व्यंग्य—कल, आज और कल : हिंदी व्यंग्य का व्यापक परिप्रेक्ष्य और बौद्धिक पुनर्स्थापन
“विवेक रंजन श्रीवास्तव की ‘व्यंग्य—कल, आज और कल’ हिंदी व्यंग्य को एक गंभीर, बहुस्तरीय और विश्लेषणात्मक विधा के रूप में स्थापित करती है। यह पुस्तक बताती है कि व्यंग्य केवल हँसी की सतह नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की गहरी परतों तक जाने वाली विचार-शक्ति है, जो अतीत, वर्तमान और भविष्य—तीनों को जोड़ती है।”