लेखक की साहित्यिक होली

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 2, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“रंग लगाने गया था, पर हर दरवाज़े पर रंगों की परिभाषा बदल गई। संपादक ने रंग सुरक्षित रख लिए, समीक्षक ने विमर्श पूछ लिया, आलोचक ने कालजयी होने की शर्त लगा दी। अंततः बचा हुआ गुलाल घर की चौखट पर ही काम आया।”

भूमिका के बहुरुपिये-Satire Humour

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 17, 2025 व्यंग रचनाएं 0

भूमिका वह साहित्यिक ढाल है जिसके पीछे लेखक अपनी रचना की सारी कमजोरियाँ छुपा लेता है। यह किताब का परिचय नहीं, बल्कि लेखक की अग्रिम क्षमायाचना होती है—जहाँ दोष शैली का होता है, लेखक का कभी नहीं।

“हम आपका लेख छापेंगे… किसी दिन!”

Wasim Alam Dec 7, 2025 Blogs 0

लेखक लेख भेज देता है, पर जवाब का इंतज़ार ही उसका असली रोमांच बन जाता है। ‘यथासमय’ जैसे रहस्यमय शब्दों, संपादकों की कवि-सुलभ भाषा और अनंत प्रतीक्षा के बीच लेखक खुद ही व्यंग्य का विषय बन जाता है—पेपर पर नहीं, अपने मन की डायरी में।