डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 20, 2026
Self Help and Improvements
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शिक्षा विनम्र बनाती है — या हमने शिक्षा को ही छोटा कर दिया है? कहा जाता है—जितना आप शिक्षित होते हैं, उतना ही विनम्र, संवेदनशील और समझदार बनते हैं। शिक्षा केवल डिग्री का नाम नहीं, वह दृष्टि का विस्तार है। वह भीतर का अहंकार गलाकर मनुष्य को मनुष्य बनाती है। लेकिन प्रश्न यह है कि […]
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 18, 2026
India Story \बात अपने देश की
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पराधीनता का प्रश्न—इतिहास का नहीं, मानसिकता का “भारत बार-बार पराधीन क्यों हुआ?”—यह सवाल सुनते ही हमारे भीतर एक तैयार-सा उत्तर उठता है: “बाहरी आक्रमणकारी ताक़तवर थे… हमारे पास हथियार नहीं थे… हमारी सेनाएँ कमज़ोर थीं… हम तकनीक में पीछे थे…”। ये सारे उत्तर आंशिक रूप से सही हैं, पर पूर्ण नहीं। क्योंकि दुनिया में बहुत-से […]
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 19, 2026
Self Help and Improvements
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भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका युवा मन है—साहसी, आकांक्षी और साफ़ दिल वाला। राष्ट्र-निर्माण केवल सड़क-पुल नहीं, मूल्यों और चरित्र का निर्माण है। जब युवा सेवा, उद्यमिता और नीति-भागीदारी से जुड़ते हैं, तो भविष्य आकार लेता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 14, 2025
शोध लेख/विमर्श
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हिंदी का भविष्य केवल भावनाओं से तय नहीं होगा, बल्कि छह खानों में इसकी ताक़त और चुनौतियाँ दिखती हैं—संस्कृति, व्यापार, न्याय, शिक्षा, मीडिया और सद्भाव। बोलचाल और मनोरंजन में हिंदी मज़बूत है, पर न्याय-व्यवस्था और उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व चुनौती बना हुआ है। समाधान है मातृभाषा-आधारित शिक्षा, द्विभाषिक पुल, देवनागरी-प्रथम मानक और अंतरभाषिक सम्मान। हिंदी तभी लोकतांत्रिक धड़कन बनेगी जब आत्म-सम्मान और समावेशन साथ चलेंगे।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 13, 2025
Important days
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ओपीडी में लेखक-डॉक्टर को एक चालाक रिश्तेदार ‘हिंदी दिवस’ पर मुख्य अतिथि का न्योता थमा देता है—मंशा डोनेशन बटोरने की। तैयारियों के बीच सड़क पर ‘हिंदी माता’ मिलती हैं—लंगड़ाती, अपमानित, साल भर किनारे धकेली हुई। शाल-ताम्रपत्र की औपचारिकता, विभागीय खानापूर्ति और नौकरी-प्रतियोगिता में हिंदी की हीनता पर वे करुण कथा सुनाती हैं। लेखक लौटकर ठठा नहीं, बच्चों को श्रेष्ठ हिंदी साहित्य भेंट करने का संकल्प लेता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 5, 2025
Important days
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शिक्षक दिवस केवल तारीख नहीं, विचार की परीक्षा है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन हमें सिखाते हैं कि शिक्षा डिग्री नहीं, चरित्र-निर्माण है; ज्ञान तभी शक्ति है जब वह सेवा बने। गुरु सीढ़ी हैं—जो हमें ऊपर ले जाती है। आज की चुनौती है सूचना के शोर में स्वतंत्र चिंतन बचाना, स्क्रीन-टाइम घटाकर मनन बढ़ाना, और ईमानदारी की छोटी प्रतिज्ञाओं से समाज में बड़ा परिवर्तन लाना—दीप से दीप जलाने की परंपरा निभाना।