किताबों के साथ वो आँख-मिचौली वाला बचपन

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 23, 2026 व्यंग रचनाएं 0

विश्व पुस्तक दिवस पर यह व्यंग्य लेख उस दौर को याद करता है जब किताबें दोस्त थीं, किराये पर चलती थीं, तकिये के नीचे छुपाई जाती थीं और मोरपंख के साथ विद्या माता को समर्पित रहती थीं। आज के डिजिटल समय में किताबें पढ़ी कम, कोट और सेल्फ़ी ज़्यादा की जाती हैं—इसी विडंबना को लेख ने चुटीले अंदाज़ में पकड़ा है।