डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 21, 2026
Blogs
0
गीता किसी एक दर्शन का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का समन्वय है। सांख्य से विश्लेषण, योग से अभ्यास, वेदान्त से दृष्टि, भक्ति से करुणा और कर्मयोग से आचरण — गीता आज भी मनुष्य को संतुलन, समत्व और जिम्मेदारी का मार्ग दिखाती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 22, 2025
Lifestyle
0
श्रीमद्भगवद्गीता का पहला शब्द है “धर्म” और अंतिम “मम” – यानी पूरी कथा इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूमती है कि “मेरा धर्म क्या है?” धर्म यहाँ मजहब नहीं, हमारे मूल गुण, स्वभाव और जिम्मेदारी का नाम है। जब हम भीड़ और ट्रेंड के पीछे भागकर अपना स्वधर्म छोड़ देते हैं, तब बाहर से सफल दिखकर भी भीतर से खाली रह जाते हैं। गीता हमें सिखाती है कि कर्म पर अधिकार रखो, फल को प्रसाद मानो, अपने स्वभाव के अनुरूप काम करो और आज के आनंदित कर्म में ही सच्ची “सफलता” खोजो।