हम सब अपनी-अपनी आँखें धो रहे हैं—पर पानी से नहीं, अपनी ही कहानियों से।
हर सुबह उठते ही सबसे पहले हम आईने में नहीं, अपनी कथा में झाँकते हैं। वहाँ हम नायक हैं, परिस्थितियाँ खलनायक हैं, और दुनिया एक ऐसा मंच है जहाँ बाकी लोग सिर्फ़ सहायक कलाकार। यही कारण है कि सबको अपनी कहानी दूसरों की कहानियों से बेहतर लगती है। क्योंकि उसमें हमारा पसीना है, हमारी हार-जीत है, और सबसे ज़्यादा—हमारा अहं है।
ज़िंदगी, दरअसल, घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि व्याख्याओं का संग्रह है। एक ही सच अलग-अलग लोगों के हाथों में पहुँचकर अलग-अलग कथाएँ बन जाता है। कोई उसे संघर्ष कहता है, कोई अवसर, कोई नियति और कोई साज़िश। सच तो यह है कि हम जी कम रहे हैं, बयान ज़्यादा कर रहे हैं। हर व्यक्ति अपने अनुभव को शब्दों में ढालते ही उसे अंतिम सत्य घोषित कर देता है। और यहीं से दर्शन की ज़रूरत शुरू होती है—क्योंकि जहाँ हर कोई सही हो, वहाँ सच सबसे ज़्यादा अकेला होता है।

हम सब एक ऊँचे ट्रैक पर चढ़ रहे हैं। भीड़ है, धक्का-मुक्की है, और हर किसी को लगता है कि बस थोड़ी ही चढ़ाई बाकी है—उसके बाद दृश्य बदल जाएगा। कोई कहता है वहाँ शांति है, कोई कहता है सफलता, कोई मोक्ष। पर मज़ेदार बात यह है कि चढ़ते समय किसी ने यह नहीं पूछा कि यह ट्रैक बनाया किसने, और ऊपर सच में है क्या। हम बस चल पड़े हैं—क्योंकि भीड़ चल रही है। यही सामूहिक आत्मसम्मोहन है, जिसे हम “प्रगति” कहते हैं।
आपके कंधे पर एक बैग है। आप मानते हैं कि उसमें सोना है—आपने नहीं देखा, पर भरोसा है। भरोसा इसलिए नहीं कि प्रमाण हैं, बल्कि इसलिए कि बिना इस विश्वास के चढ़ाई का कोई अर्थ नहीं बचता। लेकिन जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती है, बैग भारी लगने लगता है। साँस फूलती है, पैर काँपते हैं, और मन पहली बार सवाल करता है—“अगर इसमें सच में सोना है, तो इतना बोझ क्यों?”

पर तब तक देर हो चुकी होती है। नीचे उतरने का विचार ही अपमान लगने लगता है, क्योंकि आपने सबको बता दिया था कि आप सोना लेकर ऊपर जा रहे हैं। अब अगर बैग खोलकर देखा और वह पत्थर निकला, तो कहानी ढह जाएगी। इसलिए हम बैग नहीं खोलते—हम दर्द को ही मूल्य मान लेते हैं।
यही वैराग्य का भ्रम है और यही वियोग का व्यंग्य। हम त्याग को महिमामंडित करते हैं, पर त्याग किसका? अक्सर उसका, जो कभी था ही नहीं। हम कहते हैं—“मैंने बहुत छोड़ा है”—जबकि सच यह है कि हमने बहुत देर तक भ्रम को पकड़े रखा है। दर्शन यहाँ आकर धीरे से पूछता है—“छोड़ा क्या है, और पाया क्या है?”
पर यह सवाल सुनने का साहस कम ही लोगों में होता है, क्योंकि इसका उत्तर किसी कथा में फिट नहीं बैठता।
हमारी कहानियाँ हमें पहचान देती हैं, पर वही हमें कैद भी कर लेती हैं। एक बार जब आप किसी कहानी में स्थापित हो जाते हैं—संघर्षशील, सफल, पीड़ित, ज्ञानी—तो उससे बाहर निकलना गद्दारी लगता है। समाज भी यही चाहता है कि आप अपनी भूमिका निभाते रहें। नायक को रोना शोभा नहीं देता, संत को क्रोध नहीं, और सफल व्यक्ति को संदेह नहीं। इसीलिए लोग भीतर से टूटते हैं, पर कथा बचाए रखते हैं।

दर्शन कहता है—जीवन कथा नहीं है, वह एक सतत प्रश्न है। और प्रश्न का सौंदर्य यह है कि वह उत्तर से बड़ा होता है। जो व्यक्ति अपनी कहानी पर हँस सकता है, वही सच में मुक्त होता है। क्योंकि हँसी उस क्षण पैदा होती है, जब अहं की पकड़ ढीली पड़ती है।
व्यंग्य इसी ढील का नाम है—जहाँ हम अपनी ही गंभीरता को हल्का कर देते हैं।
शायद असली ऊँचाई उस ट्रैक पर नहीं है, जहाँ सब चढ़ रहे हैं। शायद असली ऊँचाई उस क्षण में है, जब आप रुककर बैग खोलते हैं, भीड़ की ओर नहीं, अपने भीतर देखते हैं, और स्वीकार करते हैं—“यह सोना नहीं है, पर यही मेरा सच है।”
और उसी स्वीकार में बोझ अचानक हल्का हो जाता है।
क्योंकि अंततः ज़िंदगी कोई महान कहानी नहीं है—वह एक क्षणिक अनुभव है, जिसे हम कहानी बनाकर भारी कर लेते हैं।
और सबसे गहरी दार्शनिक समझ शायद यही है—
कि जो कहानी छोड़ सकता है, वही सच में जी सकता है।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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