मोबाइल फोन की आंच में-हास्यम्- व्यंग्यम्
कभी कच्चा केला, कभी पका आम— बाज़ार, राजनीति और मोबाइल की आंच में हर रिश्ता, हर मूल्य अपना रंग बदलता हुआ मिलता है।
कभी कच्चा केला, कभी पका आम— बाज़ार, राजनीति और मोबाइल की आंच में हर रिश्ता, हर मूल्य अपना रंग बदलता हुआ मिलता है।
समय के साए’ कविता को भावुकता से निकालकर विचार की ज़िम्मेदारी सौंपता है। यह संग्रह पाठक से सहानुभूति नहीं, आत्मालोचन की माँग करता है। जब तालियाँ अन्याय पर भी बजने लगें, तब लोकतंत्र केवल अभिनय बनकर रह जाता है। डॉ. असीमित का समय कोई अमूर्तन नहीं, बल्कि अख़बार, संसद और बाज़ार में साँस लेता जीवित समय है। यह कविता राहत नहीं देती—यह प्रश्न देती है।