डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 23, 2026
व्यंग रचनाएं
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विश्व पुस्तक दिवस पर यह व्यंग्य लेख उस दौर को याद करता है जब किताबें दोस्त थीं, किराये पर चलती थीं, तकिये के नीचे छुपाई जाती थीं और मोरपंख के साथ विद्या माता को समर्पित रहती थीं। आज के डिजिटल समय में किताबें पढ़ी कम, कोट और सेल्फ़ी ज़्यादा की जाती हैं—इसी विडंबना को लेख ने चुटीले अंदाज़ में पकड़ा है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 6, 2026
संस्मरण
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बचपन की सर्दियाँ कोई निजी स्मृति नहीं होतीं—वे सामूहिक अनुभव होती हैं। अंगीठी की आँच, ढिबरी की लौ, उल्टे पैर खोजती आँखें और अलाव के चारों ओर सुलगती किस्सागोई—सब मिलकर वह गर्माहट रचते थे, जिसे आज के रूम हीटर भी नहीं दे पाते।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 12, 2025
व्यंग रचनाएं
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"हम उस ज़माने के थे — जब 'फ्री डिलीवरी' मतलब रामदीन काका के बाग़ के अमरूद थे।"
"खेतों की हवा, खाट पर रातें और दादी की चिड़िया-कहानी — हमारी असली मौसम रिपोर्ट।"
"आज के ऐप्स से पहले हमारा 'डेटा' था मिट्टी की नमी और चिड़ियों की चहचहाहट।"