मौसम और डिजिटल दरबार: भविष्यवाणियों पर तीखा व्यंग्य

मौसम और डिजिटल दरबार !

डॉ प्रेमचंद द्वितीय

मौसम की भविष्यवाणी के मामले में डिजिटल दरबारों की भरमार को लेकर वर्तमान में माने जाने लगा है कि मौसम की असल जानकारी देने वाले पुरातत्व और इतिहास की वस्तु बन गए हैं। उनकी जगह ऑनलाइन डिजिटल दरबारों ने लेकर मौसम विशेषज्ञों को ऑफलाइन कर दिया है ।और मौसम की पुरानी कहावतों को रद्दी की टोकरी के हवाले होना पडा ।
डिजिटल दरबारों की भरमार को लेकर पंडित दीनानाथ जी चिंता पड गए और बोले एक जमाने में वषो॔ पहले जब टीवी रेडियो न थे ,न मोबाइल न ए आय, न हीं सरकारी मौसम विभाग था ऐसे समय में घाघ और भड्डरी की कहावतें खेती और समाज को मौसम का राज बताते थे। ये कहावते उस समय लोकप्रिय थी जहां वैज्ञानिकों के अनुमान भी गलत हो जाते थे ।जब घाघ और भड्डरी की कहावतें हकीकत में मौसम पर परफेक्ट बैठती थी । समय के साथ कहावतें काल कवलित हो गई और घाघ भड्डरी की जगह डिजिटल दरबार ने ले ली और सोशल मीडिया पर डिजिटल दरबारों की भरमार हो गई ,जो मौसम की तरह बदल बदल कर मौसम की मासूमियत को अपनी डिजिटल दरबारी से तार तार करने पर तुले हुए हैं ।

