine ambitions, every chapter is a comic detonation with a side of social X-rays. You may spot a few fractures in society that no scan could detect – but satire can.