अकेलेपन की महामारी: क्या हम जन्म से ही अकेले हैं?

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 28, 2026 Lifestyle 0

अकेलापन बीमारी नहीं, संकेत है—कि हम स्वयं से दूर हो गए हैं।” “भीड़ में रहकर भी आदमी अकेला हो सकता है, और मौन में रहकर भी पूर्ण।” “हम रिश्ते बनाते हैं—पर क्या हम स्वयं से भी रिश्ता बनाते हैं?” “असली महामारी दूरी की है—दुनिया से नहीं, अपने ही अस्तित्व से।”

क्या हम सचमुच स्वतंत्र हैं — या केवल प्रोग्राम्ड जीवन जी रहे हैं?

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 27, 2026 Self Help and Improvements 0

हम अपने निर्णयों को स्वतंत्र मानते हैं, पर क्या वे सच में हमारे हैं? जब तक हम अपनी आदतों, भय और उधार की इच्छाओं को पहचान नहीं लेते, तब तक हम प्रतिक्रिया-प्रधान जीवन जीते हैं। जागरूकता ही वास्तविक स्वतंत्रता का प्रारंभ है।

जीवन ही दर्पण है: सत्य बाहर नहीं, अनुभव में है

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 26, 2026 Self Help and Improvements 0

सत्य सिद्धांतों में नहीं, हमारे दैनिक व्यवहार और निर्णयों में प्रकट होता है। जब हम अपने जीवन को साक्षी भाव से देखना शुरू करते हैं, तब अनुभव ही हमारा शिक्षक बन जाता है और सत्य स्वयं स्पष्ट होने लगता है।

गीता सार: कर्तव्य, समत्व और समर्पण का जीवन-दर्शन

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 24, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

गीता हमें सिखाती है कि जीवन का सबसे बड़ा संकट युद्ध नहीं, निर्णयहीनता है। कर्तव्य करते हुए फलासक्ति त्यागना, समत्व में स्थिर रहना और भीतर के सत्य की शरण लेना ही गीता का सार है।

ज़िंदगी: एक बोझिल कहानी या खुलता हुआ बैग?

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 6, 2026 Darshan Shastra Philosophy 3

ज़िंदगी घटनाओं की नहीं, व्याख्याओं की शृंखला है। हर इंसान अपने कंधे पर एक बैग उठाए चढ़ रहा है—यह मानकर कि उसमें सोना है। पर ऊँचाई बढ़ते ही जब साँस फूलने लगती है, तब सवाल उठता है— क्या सच में बोझ की क़ीमत थी, या हम सिर्फ़ कहानी ढो रहे थे?

आत्ममूल्यांकन रिश्ते का केंद्र हैं,तुम बदल गए हो पहले ऐसे नहीं थे

Priyanka Ghumara Jan 20, 2026 हिंदी लेख 1

“जहाँ दूरी पराजय नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की विजय बन जाए— वहीं से रिश्तों की सच्ची परिभाषा शुरू होती है।”

आत्मबोध से विश्वबोध तक — ‘मैं’ से ‘हम’ बनने की चेतना यात्रा

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 19, 2026 Darshan Shastra Philosophy 1

आत्मबोध मनुष्य की सबसे गहन यात्रा है — अहं से अनंत तक की। यह यात्रा हमें केवल स्वयं से नहीं, समस्त सृष्टि से जोड़ती है। जब चेतना ‘मैं’ के घेरे से बाहर निकलकर ‘हम’ का स्वर ग्रहण करती है, तभी करुणा, सहानुभूति और वैश्विक उत्तरदायित्व का जन्म होता है। विज्ञान और वेदांत दोनों आज इसी सत्य की ओर संकेत कर रहे हैं — भीतर की चेतना जागे बिना बाहरी संसार का संतुलन संभव नहीं।

सम्यक ज्ञान, सम्यक दृष्टि : जब जानना कम और देखना अधिक ज़रूरी हो जाता है

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 6, 2026 आलोचना ,समीक्षा 0

सम्यक ज्ञान का अर्थ अधिक जानना नहीं, बल्कि सही ढंग से देख पाना है। जहाँ शास्त्रार्थ समाप्त होकर अनुभूति शुरू होती है, वहीं से सच्चे विमर्श की यात्रा आरंभ होती है। यह लेख ज्ञान, कविता, करुणा और चेतना के उसी संतुलन बिंदु की खोज है।

ईश्वरीय अस्तित्व –भ्रम, भरोसा या बौद्धिक आलस्य?

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 22, 2025 Culture 0

ईश्वर को जानने की हड़बड़ी में हम स्वयं को जानने की ज़रूरत भूल जाते हैं। वेदांत विश्वास नहीं, अनुभव की बात करता है—मानने की नहीं, घटित होने की। जो अनुभूति का विषय है, उसे सिद्धांत में बाँध देना शायद सबसे बड़ी भूल है। शायद परमसत्ता ऊपर कहीं नहीं, उसी चेतना में है जिससे हम प्रश्न पूछ रहे हैं।

आत्मबोध से विश्वबोध तक — चेतना की वह यात्रा जो मनुष्य को ‘मैं’ से ‘हम’ बनाती है

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 11, 2025 Darshan Shastra Philosophy 0

“मनुष्य की सबसे लंबी यात्रा कोई भौगोलिक नहीं होती — वह भीतर जाती है। आत्मबोध से विश्वबोध तक की यह यात्रा ‘मैं’ से ‘हम’ बनने की प्रक्रिया है — जहाँ व्यक्ति स्वयं को जानकर समस्त सृष्टि से एकात्म हो जाता है। जब ‘स्व’ का दीप जलता है, तब ‘सर्व’ का सूरज उगता है — यही चेतना की परिपूर्णता है।”