डिजिटल दरबार की भरमार से मौसम की घोषणा भी भरभरा जाती है और मौसम थर्रा जाता है , कहीं पानी बरस पड़ता है तो कहीं बिन बरसे बादल दरबार की दरकार को खोखला साबित कर देते है ।
डिजिटल दरबार के मौसम से अटैचमेंट को रोज सुन सुन कर आजीज हुए किसान पं शिवनारायण जी खेत के सेडे पर इकट्ठे किसानों से कहने लगे डिजिटल दरबार की ऑनलाइन की तरह लाईन लग गई है, उनके फॉलोअर्स ने डिजिटल दरबारों को फर्श से अश॔ पर ला दिया है और मौसम की दरबारी घोषणा से कई किसानों को अपनी बरसाती पाल समेटने के लिए मजबूर कर दिया है ।वे बोले डिजिटल दरबार मौसम को लेकर अटल रहते हैं ,वे खुद को किसान बताते हैं और मौसम से किसानों के बीच अपने वजूद का मौसम बना लेते हैं। डिजिटल दरबार कभी किसान के मुंह आने वाले निवाले को बरसात होने की स्थिति में गले में उतरवा देते है और न होने की घोषणा कर उगलवा देते हैं ।लेकिन डिजिटल दरबार की मासूम भरी मौसम की घोषणा के बावजूद जब भारी बरसात हो जाती है तो पकी फसल सड़ने की कगार पर पहुंच जाती है । घाघ भड्डरी की कहावतों से वाकिफ पुराने जमाने के सुनील भैया बोले इन कहावतो को मौसम का महावत बताया जाता था ।जो मौसम पर मौसम की असली भविष्यवाणी सेअंकुश लगाकर किसानों को फसल लेने में घाघ बना देता था। वे बोले घाघ भड्डरी की कहावत कहती है कि
जब बरसेगा उत्तरा ,नक्षत्र, नाज न खावै कुतरा !
यानी उत्तरा नक्षत्र में पानी बरसेगा तो नाज इतना अधिक होगा कि उसे कुत्ते भी नहीं खाएगें ।जब अनाज और कुत्तों का जिक्र आया तो पवन जी बोले डिजिटल दरबारों को न तो आदरा , न हीं उतरा के मौसम के लिए कोई उत्तर है न हीं नक्षत्रों के वजूद के कोई नक्शे है । वे बोले डिजिटल दरबार तो सड़क पर वाहनों के आवागमन की तरह बादलों के आने जाने का बताते हैं जो हर किसी को दिखते हैं ।सावन सेरों की फुहार को मौसम की बहार बताकर किसानों को मौसम की अंगडाई के प्रति लालायित कर देते हैं ।चौपाल पर डिजिटल दरबार की लोकप्रियता लाइक और फॉलोअसं को लेकर नरेंद्र स्वामी जी बोले अरे मौसम का लकी द किसानों के लिए डिजिटल खुला या न खुला हो लेकिन डिजिटल से दरबार के दरबारी की तरह साख जम गई है ।वे बोले डिजिटल सरकार
डिजिटल दरबार मौसम को लेकर बरसात को लकी ड्रा
के रूप में देखने का कहते हैं। यह लकी ड्रा भी सिस्टम से होने का जिक्र कर समूचे सिस्टम को दाव पर लगाते हैं ,अरे पहले ही आम ,अवाम किसान, व्यापारी ,नौकरी पैशा, कारोबारी ,उद्यमी सिस्टम से सिसकिया भरते है और डिजिटल दरबार मौसम को सिस्टम की ओखली में धकेल कर किसानों को हाथ मलने के लिए मजबूर कर देते हैं
इस पर अजय लोडिंग बोले वह जीवन से लेकर व्यापार का लोड लेने से थक गए हैं अब डिजिटली मौसम का लोड उन्हें कई मर्तबा डीलोड होते हुए सुनने को मिलता है। अरे मौसम विभाग हो चाहे मौसम पर घाघ भड्डरी की कहावतें हो मौसम थोड़ा बहुत विचलित होता था। अब डिजिटल दरबार अरब सागर हिंद महा सागर से बारिश के उठाव को बताते हैं ।जिसके बने बादल हमारे गांव में आते जाते न जाने कहां खो जाते हैं । वे बोले डिजिटल वाले तो बंगाल की खाड़ी को एक्टिवेट होने पर मानसून की फेवरेबल कंडीशन बताते हैं । कभी अरब सागर को तो कभी हिंद महासागर को एक्टिव होने की बात कह कर बूंदाबादी और बादलों की गड़गडाहट में इनकी एक्टिंवनेस को नेस्तनाबूत कर देते हैं ।
इस पर मानसून को लेकर चिंतित रामवखिलावन जी बोले मानसून कब आएगा ,यह डिजिटली ही बताते हैं और कहते है कि मानसून अपनी मनमर्जी का मालिक है ।उसकी मर्जी के अनुसार आता है और चला जाता है। मानसून भी टुकड़ों में आता है और विखंडित होता है। इसी कारण बारिश का सिस्टम भी खंडित होकर लॉटरी की तरह कही बरसता है ,कही धता बता देता है, तो कही किसानों की किस्मत के साथ लॉटरी की तरह हार जीत का खेल खिलाता है
वे बोले डिजिटल दरबार की डिजिटल लोकप्रियता से मौसम की आहट तो न जाने कहां गुम हो गई और मौसम की मार और बहार के लिए डिजिटल दरबारों की भरमार हो गई है , जो मौसम को भले ही डिजिटली स्पष्ट बता सके या न बता सके लेकिन देश के अनेक सूबे ,जिलो के नाम का जिक्र कर लोगों को जिले के नाम सीखने में सक्सेस हो गए हैं!
जय हो डिजिटल दरबार की!

Prem Chand Dwitiya

Prem Chand Dwitiya

Address 34 पत्रकार कॉलोनी बडनगर 456 771 जिला उज्जैन म…

Address 34 पत्रकार कॉलोनी बडनगर 456 771 जिला उज्जैन म प्र है

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