द्विचक्र-वाहिनी की आत्मकथा : स्मृतियों पर घूमते पहिए
“मैं तेज़ नहीं हूँ, न आधुनिक—पर मैंने चलना सिखाया है। मेरे चक्रों पर समय नहीं, स्मृतियाँ घूमती हैं।”
“मैं तेज़ नहीं हूँ, न आधुनिक—पर मैंने चलना सिखाया है। मेरे चक्रों पर समय नहीं, स्मृतियाँ घूमती हैं।”
बचपन की सर्दियाँ कोई निजी स्मृति नहीं होतीं—वे सामूहिक अनुभव होती हैं। अंगीठी की आँच, ढिबरी की लौ, उल्टे पैर खोजती आँखें और अलाव के चारों ओर सुलगती किस्सागोई—सब मिलकर वह गर्माहट रचते थे, जिसे आज के रूम हीटर भी नहीं दे पाते।
नया साल कोई तारीख नहीं, भीतर की एक हल्की-सी हलचल है। उत्सव का सवाल नहीं, चेतना का सवाल है। जो छूट गया, वही नया है; जो थाम लिया, वही बोझ। कैलेंडर बदलते रहते हैं, साल तभी बदलता है जब दृष्टि बदलती है।
एक ताँत की कुर्सी और एक टेबल से शुरू हुई यह यात्रा—आज 30 बेड के पंजीकृत हॉस्पिटल, MRI, CT, C-ARM और डिजिटल एक्स-रे जैसी सुविधाओं तक पहुँच चुकी है। ५ दिसंबर न सिर्फ अस्पताल का स्थापना दिवस है, बल्कि उस लेखकीय यात्रा की भी याद दिलाता है, जिसकी शुरुआत ‘ख़ाँ की बारात’ से हुई थी। यही दिन सिखाता है कि सेवा छोटे कदमों से शुरू होती है, पर मंज़िल सामूहिक भरोसे से बनती है