मेडिकल का आँचलिक भाषा साहित्य – बिंब, अलंकारों, प्रतीकों से भरपूर

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 8, 2025 Blogs 1

"डॉक्टर साहब, आपकी पढ़ाई अपनी जगह… हम तो इसे 'नस जाना' ही मानेंगे!" ग्रामीण चिकित्सा संवादों में हर लक्षण का एक लोकनाम है — 'चक चली गई', 'हवा बैठ गई', 'गोड़ा बोल गया', 'ऊपर की हवा का असर है'। ये केवल शब्द नहीं, एक पूरी चिकित्सा-व्याख्या है, जिसमें विज्ञान, विश्वास और व्यंग्य की त्रिवेणी बहती है। गाँव के मरीज डॉक्टर से नहीं, खुद अपनी बीमारी का निदान लेकर आते हैं। इस लेख में इन्हीं रंग-बिरंगे अनुभवों, प्रतीकों और मुहावरों के ज़रिए एक लोक-चिकित्सा संस्कृति का हास्य-चित्रण किया गया है।

पुरुष्कार का दर्शन शास्त्र

डॉ मुकेश 'असीमित' May 13, 2025 Blogs 0

पुरस्कारों की चमक साहित्यकारों को अक्सर पितृसत्ता की टोपी पहना देती है। ये ‘गुप्त रोग’ बनकर छिपाया भी जाता है और पाया भी जाता है, झाड़-पोंछकर अलमारी में रखा जाता है। साहित्यिक संसार में आज पुरस्कार एक ‘औषधि’ है – बिना मांगे मिल जाए तो शक होता है, न मिले तो रोग गहराता है।

“Roses and Thorns” : मेरी एक नई तीखी-मीठी उड़ान!

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 27, 2025 Blogs 0

Roses and Thorns – a satire bouquet straight from the OT (Operation Theatre) of an orthopedic doctor turned wordsmith. No enlightenment. No “6-pack abs” philosophy. Just full-blown prep to shake your brainstem and tickle your funny bone. 👉 From viral buffaloes to potholes with divine ambitions, every chapter is a comic detonation with a side of social X-rays. You may spot a few fractures in society that no scan could detect – but satire can.